भारतीय स्टार्टअप के इकोसिस्टम की बेहतरी के लिए काम करने वाले 'एंडियापार्टनर्स'

एंडियापार्टनर्स, ऐसी शख्सियतें, जो इंडियन स्टार्टअप ईकोसिस्टम को बेहतर से बेहतर बनाने की दिशा में कर रही हैं काम...

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एंडियापार्टनर्स, ऐसी शख्सियतें, जो इंडियन स्टार्टअप ईकोसिस्टम को बेहतर से बेहतर बनाने की दिशा में काम कर रही हैं। साथ ही, एंडियापार्टनर्स को ऐसे निवेशकों के तौर पर भी देखा जा सकता है, जो आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण समय में आपकी मदद के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। योरस्टोरी की सीईओ श्रद्धा शर्मा ने इनसे मुलाकात कर, 2018 में इनके प्लान्स और अन्य कई महत्वपूर्ण विषयों पर बातचीत की। पेश हैं उनकी बातचीत के कुछ अंशः

श्रद्धा शर्मा: सतीश जी आप एंडियापार्टनर्स के बारे में कुछ बताइए?

संतीश आंद्रा: 2 साल पहले शुरू हुआ एंडिया, फिलहाल 200 करोड़ रुपए का फंड है। हमारा फोकस सीड और प्री-सीरीज ए-स्टेज फंडिंग और डीप-टेक स्टार्टअप्स पर है। हम तीन श्रेणियों में स्टार्टअप्स को देख रहे हैं, पहली श्रेणीः भारतीय स्टार्टअप्स, जो भारतीय बाजार के साथ-साथ क्षेत्रीय बाजार (दक्षिण-पूर्ण एशिया या मध्य एशिया) में अपने उत्पाद पहुंचा रहे हैं। दूसरी श्रेणीः ऐसे स्टार्टअप्स जो भारत आधारित ही हैं, लेकिन यूएस या यूरोप जैसे बाजार तक अपनी पहुंच बना रहे हैं। तीसरी श्रेणीः ग्लोबल स्तर के स्टार्टअप्स, जिनके मुख्यालय सिलिकन वैली या यूरोप में हैं और तेजी से बढ़ते बाजारों को अप्रोच कर रहे हैं। इस श्रेणी में हमें कम गतिविधि देखने को मिल रही है, लेकिन समय के साथ इसमें इजाफे की उम्मीद है।

अगर सेक्टरों की बात करें तो हम मुख्य रूप से SaaS (सॉफ्टवेयर ऐज अ सर्विस), सिक्यॉरिटी, मोबिलिटी, सेमीकन्डक्टर्स, फाइनटेक, डिजिटल हेल्थ और मेडिकल डिवाइसेज पर फोकस कर रहे हैं। हमारे पार्टनर्स डॉ. रमेश, अभिषेक और मैंने मिलकर यह तय किया है कि हम इस तरह के प्रोडक्ट स्टार्टअप्स को सहयोग देंगे।

हम मानते हैं कि शुरूआती चरण पर ही इस तरह के स्टार्टअप्स को एक ऐसे सह-संस्थापक या वीसी की जरूरत होती है, जो यह तय कर सके कि मार्केट के हिसाब से कैसा प्रोडक्ट तैयार किया जाना चाहिए, सबसे पहले किस सेगमेंट के कस्टमर्स पर फोकस होगा और कंपनी के लिए उपयुक्त प्रतिभाओं को कैसे छांटा जाए, ताकि स्टार्टअप सही दिशा में आगे बढ़ सके। एंडिया का अभिप्राय, ‘एनैबलिंग द दीया (रौशनी)’ से है। इसका एक और मतलब है, ग्लोबल प्लेटफॉर्म पर भारत।

