आवाज की दुनिया के दोस्त आनंद बख्शी

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'आएगी, किसी को हमारी याद आएगी'......कवि तो कवि होता है, कविता ताम्रपत्र पर लिखे, पन्नों या दीवारों पर। खासकर हिंदी के प्रसार में सिनेमा के, फिल्मी गीत-गानों के सफल योगदान से इनकार नहीं किया जा सकता है। ऐसे ही गीतकार आनंद बख्शी के शब्दों से भला कौन अपरिचित होगा। आज उनका जन्मदिन है- 'दुनिया में कौन हमारा है, कश्ती भी है टूट-फूटी और कितनी दूर किनारा है, माँझी न सही कोई मौज कभी साथ हमें ले जाएगी, किसी को हमारी याद आएगी...।'

आनंद बख्शी संभवतः अकेले ऐसे गीतकार रहे हैं, जिन्होंने एक पूरे दौर में हिंदी फिल्मों को सबसे अधिक लोकप्रिय गाने दिए हैं। आज भी करोड़ों लोग उनके शब्द गुनगुनाया करते हैं।

आनंद बख्शी ने अपने अमर गीतों से हिंदी के प्रसार में ही योगदान नहीं दिया, बल्कि प्यार को कुछ अलग तरह से जीवन का आकार दिया, उन्हें गुनगुनाते हुए लाखों प्रेमी दिलों को धड़काया, खुशी-खुशी जीवन जीने का तजुर्बा और उत्साह दिया। उन्होंने ऐसे-ऐसे दर्द भरे गीत लिखे, जो जिंदगी को मोहब्बत करने वालों की डायरियों में हमेशा के लिए दर्ज हो गए।

आनंद बख्शी संभवतः अकेले ऐसे गीतकार रहे हैं, जिन्होंने एक पूरे दौर में हिंदी फिल्मों को सबसे अधिक लोकप्रिय गाने दिए हैं। आज भी करोड़ों लोग उनके शब्द गुनगुनाया करते हैं। उन्होंने अपने सृजन के शुरुआती दौर में तो सोचा था कि वह मुंबई जाकर पार्श्व गायक बनेंगे। बम्बई ने उनका वह सपना पूरा नहीं किया तो वह रोजी-रोटी के लिए नेवी की नौकरी करने लगे। अपने अधिकारी से विवाद के बाद उऩ्होंने नौकरी छोड़ दी। इसी दौरान हिंदुस्तान दो हिस्सों में बँट गया।

बंटवारे के बाद आनंद बख्शी दुखी मन से अपने पुश्तैनी आधार लखनऊ की ओर लौट पड़े। लखनऊ उनका घर था। वहाँ वह टेलीफोन अॉपरेटर का काम करते हुए फिर से फिल्मों में गाने लिखने का सपना देखने लगे और वह एक बार फिर मुंबई जा पहुंचे। इसके बाद उन्होंने फिल्मों में ऐसी एंट्री मारी, कि फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। एक के बाद एक लगातार उनके लिखे गीत लोकप्रियता के पायदान चढ़ते चले गए।

उन्होंने अपने अमर गीतों से हिंदी के प्रसार में ही योगदान नहीं किया, बल्कि प्रेम को अलग तरह से जीवन का आकार दिया, उन्हें गुनगुनाते हुए लाखों प्रेमी दिलों को धड़काया, खुशी-खुशी जीवन जीने का तजुर्बा और उत्साह दिया। उन्होंने ऐसे-ऐसे दर्द भरे गीत लिखे, जो जिंदगी से मोहब्बत करने वालों की डायरियों में हमेशा के लिए दर्ज हो गए। दोस्ती पर शोले फ़िल्म में लिखा उनका गीत 'ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे...' आज तक लोग गुनगुनाते हैं। 

