प्लास्टिक की चम्मच और प्लेट से छुटकारा, अनाज से बनी कटलरी का कीजिए इस्तेमाल

एक ऐसा आंत्रेप्रेन्योर जिसने बनाई खाने वाली कटलरी...

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हैदराबाद के एक आंत्रेप्रेन्योर ने प्लास्टिक चम्मच, पत्तलों की जगह पर ऐसी कटलरी विकसित की है जो पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ-साथ स्वास्थ के लिए भी नुकसानदायक नहीं है। उनकी कटलरी की खासियत यह है कि यह खाद्यान्न से बनी होने के साथ ही जल्दी नष्ट भी हो और इस्तेमाल के बाद इन छुरी, चम्मच और प्लेट का इस्तेमाल करने के बाद इन्हें खाया भी जा सकता है।

इंटरनेशनल क्रॉप रिसर्च इंस्टीट्यूट, हैदराबाद के पूर्व वैज्ञानिक नारायण पीसापति ने प्लास्टिक चम्मच, पत्तलों की जगह पर ऐसी कटलरी विकसित की है जो पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ-साथ स्वास्थ के लिए भी नुकसानदायक नहीं है।

देश भर में हर साल प्लास्टिक से बने करीब 120 अरब चम्मच और प्लेट इस्तेमाल करने के बाद फेंक दिए जाते हैं। दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक चम्मच और प्लेट की संख्या के बारे में तो केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है।

आंत्रेप्रेन्योर्स के बारे में कहा जाता है कि वे पुरानी समस्याओं का नया समाधान पेश करते हैं। नारायण पीसापति के बारे में यह बात बिल्कुल सटीक बैठती है। इंटरनेशनल क्रॉप रिसर्च इंस्टीट्यूट, हैदराबाद के पूर्व वैज्ञानिक पीसापति ने प्लास्टिक चम्मच, पत्तलों की जगह पर ऐसी कटलरी विकसित की है, जो पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ-साथ स्वास्थ के लिए भी नुकसानदायक नहीं है। आमतौर पर बाजार में बिकने वाली प्लास्टिक की कटलरी से पर्यावरण को भारी नुकसान होता है क्योंकि प्लास्टिक को डिस्पोज नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही इन कटलरी में परोसा जाने वाला खाना भी शरीर के लिए नुसकानदायक होता है। पीसापति ने इन प्लास्टिक कटलरी का अच्छा विकल्प पेश किया है।

इस चम्मच और प्लेट की खासियत यह है कि यह खाद्यान्न से बनी होने के साथ ही जल्दी नष्ट भी हो जाती है। इसका मतलब है कि खाना खाने के लिए इस छुरी, चम्मच और प्लेट का इस्तेमाल करने के बाद इन्हें भी खाया जा सकता है। नारायण इस तरह की डिस्पोजबल कटलरी करीब एक दशक से बना रहे हैं और जब विदेश से उनके पास इन्क्वॉयरी आई तो उन्हें ऐसा लगा कि उनकी कोशिश को अंतरर्राष्ट्रीय पहचान मिल गई है। 2016 के अप्रैल के महीने में नारायण पीसापति के पास कुछ ऐसी कारोबारी पूछताछ आई थी जिसमें उनसे खाना खाने में इस्तेमाल होने वाले छुरी, चम्मच और प्लेट की एक खास किस्म को फ्रांस और जर्मनी में आपूर्ति करने को कहा गया था।

नारायण बताते हैं, कि जब वह फील्ड विजिट पर होते थे तो उन्हें बाजरे की ठंडी रोटी से ही काम चलाना पड़ता था। तब उन्होंने यह महसूस किया कि यह लोगों को खाने के लिए भी सही रहेगा। इसके अलावा फ्लाइट और दूसरी जगहों पर दिया जाने वाला प्लास्टिक चम्मच बहुत साफ सुथरी और अच्छी कंडिशन में नहीं बनाया जाता, इसलिए इससे खाना खाने से बहुत से कैमिकल हमारे स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाते हैं। नारायण ने 2006 में इडिबल कटलरी के बारे में सोचा। उनके दिमाग में सबसे पहले यह बात आई कि बाजरा बहुत ही पौष्टिक है। एक ऐसा तत्व जो नेचुरल और फायदेमंद हैं और जो खेती में इस्तेमाल होता है। इसके बाद उन्होंने इससे कटलरी बनाने का फैसला किया।