कुछ चीजें हैं, जो हमें बाकियों से अलग करती हैं। जैसे कि हम शुरूआती स्तर और सेक्टर पर खास फोकस करते हैं। उदाहरण के तौर पर अगर हमें किसी स्टार्टअप का डोमेन उपयुक्त नहीं लगता तो हम उसमें निवेश नहीं करते क्योंकि हमारा मानना है कि उसके विकास में हम कोई खास योगदान नहीं दे सकते। दूसरी प्राथमिकता प्रोडक्ट को दी जाती है और तीसरे स्थान पर हम गौर करते हैं कि प्रोडक्ट, वैश्विक स्तर पर कितनी उपयोगिता रखता है।

एक वीसी (वेंचर कैपिटलिस्ट), एक अच्छे प्रेरणास्त्रोत और कोच की भूमिका भी निभा सकता है। स्टार्टअप्स के साथ इस स्तर तक जुड़ने से उनकी ऑपरेटिंग, डोमेन, सर्विस, पोर्टफोलियो, ग्राहकों की जरूरत और मार्केट प्रतियोगियों को समझने में सहायता मिलती है। इस तरह से ही किसी कंपनी को जरूरी सहयोग दिया जा सकता है।

श्रद्धाः आपके फंड की एक खास बात है कि आपके बोर्ड सदस्यों में एक डॉक्टर (मेडिकल) भी हैं। मैं पिछले 9 सालों से इस क्षेत्र में काम कर रही हूं, लेकिन मैंने आज तक किसी एक शख्स के बारे में नहीं सुना, जो डॉक्टर भी हो और वेंचर कैपिटलिस्ट भी। आप वेंचर कैपिटलिस्ट कैसे बने और क्या आप अभी भी मेडिकल प्रैक्टिस कर रहे हैं?

डॉ. रमेश बायरापनेनी (मैनेजिंग डायरेक्टर, एंडियापार्टनर्स): मैं एक कार्डियोलॉजिस्ट (हृदय रोग विशेषज्ञ) हूं। मैंने पीजीआई (चंडीगढ़) से पढ़ाई की और फिर यूएस जाकर इंटरनैशनल कार्डियोलॉजी फेलोशिप की। मैंने 25 सालों तक मेडिकल प्रैक्टिस की, जिसमें मेरी ट्रेनिंग भी शामिल है। बतौर डॉक्टर आपने अपनी प्रैक्टिस शुरू की हो या उसके 10 या 25 साल बाद तक भी आप एक दिन में 30-40 मरीज देख पाते हैं। इससे एक स्थिरता आ जाती है और मेरा मानना था कि एक ही जीवन है और आप अधिक बेहतर चीजों के लिए बने हैं। मैंने सोचा कि मेडिकल के ग्लोबल मार्केट में इनोवेटिव और उपयोगी मेडिसिन या मेडिकल डिवाइस लॉन्च कर मैं भी इतिहास का हिस्सा बन सकता हूं। मैं एक ही तरह का काम रोज करते-करते ऊब गया था।

मैं अपने 25 साल के अनुभव से मेडिकल जगत के लिए कुछ बेहतर करना चाहता था। प्रैक्टिस के दौरान लाखों मरीजों से बात करने के बाद मुझे पेन पॉइंट्स का अच्छा अनुभव हो चला था और मुझे लगता था कि मैं ऑन्त्रप्रन्योर्स की उनकी संघर्ष यात्रा में मदद कर सकता हूं। इसके बाद ही मैंने प्रैक्टिस छोड़ दी और भारतीय स्टार्टअप्स को सहयोग देने के लिए एक फुल-टाइम इनवेस्टर बन गया।

श्रद्धाः अभिषेक, आप इस मुहिम का हिस्सा कैसे बने?

