कैनवास में रंगों से खेलने और मोबाइल फ़ोन के खेलों में रंग भरने में महारत रखने वाले चित्रकार हैं डिम्पल मैसुरिया

डिम्पल कुमार मैसुरिया का नाम जितना रोचक है, उससे कहीं ज्यादा रोचक उनकी कहानी है। ये कहानी मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मे एक ऐसे शख़्स की है, जिसने अपनी चित्रकला से मोबाइल गेमिंग की दुनिया में अपनी बेहद ख़ास पहचान बनाई है। सबसे ख़ास बात ये है कि डिम्पल अपनी कला को कुछ इस तरह से निखारते चले गए कि उनकी ज़िंदगी एक शानदार और बेमिसाल तस्वीर की तरह बन गयी। उनके बनाये चित्रों की तरह ही डिम्पल की ज़िंदगी में अलग-अलग रंग हैं और हर रंग का अपना अलग महत्त्व है। डिम्पल की ज़िंदगी की तस्वीर में जहाँ संघर्ष का गाढ़ा रंग है, वहीं कामयाबी का सुनहरा रंग भी है। उनकी ज़िंदगी में विस्मय के अलग-अलग अनोखे रंगों के साथ संतुष्टि और संतोष के दिलकश रंग भी हैं। एक मायने में कहानी रंगों की है, जीवन में रंगों के महत्त्व की है और ऐसी तस्वीर की है, जिसमें एक कामयाब ज़िंदगी को साझा करने वाले सभी रंग अपनी-अपनी माकूल जगह पर मौजूद हैं।

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वैसे तो डिम्पल नाम ज्यादातर लड़कियों का ही होता है, लेकिन कुछ लड़के भी हैं, जिनका नाम डिम्पल है और इन्हीं में से एक हैं डिम्पल कुमार मैसुरिया। नाम के साथ ‘कुमार’ जुड़ा हुआ है, इसी वजह से आभास हो जाता है कि ये डिम्पल पुरुष हैं। उनका नाम डिम्पल रखे जाने के पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है। उनके पिता पर राज कपूर की फिल्म ‘बॉबी’ का जादू कुछ इस तरह छाया था कि उन्होंने अपने बेटे को फिल्म की नायिका डिम्पल कपाडिया का नाम दे दिया। अगर उनके कुलनाम की बात की जाय तो उसे सुनकर भी ज्यादातर लोग यही समझेंगे कि उनका ताल्लुक कर्नाटक के मैसूर शहर से होगा लेकिन, ऐसा नहीं है। डिम्पल का ताल्लुक मैसूर से बहुत दूर, लगभग 1300 किलोमीटर दूर गुजरात के सूरत शहर से है। मैसूर से उनके घर-परिवार का कोई ताल्लुक नहीं है। ताल्लुक है भी तो वैसा ही है जैसा भारत के दूसरे हिस्सों में रहने वाले लोगों का मैसूर से है।

डिम्पल के पिता छोटू भाई मैसुरिया भी बहुत ही अलग किस्म के इंसान थे। वे धार्मिक प्रवृत्ति के थे और उनमें सेवा-भाव कूट-कूट कर भरा हुआ था। उनका स्वभाव आम लोगों जैसा नहीं था। अचानक ही वो सब कुछ छोड़कर मंदिर या किसी आश्रम चले जाते। घर-परिवार से दूर जाकर लोगों की सेवा करते। फिर अचानक मन बदलता तो घर आ जाते। छोटू भाई मैसुरिया ने तीन साल तक ‘नर्मदा परिक्रमा’ की। इस तीर्थ-यात्रा के तहत उन्होंने नर्मदा नदी की परिक्रमा पैदल चलकर ही पूरी की थी। ऐसा भी नहीं था कि छोटू भाई काम नहीं करते थे। वे कपड़े की मिल में ‘डाईंग मास्टर’ जैसे बड़े ओहदे पर थे। बीएससी पास थे, जोकि उस ज़माने में बहुत बड़ी बात थी, लेकिन मन चंचल था और स्वभाव ऐसा कि जिस के बारे में कोई भी सही पूर्वानुमान नहीं लगा सकता था। पिता के इसी स्वभाव की वजह से डिम्पल की पढ़ाई में काफी बाधाएँ आयीं। उन्हें पढ़ने के लिए कुछ दिन अपने मामा के यहाँ जाकर भी रहना पड़ा।