नारायण की कंपनी बेकीस को देश के भीतर और बाहर से पहले से ही 2.5 करोड़ चम्मच और दूसरी तरह की कटलरी की आपूर्ति के ऑर्डर मिल चुके हैं। 2016 में जून के महीने में उनकी कंपनी ने खाने योग्य कटलरी के उत्पादन का पूर्ण स्तर हासिल कर लिया। इसकी वजह से उनकी कंपनी का दैनिक उत्पादन स्तर बढ़कर 50 हजार यूनिट हो गया है।

नारायण के दावे के मुताबिक वह खाने लायक कटलरी का व्यावसायिक स्तर पर उत्पादन करने वाले पहले उद्यमी हैं। लेकिन इस साधारण से दिखने वाले नई तरह के उत्पाद को लोगों की स्वीकार्यता हासिल करने में अच्छा खासा वक्त लग गया। नारायण ने कहा कि उनकी खास कटलरी बायो-डिग्रेडेबल प्लास्टिक और लकड़ी से बने डिस्पोजबल कटलरी की तुलना में सस्ती पड़ती है और इसकी कीमत 2.75 रुपये प्रति इकाई पड़ती है। नारायण कहते हैं कि 'हालांकि कोटेड प्लास्टिक से बने तथा चांदी के चम्मच की तरह दिखने वाली कटलरी और सस्ते प्लास्टिक से बने उत्पाद अब भी हमारी कटलरी से सस्ते हैं। अगर मैं खाने योग्य कटलरी के दाम को एक रुपये प्रति इकाई के स्तर तक ले आता हूं तो मेरी कटलरी कोटेड प्लास्टिक से भी सस्ती हो जाएगी।'

अब जरा यह जान लेते हैं कि वह ऐसी कटलरी बनाते कैसे हैं, जिसे बाद में खाया भी जा सके। दरअसल वह खास तरह की कट्लरी बनाने के लिए ज्वार, चावल और गेहूं के आटे के मिश्रण का इस्तेमाल करते हैं। उनकी इस खोज का उद्देश्य बड़ा है और बाजार की जरूरतों के साथ अर्थशास्त्र के पूरी तरह तालमेल बिठाने पर ही उसे हासिल किया जा सकता है। नारायण इसके बारे में विस्तार से बताते हैं। वह कहते हैं, 'आखिर किसी समारोह में यह कौन तय करता है कि खाने के लिए किस तरह की डिस्पोजबल कटलरी का इस्तेमाल किया जाएगा? यह खाना मुहैया कराने वाला वेंडर होता है और उसके लिए कीमत बहुत बड़ा फैक्टर होता है। इसलिए हमें इस मोर्चे पर लड़ाई लडऩी होगी।'

नारायण ने बेकिंग में इस्तेमाल होने वाले हीटर ब्राजील चीन से मंगवाए हैं। वह अपने उत्पादन स्तर को बढ़ाकर लागत मूल्य में कटौती करना चाहते हैं ताकि प्लास्टिक कटलरी की चुनौती का मुकाबला कर सकें।

हैदराबाद स्थित इंटरनेशनल क्रॉप रिसर्च इंस्टीट्यूट के शोधछात्र रहे नारायण ने वर्ष 2007 में प्लास्टिक कट्लरी के बढ़ते इस्तेमाल से निपटने के लिए यह नायाब उपाय पेश किया था। लेकिन इस उत्पाद को इस्तेमाल के दौरान टूटने से बचाने लायक बनाने में लंबा वक्त लग गया। उन्होंने खाने योग्य कटलरी के विकास में संतोषजनक स्तर हासिल करने के बाद वर्ष 2010 में बेकीस फूड्स प्राइवेट लिमिटेड नाम से कंपनी की स्थापना की। नारायण की बनाई हुई अनूठी कटलरी मसालेदार से लेकर मीठे स्वाद में भी उपलब्ध है और इसमें पौष्टिकता भी है। उन्होंने चीनी, अदरक और काली मिर्च का इस्तेमाल कर इसे स्वादिष्ट भी बनाने की कोशिश की है। इस कटलरी को तैयार करने के बाद ऊंचे तापमान पर सेंका जाता है। पूरी तरह सूखने के बाद इस तकनीक से बने चम्मच और छुरी-कांटे इतने सख्त हो जाते हैं कि गर्म सूप और दूसरे पेय पदार्थ के साथ भी उनका इस्तेमाल किया जा सकता है। नारायण के कांटे-चम्मच कम-से-कम 20 मिनट तक तो आपका साथ दे ही देंगे।