अभिषेक श्रीवास्तवः 15 सालों से ज्यादा के अपने करियर में मैंने ऑपरेटिंग, कन्सलटिंग और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में काम किया। मैं इंजीनियरिंग बैकग्राउंड से ताल्लुक रखता हूं और मैंने करियर की शुरूआत एंटरप्राइज प्रोडक्ट्स डिवेलप करने से की थी। आईएसबी (हैदराबाद) से एमबीए करने के बाद मैं कनसल्टिंग और इनवेस्टमेन्ट बैंकिंग के क्षेत्र में आ गया और इसी राह में मेरी मुलाकात सतीश से हई।रोचक बात है कि यह सब कुछ TiE फोरम के अंतर्गत हुआ। यही समय था, जब मैंने और सतीश ने ‘TiE बडीज’ की शुरूआत की, जिसमें हम स्कूली बच्चों को ऑन्त्रप्रन्योरशिप के बारे में जानकारी देते थे। यहीं पर हमने एक-दसूरे को जाना और आगे की प्लानिंग की।

उपयुक्त समय और इन्फ्रास्ट्रक्चर को देखते हुए मैं मानता हूं कि भारत, विश्वस्तरीय सॉफ्टवेयर कंपनीज खड़ी करने के लिए तैयार है। कंपनियों के प्रोडक्ट और योजनाएं तैयार करने के अनुभव के चलते मैं बिजनस बिल्डिंग के शुरूआती चरण में ऑन्त्रप्रन्योर्स से जुड़ने के लिए बेहद रोमांचित था और इसलिए ही मैंने सतीश और डॉ. रमेश के साथ जुड़ने का फैसला लिया।

श्रद्धाः पूरे विश्व में ऐसा माना जाता है कि भारत में निवेश के अच्छे रिटर्न्स नहीं मिले। आप इस बारे में क्या कहना चाहते हैं सतीश?

सतीश आंद्रा: हर स्टार्टअप ईकोसिस्टम को तयशुदा तौर पर एक पूर्णता की जरूरत होती है। लिमिटेड पार्टनर, जनरल पार्टनर्सको कैपिटल उपलब्ध कराता है और वे स्टार्टअप में उस पैसे का उपयुक्त निवेश करते हैं। वे मार्केट को ध्यान में रखते हुए बेहतर से बेहतर प्रोडक्ट और सर्विस तैयार करने का काम करते हैं, ताकि बेहतर रिटर्न मिल सके और उसे फंड में तब्दील कर सकें, जिससे कि निवेशक आगे निवेश करने के लिए प्रेरित हों।

भारत में कुछ ऐसे फंड्स हैं, जिन्होंने इस साइकल को अच्छी तरह से पूरा किया और उन्हें अच्छा रिटर्न भी हासिल हुआ। कोई भी फंड हो, उसे इस बात का पता होता है कि वेंचर कैपिटल सबसे जोखिम भरा ऐसट होता है, इसलिए उनकी फंडिंग का बेहद छोटा हिस्सा इसमें खर्च होता है। मैं यह मानता हूं कि लिमिटेड पार्टनर्स बेहद धैर्यवान हैं और वेंचर कैपिटल क्लास में निवेश के पीछे एक खास वजह भी है। रिटर्न (30% आईआरआर या 40% आईआरआर) के साथ-साथ, वे ऐसे स्टार्टअप्स में निवेश करना चाहते हैं, जो वैश्विक परिदृश्य को बेहतर बनाने की दिशा में काम कर रहे हों।

मैं मानता हूं कि आने वाले 5-7 सालों में वक्त बता देगा और मैं इस बात पर काफी हद तक आश्वस्त हूं कि यह स्पष्ट हो जाएगा कि इस क्षेत्र में कौन यहीं पर रहने वाला है और कौन बेहतर परिणाम हासिल करके आगे बढ़ने वाला है।

श्रद्धाः क्या आपको लगता है कि भारत में किसी भी इन्फ्रास्ट्रक्चर को डिवेलप में अधिक समय लगता है? उदाहरण के तौर पर हमारे पास ई-कॉमर्स है, लेकिन उसके इन्फ्रास्ट्रक्चर को खड़े होने में काफी वक्त लग गया...

