14 साल में बढ़े साढ़े नौ हजार हथकरघे, ग्रामोद्योगों से साढ़े तीन लाख को मिल रहा रोजगार

छत्तीसगढ़ में कंबल प्रोसेसिंग यूनिट और सिरेमिक ग्लेजिंग यूनिट में कई लोगों को मिला काम...

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यह लेख छत्तीसगढ़ स्टोरी सीरीज़ का हिस्सा है...

गांवों की अर्थव्यवस्था में ग्रामोद्योग महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। सैकड़ों ग्रामीणों को रोजगार मिल रहा है और उनकी आर्थिक स्थिति बदल रही है। राजनांदगांव छुरिया ब्लॉक के आमगांव में खुला कंबल प्रोसेसिंग यूनिट इसका अच्छा उदाहरण है।

हथकरघा चलाती महिलाएं
हथकरघा चलाती महिलाएं
सरकार गांवों में केवल उद्योग ही नहीं डाल रही बल्कि ग्रामीणों को इसके लिए प्रशिक्षित कर रही है। साथ ही संबंधित यूनिट डालने में भी सहायता कर रही है।

गांवों की अर्थव्यवस्था में ग्रामोद्योग महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। सैकड़ों ग्रामीणों को रोजगार मिल रहा है और उनकी आर्थिक स्थिति बदल रही है। राजनांदगांव छुरिया ब्लॉक के आमगांव में खुला कंबल प्रोसेसिंग यूनिट इसका अच्छा उदाहरण है। यहां रोजगार पाने वाले बुनकरों ने इस साल ढाई लाख कंबल प्रोसेस कर विभिन्न विभागों को दिए। इसी तरह महासमुंद के गढ़फुलझर में लगा सिरेमिक ग्लेजिंग यूनिट 400 परिवारों की रोजी रोटी का साधन है। ऐसे ही अन्य ग्रामोद्योगों में काम करने वाले साढ़े तीन लाख लोग खुद को आर्थिक रूप से सक्षम बना रहे हैं।

प्रदेश में हाथकरघा की संख्या सात हजार 40 से बढ़कर 16 हजार 667 हो गई, जिसमें 51 हजार 235 बेरोजगारों को काम मिल रहा है। इनको मिलने वाली पारिश्रमिक 1.78 करोड़ से बढ़कर 49.99 करोड़ हो गई है। राज्य में टसर कोसा का उत्पादन 5.55 करोड़ नग से बढ़कर 22.50 करोड़ हो गया। सिल्क का उत्पादन 65 से 353 मीटरिक टन तक बढ़ गया। शहतूती रेशम 14 हजार पांच किलो से 68 हजार 501 तक पहुंच गया। इस योजना से भी 80 हजार लोगों को फायदा हुआ। सभी ग्रामोद्योगों के आंकड़ों को मिलाएं तो 14 साल में 79 हजार 737 लोगों को रोजगार मिल रहा है और वे अच्छी कमाई कर रहे हैं।

इन आंकड़ों से पता चल रहा है कि ग्रामोद्योग की इस एक यूनिट ने ग्रामीणों को किस तरह सक्षम बनाया। सरकार गांवों में केवल उद्योग ही नहीं डाल रही बल्कि ग्रामीणों को इसके लिए प्रशिक्षित कर रही है। साथ ही संबंधित यूनिट डालने में भी सहायता कर रही है। राष्ट्रीय हाथकरघा विकास कार्यक्रम के तहत छुरिया, बालोद, डभरा, बम्हनीडीह, नवागढ़, बलौदा, करतला, कुरुद और बिलईगढ़ हाथकरघा कलस्टर संचालित है, जहां अच्छे डिजाइनर बुनकरों को प्रशिक्षित कर रहे हैं। यहां एक हजार 62 बुनकरों को बुनाई, रंगाई और डिजाइन की ट्रेनिंग दी जा रही है।

कोसा उत्पादन के लिए 13 हजार 779 हेक्टेयर क्षेत्र में विभागीय परियोजना के साथ ही जंगल का भी उपयोग किया जा रहा है। माटी कला बोर्ड ने माटी शिल्पियों को तीन हजार 745 विद्युत चाक बांटे हैं और 505 नगर बेरिंग चाक का निशुल्क वितरण किया है। यही नहीं ग्रामोद्योगों के विकास के लिए अभी कई योजनाएं हैं। पिछले साल ही मुख्यमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम की शुरुआत हुई है, जिसके तहत अगले पांच सालों में तीन हजार 664 इकाई स्थापित कर सात हजार 328 लोगों को रोजगार देने का लक्ष्य रखा गया है।

इस योजना में परियोजना लागत एक लाख से बढ़ाकर तीन लाख कर दिया गया है और इसमें 35 प्रतिशत अनुदान का प्रावधान भी है। सरकार का टारगेट है कि इसके तहत 37 करोड़ 17 लाख का अनुदान देकर 120 करोड़ का ऋण उपलब्ध कराया जाए। यहां देखने वाली बात ये है कि ग्रामोद्योग विभाग के सभी घटकों- हाथकरघा, रेशम, हस्तशिल्प, माटीकला और ग्रामोद्योग बोर्ड को लेकर पांच वर्ष की नीति बनाई गई है। इसी के तहत पूरे राज्य के सात लाख लोगों को रोजगार देने का लक्ष्य रखा गया है। इसमें उस वर्ग को टारगेट किया जा रहा है जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं। खासतौर पर महिलाओं को सक्षम बनाने की नीति निर्धारित की गई है।

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