किसी तरह से घर-परिवार के कामकाज और डिम्पल की पढ़ाई चलती रही, लेकिन जब डिम्पल आठवीं में थे, तब सब कुछ अचानक एकाएक बदल गया। घर-परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। डिम्पल की माँ रंजनबेन की तबीयत अचानक खराब हो गयी। रंजन बेन पर घर-परिवार की कई सारी बड़ी जिम्मेदारियाँ थीं। पति की लम्बी गैर-मौजूदगी में भी वे अपने दो बच्चों - डिम्पल और उनकी बड़ी बहन दीपिका – का पालन-पोषण करती थीं। छोटू भाई भी रंजन बेन के भरोसे पर ही घर-परिवार छोड़कर तीर्थ-यात्राओं और सेवा-कार्यक्रमों में चले जाते थे। चूँकि रंजन बेन की हालत बहुत बिगड़ गयी थी, अब सबके लिए घर पर रहना ज़रूरी हो गया। जांच में पता चला कि रंजन बेन को कैंसर हो गया है। कैंसर के इलाज में बहुत रुपये खर्च हो गए। हालत इतनी खराब हुई कि डिम्पल और उनकी बड़ी बहन को पढ़ाई बीच में ही रोकनी पड़ी। पिता को भी सारे धार्मिक और सामाजिक काम रोक कर नौकरी करनी पड़ी। हर मुमकिन कोशिश के बाद भी रंजन बेन की जान नहीं बचाई जा सकी।

रंजन बेन की मौत से लगे सदमे से उबरने में सभी को काफी समय लगा। छोटू भाई को भी अहसास हो गया कि अब उन्हें ही घर-परिवार की सारी जिम्मेदारियाँ उठानी हैं। उन्होंने भी बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए ये फैसला कर लिया कि वे कोई ऐसा काम नहीं करेंगे, जिससे उनके बच्चों को कोई नुक्सान हो। चूँकि बी एससी पास थे, उन्हें एक गुरुकुल पाठशाला में नौकरी मिल गयी। डिम्पल को दसवीं की पढ़ाई के लिए हॉस्टल में डाला गया।हॉस्टल में रहने और वहीं पढ़ने-लिखने का फायदा भी डिम्पल हो हुआ। वे अच्छे नंबरों से दसवीं पास हो गए। चूँकि बचपन से ही चित्रकला का शौक था डिम्पल ने बलसाड़ जिले के अमलसाड़ के बी. ए. मेहता कला महाविद्यालय में दाख़िला ले लिया और डिप्लोमा इन फ़ाइन आर्ट्स का कोर्स ज्वाइन किया। कॉलेज जाने के लिए डिम्पल को सुबह बहुत जल्दी उठना पड़ता था। वे साढ़े पांच बजे ही घर से निकल जाते। अमलसाड़ के लिए ट्रेन सुबह को ही थी। यही वजह थी कि वे जल्दी उठते और तैयार होकर सूरत रेलवे स्टेशन चले जाते। अमलसाड़ से कॉलेज की तीन किलोमीटर की दूरी उन्हें पैदल ही तय करनी पड़ती। जिन दिनों डिम्पल अपने मामा के यहाँ गाँव में होते, तब उन्हें और भी जल्दी तड़के चार बजे उठना पड़ता। वे गाँव से सूरत तक सात किलोमीटर की दूरी साइकिल से तय करते और फिर ट्रेन से अमलसाड़ पहुँचते। चूँकि जल्दी उठकर कॉलेज जाना होता और घर पर उतनी जल्दी खाना बनाना भी मुश्किल था, डिम्पल अपने कॉलेज में साथियों और दोस्तों के टिफ़िन बॉक्स से कुछ खा-पी लेते थे।

चित्रकला से लगाव इतना था कि बुरे से बुरे हालात में भी कॉलेज जाना नहीं छोड़ा। डिम्पल ने बताया,“बचपन से ही मुझे ड्राइंग का शौक था। मैं तरह-तरह के चित्र बनाता था। मैंने कई ड्राइंग कम्पटीशन में भी हिस्सा लिया। मैं हमेशा फ़र्स्ट आया या फिर सेकंड। मुझे कला महाविद्यालय में बहुत कुछ सीखने को मिल रहा था। मेरा मन सिर्फ और सिर्फ पेंटिंग में ही था।” बी. ए. मेहता कला महाविद्यालय में चित्रकला के गुर सीखते हुए ही डिम्पल को ये अहसास भी हो गया था कि आगे चलकर चित्रकला ही उनका पेशा बनेगी। यही वजह भी थी वे खूब मन लगाकर चित्रकला के अलग-अलग पहलुओं को सीखने लगे। डिप्लोमा कोर्स के आख़िरी साल तक डिम्पल हमेशा अपनी क्लास में सेकंड आये थे, लेकिन उन्होंने ठान ली थी कि आख़िरी साल में हर हाल में फ़र्स्ट आना है। इसके लिए उन्होंने अपने स्वभाव और कामकाज के तरीके में बदलाव लाया।