सतीश आंद्रा: इन्फ्रास्ट्रक्चर डिवेलप करना पूरे स्टार्टअप ईकोसिस्टम के लिए मायने रखता है। मैं मानता हूं कि रिटर्न्स बेहद जरूरी हैं और इन्हीं से ईकोसिस्टम को ईंधन मिलता है। अगर आप गूगल, सिस्को, ऐमजॉन, ऐपल, इंटेलके बारे में बात करें तो ये कंपनियां स्टार्टअप्स पर पैसे लगा रही हैं, और सिलिकन वैली में सबसे ज्यादा कंपनियों का विलय और अधिग्रहण भी इन्हीं के द्वारा किया जा रहा है।

इन कंपनियों के बड़े निवेश उपलब्ध कराने की वजह यही है कि उनके पास मार्केट कैपिटलाइजेशन के रास्ते खुले हैं, जिसके लिए वह अपनी गति और मार्केट लीडरशिप का इस्तेमाल करते हैं। उन्हें इसे तैयार करने में 100 सालों का समय नहीं लगा। ये कंपनियां मार्केटिंग में इनोवेशन और उपयुक्त समय के महत्व को समझती हैं और इसलिए उन्हें पता होता है कि किस समय पर कौन सा इनोवेशन लाना चाहिए और इस क्षेत्र में वे कहां तक जा सकते हैं। 90 के दशक के आखिरी दौर में एक वक्त था, जब सिस्को ने 600 मिलियन डॉलर खर्च करके चार कंपनियां खरीद लीं। सभी ने, सिस्को के इस कदम पर सवाल उठाया। सिस्को ने महज एक साल के भीतर इन चार कंपनियों से 2 बिलियन डॉलर का बिजनस किया।

भारत के सामने यही चुनौती है कि कोई भी समर्थ खरीददार या बड़ा निवेशक, तेजी से मार्केट ओनरशिप बढ़ाने के बारे में नहीं सोचता। इससे इतर उनकी अवधारणा है कि वह सब कुछ खुद ही तैयार करेंगे, भले ही इसमें 10-15 तक का समय क्यों न लग जाए। भारत के संदर्भ में अगर बात करें तो रेडबस, फ्रीचार्ज और टैक्सी फॉर श्योर जैसी कंपनियां काफी भाग्यशाली रहीं और उन्हें समय पर एग्जिट और पर्याप्त वैल्यू मिल गईजब मिंत्रा को पर्याप्त वैल्यूएशन मिला, तब कर्मचारी और निवेशक इससे खुश थे और मैं सोचता हूं कि यह ईकोसिस्टम के लिए बेहतर है।

दूसरा मुद्दा है कि हमारे बाजार काफी छोटे हैं। अगर आप आस-पास के देशों के मार्केट तक नहीं पहुंचेंगे, तो आप 100 मिलियन का रेवेन्यू नहीं पैदा कर पाएंगे। मैं ओवरऑल ट्रांजैक्शन के बारे में नहीं बल्कि रियल रेवेन्यू के बारे में बात कर रहा हूं ताकि आपके पास 10-20 मिलियन डॉलर का नेट प्रॉफिट बच सके। मुझे इस चुनौती की दिशा में कुछ सकारात्मक पहलू दिखते हैं लेकिन अभी भी मुझे लगता है कि यह समय लेगा।

डॉ. रमेश बायरापनेनीः हेल्थकेयर सेक्टर बाकी सेक्टरों की तुलना में बदलाव के लिए अधिक समय लेता है। किसी भी मेडिकल रिपोर्ट, मेडिकल डिवाइस या फिर डिजिटल हेल्थ के लिए भी आपको नियामक इकाईयों से अनुमति लेनी पड़ती है और उनकी अपनी लंबी टाइमलाइन होती है। इसके अतिरिक्त, बायोटेक, फार्मा और मेडिकल डिवाइस कंपनियों के लिए आपको मार्केट में उतरने और सेल से पहले क्लीनिकल ट्रायल्स करने पड़ते हैं और अप्रूवल लेना पड़ता है। कंपनी की रियल-वैल्यू में इजाफा, 10-20 साल बाद तक शुरू हो पाता है।

2018 के लिए क्या है निवेश की रणनीति

श्रद्धाः 2018 के लिए एंडियाकी क्या योजना है, क्योंकि मार्केट में हमने अभी उतनेज्यादा शुरूआती स्तर के निवेश नहीं देखे हैं?