नारायण बताते हैं कि देश भर में हर साल प्लास्टिक से बने करीब 120 अरब चम्मच और प्लेट इस्तेमाल करने के बाद फेंक दिए जाते हैं। दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक चम्मच और प्लेट की संख्या के बारे में तो केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है। बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए उन्होंने हैदराबाद के चेरलापल्ली में पूरी तरह ऑटोमेटिक मैन्युफैक्चरिंग यूनिट का भी डिजाइन तैयार किया है। अब उनके कर्मचारियों को केवल मशीन में मिश्रण की लोई बनाकर डालनी होती है और कई मशीनों से गुजरते हुए कटलरी पूरी तरह तैयार हो जाती है। अब वह पैकेजिंग के काम को भी पूरी तरह स्वचालित बनाने की तैयारी कर रहे हैं।

नारायण को अपने उत्पाद को बेचने के लिए ज्यादा जद्दोजहद करने की जरूरत नहीं है क्योंकि उन्हें अपने उत्पाद जिस तरह के उपभोक्ताओं के सामने रखना है वो पहले से ही जागरूक हैं। उनका अगला लक्ष्य तो केएफसी और मैकडॉनल्ड की तरह फूड चेन स्थापित करने का है।

नारायण ने बेकिंग में इस्तेमाल होने वाले हीटर ब्राजील चीन से मंगवाए हैं। वह अपने उत्पादन स्तर को बढ़ाकर लागत मूल्य में कटौती करना चाहते हैं ताकि प्लास्टिक कटलरी की चुनौती का मुकाबला कर सकें। नारायण ने कुछ महीनों पहले वेल्लूर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के एक कार्यक्रम में अपने मकसद का उल्लेख किया था। दरअसल वह चाहते हैं कि ज्वार और जौ से बनी कटलरी की मांग बढऩे से चावल की मांग में थोड़ी गिरावट आए।

धान की फसल के लिए ज्यादा पानी की जरूरत होती है और अगर उसकी मांग घटती है तो उसकी बुआई के रकबे में भी कमी आएगी। नारायण को अपने उत्पाद को बेचने के लिए ज्यादा जद्दोजहद करने की जरूरत नहीं है क्योंकि उन्हें अपने उत्पाद जिस तरह के उपभोक्ताओं के सामने रखना है वो पहले से ही जागरूक हैं। उनका अगला लक्ष्य तो केएफसी और मैकडॉनल्ड की तरह फूड चेन स्थापित करने का है।

वह पैराडाइज बिरियानी हैदराबाद और आसिफी बिरियानी चेन्नई और कुछ अन्य कॉर्पोरेट हाउसेज से बात कर रहे हैं ताकि वह कटलरी की सीधे आपूर्ति कर सकें। इन कटलरीज को वह अपने कंपनी की वेबसाइट के जरिए बेचते हैं। इसके अलावा वह समय-समय पर एग्जिबिशन भी लगाते हैं। नारायण की पत्नी प्रग्न्या पीसापति बेकीस कंपनी की डारेक्टर हैं। नारायण कहते हैं, 'प्रग्न्या का शुरू से ही पूरा सपोर्ट मिलता रहा और इसी वजह से उन्होंने सफलता हासिल की।'

नारायण की एक बेटी भी है जो कनाडा में मैथमैटिक्स की पढ़ाई कर रही है। नारायण जैसे लोगों की ऐसी मुहिम पर्यावरण को बचाने के लिए काफी सराहने योग्य है।

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