डिम्पल ने बताया, “शुरू में मैं ड्राइंग में उतना तेज नहीं था। मेरा काम एवरेज था। मैंने धीरे-धीरे सुधार किया और आगे बढ़ा। मैं दूसरों की बहुत मदद करता था। कॉलेज में जो दूसरे विद्यार्थी थे, मैं उनकी मदद करता था। परीक्षा में भी मैंने अपना काम छोड़कर दूसरों की मदद की थी। मैं साथियों को बताता था कि किस तरह से पेंटिंग करने पर वो पास होंगे। मेरी मदद की वजह से ही कई लोग पास हुए थे, लेकिन फाइनल ईयर में मैंने ठान ली कि मुझे फ़र्स्ट आना है। मुझे एहसास हुआ कि अभी नहीं तो फिर कभी नहीं होगा। मैंने मेहनत की और मैं फ़र्स्ट आ गया।” ख़ास बात ये भी रही कि डिप्लोमा का कोर्स पूरा होने से पहले ही डिम्पल को नौकरी का आश्वासन मिल गया था। जिस गुरुकुल में डिम्पल के पिता पढ़ाते थे वहीं के ड्राइंग मास्टर अनिल यादव ने उन्हें गजानंद पुस्तकालय में नौकरी पर लगाने के भरोसा दिलाया था।डिम्पल के शब्दों में, “ये मेरी पहली नौकरी थी। गजानंद पुस्तकालय में मुझे इलस्ट्रेशन का काम सौंपा गया। दिन में तीन घंटे का काम था और मेरी तनख़्वा 1800 रुपये महीना तय की गयी थी। मैं बहुत खुश हुआ।”

गजानंद पुस्तकालय में उन दिनों किताबें भी छपती थीं। इन्हीं किताबों के लिए डिम्पल को इलस्ट्रेशन का काम मिला था। डिम्पल को नौकरी तो मिल ही गयी थी, साथ में कंप्यूटर पर काम करने का मौका भी मिला था। ये सोने पर सुहागा था। गजानंद पुस्तकालय में कंप्यूटर थे, लेकिन कोई भी उनका इस्तेमाल नहीं करता था। कंप्यूटर में डिम्पल को नए अवसर मिले। ये पहला मौका था, जब डिम्पल कंप्यूटर पर काम कर रहे थे। और शायद उन्हें तब इस बात का एहसास भी नहीं था कि यही कंप्यूटर उनकी चित्रकला को एक ऐसे मुकाम पर पहुंचा देगा, जहाँ उनका खूब नाम भी होगा और गरीबी-परेशानी भी दूर होगी।

चूँकि गजानंद पुस्तकालय में सिर्फ तीन घंटे का काम था, डिम्पल के पास काफी समय बचता था। खाली रहना डिम्पल को बहुत खलता भी था। वे दूसरी नौकरी भी करना चाहते थे। इसी दौरान उनकी मुलाक़ात उनके एक सीनियर – जिगनेश झरिवाला से हुई, जो एक बिल्डर के यहाँ ग्लास पेंटिंग का काम करता था। कॉलेज का ये सीनियर डिम्पल का दोस्त भी था। उसने डिम्पल की मनोदशा को जानकार उसे भी ग्लास पेंटिंग के काम परलगवा दिया था। डिम्पल अब दिन में 12 बजे से 3 बजे तक गजानन पुस्तकालय में और फिर 3 से 6 बजे तक ग्लास पेंटिंग का काम करने लगे। डिम्पल के इस दोस्त के उस बिल्डर से अच्छे सम्बन्ध थे और इसी वजह से उसके पास हमेशा काम रहता था। डिम्पल को भी उसने अपने साथ जोड़ लिया था ताकि उसकी भी मदद हो जाय। डिम्पल अब मकानों में सजावट के लिए लगाये जाने वाले ग्लास पर पेंटिंग करने लगे। काम में महारत थी इसी वजह से खूब तारीफ होने लगी। दिन बीतते गए, काम बढ़ता गया। काम बढ़ने का सीधा मतलब था कमाई का भी बढ़ना।