सतीशः 2017 में हम काफी कार्यशील रहे और 2018 से भी हमें यही उम्मीद है। 2018 के पहले 6 महीनों में हमारी 4-5 नए निवेश करने की योजना है। मुझे लगता है कि अगले साल हमें अपने भविष्य पर बैठकर मंथन भी करना होगा। जिन कंपनियों में हमने निवेश किया है, उनमें से ज्यादातर में हमने सीरीज-ए राउंड में ही निवेश किया। आगे के लिए हमारे पास 15-16 कंपनियों का पोर्टफोलियो है और योजना है कि हर कंपनी में 10-15 करोड़ रुपए तक का निवेश किया जाए।

श्रद्धाः एक्जिट की अवधारणा को ध्यान में रखते हुए क्या आप 10 साल में एक सायकल पूरी करने की योजना बना रहे हैं?

सतीशः हेल्थकेयर से इतर, तकनीक के क्षेत्र में प्रोडक्ट-मार्केट के तालमेल को समझने में 2 साल का वक्त लगेगा। जैसे ही यह तालमेल बैठ जाता है, आपको तीसरे से पांचवे साल तक अच्छी गति मिलती है।

एक बार गति पकड़ने के बाद, सबकुछ ऑन्त्रप्रन्योर पर निर्भर करता है। अगर वह सोचता है कि कोई मेरी यात्रा को रोकना चाहता है और मेरे पास रुकने की एक अच्छी वजह है, तो वह रोमांचित हो जाता है और इसके चलते होता है ‘एग्जिट’।

अगर वे चाहें तो सीरीज-बी और सीरीज-सी फंडिंग तक भी जा सकते हैं। एक ऑन्त्रप्रन्योर के पास सिर्फ उनकी कंपनी ही होती है, लेकिन वेंचर कैपिटलिस्ट के लिए पोर्टफोलिया मायने रखता है।

आपको भले ही 20 गुना नहीं, बल्कि 4 या 6 गुना रिटर्न मिल रहा हो, लेकिन ऑन्त्रप्रन्योर का फैसला, वेंचर कैपिटलिस्ट से अधिक मायने रखता है।

श्रद्धाः हम चाहते हैं कि आप जैसे निवेशक, निवेश के स्तर को और बढ़ाएं, क्या आपका भी कुछ ऐसा ही विचार है?

सतीशः इस संबंध में आपको ऑन्त्रप्रन्योर्स से व्यक्तिगत तौर पर बात करनी चाहिए और जानना चाहिए कि वे क्या चाहते हैं।

हम बहुत बड़े फंड के बारे में नहीं सोच रहे हैं। मुझे लगता है कि 500 करोड़ रुपए तक का फंड, भारतीय बाजार के लिए पर्याप्त है। आपके पोर्टफोलियो में 18-20 कंपनियां हो सकती हैं और हर एक के लिए आपके पास 20 करोड़ रुपए तक का फंड हो सकता है।

श्रद्धाः आपकी रणनीति, विभिन्न चरणों में प्रतिभागिता के साथ निवेश करने की ही रहेगी?

सतीशः जी, बिल्कुल। हम मानते हैं कि हमें हर कंपनी के लिए 3-4 मिलियन डॉलर की जरूरत होगी और उसके बाद हम काम शुरू कर सकते हैं। कई बड़े ब्रैंड वाले वेंचर कैपिटलिस्ट भी हैं, जो और भी बड़े निवेश की क्षमता रखते हैं और वे पहले ही से स्टार्टअप्स में बड़े निवेश की तैयार करके बैठे हैं। हम उम्मीद करते हैं कि हमारे पोर्टफोलियो में शामिल कंपनियां बेहतर प्रदर्शन करेंगी और भविष्य में इस तरह के फंड्स से और भी बड़ा निवेश हासिल कर सकेंगी।

क्या हैं चुनौतियां

श्रद्धाः अगर आपको सबसे बड़ी चुनौती के बारे में बताना हो तो आप क्या कहेंगे? क्या इनमें से कुछ ने आपकी रातों की नींद तक उड़ा रखी है?