आनंद बख्शी के गीतों के मशहूर होने की एक खास वजह, उनके शब्दों की सरलता मानी जाती है। आज भी उनको चाहने वाले कहते हैं कि प्रेम शब्द को शहद से भी मीठा अगर महसूस करना हो, तो आनन्द साहब के गीत सुनिए। एक अन्य शायर मजरूह सुल्तानपुरी ही ऐसे रहे, जिन्होंने चार दशकों तक लगातार फिल्मों में आनन्द बख्शी की तरह लंबी पारी खेली। 'ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे..' शोले के इस गीत के अलावा भी मित्रता पर उन्होंने एक से एक यादगार गाने दिए।

आ जा तुझको पुकारें मेरे गीत रे, मेरे गीत रे
ओ मेरे मितवा, मेरे मीत रे,
नाम न जानूँ, तेरा देश न जानूँ
कैसे मैं भेजूँ, सन्देश न जानूँ
ये फूलों की ये झूलों की, रुत न जाये बीत रे,
तरसेगी कब तक प्यासी नज़रिया
बरसेगी कब मेरे आँगन बदरिया
तोड़ के आजा छोड़ के आजा, दुनिया की हर रीत रे
ओ मेरे मितवा, मेरे मीत रे..।

आनंद साहब ने जब बंबई में कदम रखा, उनकी मुलाक़ात भगवान दादा से हुई जो फिल्म 'बड़ा आदमी (1956)' के लिए गीतकार ढूँढ़ रहे थे। उन्होंने आनन्द साहब से कहा कि वह उनकी फिल्म के लिए गीत लिख दें, इसके लिए वह उनको रुपये भी देने को तैयार हैं। इसके बाद सूरज प्रकाश की फिल्म 'मेंहदी लगी मेरे हाथ (1962)' और 'जब-जब फूल खिले (1965)' पर्दे पर आईं फिर तो भाग्य ने उनको श्रोताओं के सिर-आँखों पर बैठा दिया। उनका संघर्षशील सफर रंग लाया और उनका 'परदेसियों से न अँखियाँ मिलाना...' करोड़ों लोगों के दिलों में उतर गया। इसके बाद फ़िल्म 'मिलन (1967)' के साथ 'सावन का महीना', 'बोल गोरी बोल', 'राम करे ऐसा हो जाये', 'मैं तो दीवाना' और 'हम-तुम युग-युग' यह गीत देश के घर-घर में गूंजने लगे। 

मोहम्मत रफी, किशोर कुमार, लता मंगेशकर, आशा भोसले, मुकेश, मन्ना डे, महेंद्र कपूर जैसे चोटी के लगभग सभी गायकों ने आनंद बख्शी के गीतों को झूम-झूमकर स्वर दिए।

आनंद बख्शी के गीतों की लोकप्रियता की दूसरी एक और बड़ी वजह थी, वह गीत सुनने वालों के मन का स्वाद अच्छी तरह पहचानते थे, संवेदना के हैरत में डाल देने वाले पारखी थे। उनके गीत कुछ इस तरह के होते थे, जैसे दो लोग आपस में संवाद कर रहे हों। जैसे सड़क आदमी गीतों के हाइवे पर दौड़ लगा रहा हो-

कभी सोचता हूँ, कि मैं चुप रहूँ
कभी सोचता हूँ, कि मैं कुछ कहूँ
आदमी जो सुनता है, आदमी जो कहता है
ज़िंदगी भर वो सदाएँ पीछा करती हैं
आदमी जो देता है, आदमी जो करता है
रास्ते मे वो दुआएँ पीछा करती हैं

इसी तरह के उनके एक और गीत की पंक्तियां, जहां तक हिंदी बोली-समझी जाती है, वहां तक गूंजती रहीं-

आते जाते खूबसूरत आवारा सड़कों पे
कभी कभी इत्तेफ़ाक़ से
कितने अनजान लोग मिल जाते हैं
उन में से कुछ लोग भूल जाते हैं
कुछ याद रह जाते हैं।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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