पिता और डिम्पल दोनों अब कमाने लगे थे, इसी वजह से घर की हालत भी सुधरी। ज़िंदगी वापस पटरी पर लौट आयी। और यही वक्त भी था जहाँ से डिम्पल की तरक्की और शोहरत की गाड़ी ने ऐसी रफ़्तार पकड़ी की फिर उसने रुकने का नाम ही नहीं लिया। बड़े महत्त्व वाली बात ये भी है कि डिम्पल की ज़िंदगी में नए-नए बदलाव आये। अलग-अलग जगह काम करने के अवसर मिले। बड़े-बड़े लोगों से मिलने और उन्हें अपनी काबिलियत और चित्रकला से प्रभावित करने कामौका भी मिला।

ज़िंदगी ने कई बार करवट भी बदली। कई दिलचस्प घटनाएं हुईं। कहानी में कई दिलचस्प पहलू जुड़े। चूँकि चित्र बनाने की कला भी लगातार निखरती ही चली गयी किस्मत ने भी उनका साथ नहीं छोड़ा। एक दिन जिगनेश झरिवाला ने डिम्पल को बताया कि वो एनीमेशन का कोर्स करने के लिए बाहर जाने वाला है और अब से ग्लास पेंटिंग का सारा काम उन्हें ही संभालना होगा। डिम्पल को काम की ज़रुरत थी, इसी वजह से उन्होंने अपनी हामी भर दी। डिम्पल के लिए ग्लास पेंटिंग का काम अब ‘फुल टाइम’ हो गया था और उनकी तनख्वा भी बढ़कर दस हज़ार रुपये महीना हो गयी थी। बिल्डर डिम्पल को ज्यादा काम करने पर एक अतिरिक्तघंटे के लिए दो सौ रुपये भी देने लगा था।

चित्रकला से डिम्पल को प्रेम तो था ही, अब हुनर की वजह से उनकी आमदनी भी बढ़ गयी थी। दिन मज़े में गुजरने लगे थे। इसी बीच डिम्पल को एक बड़े मकान में इंटीरियर डेकोरेशन और ग्लास पेंटिंग का सारा कॉन्ट्रैक्ट भी मिल गया था। डिम्पल ने मकान मालिक को कोटेशन भी दे दी। डिम्पल को लगा कि अब उनकी ज़िंदगी सेट हो गयी है। वे इंटीरियर डेकोरेशन और ग्लास पेंटिंग करते हुए ही अपनी ज़िंदगी आगे बढ़ाने वाले हैं। लेकिन उन्हें इस बात का आभास नहीं था कि उनकी ज़िंदगी में फिर से कुछ नया और बड़ा होने वाला है।

एनीमेशन का कोर्स पूरा करने के बाद जिगनेश झरिवाला वापस डिम्पल के पास लौटा। उसने डिम्पल को बताया कि उनका एक पुराना साथी केरल में बड़ी कंपनी में बड़े ओहदे पर काम कर रहा है और उसने उसे नौकरी पर रखवाने के लिए इंटरव्यू पर बुलाया है। जिगनेश झरिवाला ने डिम्पल को भी अपने साथ केरल चलने को कहा। जिगनेश अकेला नहीं जाना चाहता था, इसी वजह से वो अपने दोस्त डिम्पल को अपने साथ केरल ले जाने का इच्छुक था। जिगनेश ने डिम्पल से कहा कि जब तक वो अपना इंटरव्यू पूरा कर लेगा तब वो केरल घूम लेगा। चूँकि जिगनेश ने नौकरी पर लगाया था और लाइफ सेट की थी डिम्पल खुद को उसका एहसानमंद मानते थे। इसी वजह से उन्हें केरल चलने के प्रस्ताव को मानना पड़ा।