डॉ. रमेशः कई बार लोग मुझसे पूछते हैं कि क्या निवेश करना, ऐंजियोप्लास्टी करने से भी जटिल काम है? तब मैं जवाब देता हूं कि ऐंजियोप्लास्टी, निवेश का फैसला लेने से बहुत आसान है। आप अपने लंबे अनुभव के आधार का भविष्य को प्रभावित करने वाला एक बड़ा निर्णय ले रहे होते हैं और एक आइडिया पर जुआं खेल रहे होते हैं।

यह कोई ऐसा काम नहीं है, जो रोज परेशानी का सबब बनता हो। कई बार हायरिंग में कमियां रह जाती हैं। कई बार अप्रूवल में दिक्कतें पेश आती हैं, लेकिन आपको चलते रहना होता है।

अभिषेकः मैं इसे चिंता का सबब नहीं कहूंगा, बल्कि चीजों को सही दिशा में रखने की जद्दोजहद को मैं काफी रोमांचक मानता हूं।

सतीशः यह कहना कि इस काम में कोई स्ट्रेस या चिंता नहीं है, यह संभव नहीं है। मैं मानता हूं कि कई मौकों पर काफी तनाव होता है। सही समय पर पैसा इकट्ठा करना, बेहद जरूरी होता है। निवेशकों और ऑन्त्रप्रन्योर्स के बीच तालमेल बैठाना काफी महत्वपूर्ण होता है। आपकी चूक से कंपनी गलत दिशा में जा सकती है।

संपर्क के माध्यम

श्रद्धाः ऑन्त्रप्रन्योर्स के पास आप तक पहुंचने का सबसे सही तरीका कौन सा है?

अभिषेकः सभी तरह के संपर्क माध्यम हाजिर हैं। सबसे पहले तो हमारी वेबसाइट, जिसमें सारी जानकारी उपलब्ध है।

श्रद्धाः क्या आपको वेबसाइट के जरिए डील्स मिलती हैं?

अभिषेकः हम इस बात पर खास तवज्जो देते हैं कि सभी चीजें सही से काम करें। हमारी एक आंतरिक प्रक्रिया भी है। हालिया दौर में, लिंकडिन और अन्य सोशल चैनल्स भी हैं। मैं मानता हूं कि यह काफी सहज हो गया है।

श्रद्धाः कई वेंचर कैपिटलिस्ट्स ऐसे हैं, जिनके साथ ऐसा नहीं है...

डॉ. रमेशः हमारे पास सभी डील्स, पर्सनल ईमेल्स, वेबसाइट या लिंकडिन के जरिए ही आती हैं और हम हर हफ्ते इन्हें रिव्यू करते हैं।

श्रद्धाः तो आप लोग कुछ मिस नहीं करते...

सतीशः हमारे पास डील्स के रिव्यू के लिए एक पूरी आंतरिक प्रक्रिया है। हम तक पहुंचने का सबसे सहज तरीका है कि आप या तो किसी रेफरेंस के जरिए आएं या फिर लिंकडिन जैसे सोशल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करें। आप हम तक अपने काम की जानकारी पहुंचा सकते हैं। हमारी प्रक्रिया बेहद सहज है। अगर हमें ‘न’ कहना होगा, हम जल्द ही आपको सूचित कर देंगे, लेकिन हम आपको जवाब जरूर देंगे।

(ये इंटरव्यू योरस्टोरी की सीईओ और फाउंडर श्रद्धा शर्मा के अंग्रेजी इंटरव्यू का अनुवाद है। इसे अंग्रेजी में भी पढ़ें।)

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