केरल में जो कुछ हुआ उससे डिम्पल को एक झटका तो लगा, लेकिन उनकी ज़िंदगी एक मामूली चित्रकार और ग्लास पेंटर से ऊंची उठकर भारत के बड़े कलाकार की हो गयी। डिम्पल और उनका दोस्त जिगनेश जैसा सोचकर गए थे बिलकुल उसके उलट हुआ। शायद किस्मत ही डिम्पल को केरल ले गयी थी। हुआ ये था कि केरल में डिम्पल को नौकरी मिल गयी, जबकि उनके दोस्त जिगनेश को खाली हाथ लौटना पड़ा था।

जब डिम्पल और उनका दोस्त केरल पहुंचे थे तब उनके दोस्त को ये पता चला कि ‘टून्ज़ एनिमेटर्स’ नाम की कंपनी में बैकग्राउंड डिपार्टमेंट में कुछ नौकरियाँ खाली हैं। इसी कंपनी में डिम्पल का सहपाठी समीर भावसार बतौर एनिमेटर काम करता था। समीर वही शख्स था जो क्लास में फर्स्ट आता था। और समीर ने ही जिगनेश को केरल बुलाया था ताकि वो भी अपनी किस्मत ‘टून्ज़ एनिमेटर्स’ में आजमा सके। जिगनेश और समीर ने अपने दोस्त डिम्पल को बैकग्राउंड डिपार्टमेंट में नौकरी के लिए “ट्राइ” करने की सलाह दी। इन नौकरियों के लिए भारत-भर से लोग आये हुए थे। डिम्पल की तरह ही ट्राइ करने वाले कम थे और पूरी ताकत लगाकर नौकरी पाने की कोशिश करने वाले ज्यादा। डिम्पल ने तभी दो कलाकृतियाँ बनायीं और दीं। ये कलाकृतियाँ ‘टून्ज़ एनिमेटर्स’ के लोगों को इतनी पसंद आयीं कि उन्होंने डिम्पल को झट से नौकरी पर रखने का फैसला कर लिया ।जहाँ डिम्पल को नौकरी आसानी से मिल गयी थी वहीं उनके दोस्त जिगनेश को नौकरी नहीं मिली। ये घटना साल 2000 की है।

निराश जिगनेश को गुजरात लौटना पड़ा, लेकिन डिम्पल को केरल में नौकरी क्या मिली दक्षिण भारत उनके लिए कामयाबी, शोहरत, धन-दौलत दिलाने वाली जगह बन गयी। शुरू में पिता और बहन ने घर से बहुत दूर नौकरी करने के लिए मना किया था, लेकिन डिम्पल उन्हें मनाने में कामयाब हुए थे। डिम्पल का काम आगे भी ऐसा शानदार रहा कि सभी ने उनका लोहा माना। ‘टून्ज़ एनिमेटर्स’ में एक बढ़िया कलाकार के रूप में उन्हें खूब पहचान मिली। ‘टून्ज़ एनिमेटर्स’ में काम करते हुए उनका मन ‘थ्री डी’ पर जा टिका। डिम्पल ने अब ‘थ्री डी’ का काम भी सीखना शुरू कर दिया। ‘टून्ज़ एनिमेटर्स’ से डिम्पल की एक नयी ज़िंदगी की शुरुआत हुई। उन्हें लगातार बड़ी कंपनियों में बड़ी नौकरी मिलती चली गयी।

‘टून्ज़ एनिमेटर्स’ के आर्ट डायरेक्टर धीमंत व्यास के कहने पर वे भी उनके साथ ‘टाटा इंटरैक्टिव’ चले गए। धीमंत व्यास वही नामचीन क्ले एनिमेटर हैं, जिन्होंने “तारे ज़मीन पर” फिल्म में अपने काम से लाखों लोगों का मन मोह लिया था।‘टाटा इंटरैक्टिव’ के बाद डिम्पल के लिए नया पड़ाव था ‘इंडिया गेम्स’। ‘इंडिया गेम्स’ में डिम्पल को गेमिंग की दुनिया से जोड़ा। यहाँ पर भी डिम्पल की कला, प्रतिभा और काबिलियत की खूब सराहना हुई। उन्होंने बड़ी-बड़ी जिम्मेदारियां बखूबी निभाईं और खूब नाम कमाया।

चूँकि डिम्पल का मन ‘थ्री डी’ में रम चुका था, उन्होंने ‘इंडिया गेम्स’ की नौकरी छोड़ दी और ‘एफएक्स लब्स’ चले गए। इससे पहले डिम्पल ने कभी भी ‘थ्री डी’ में काम नहीं किया था, लेकिन जब काम करना शुरू किया तो अपनी प्रतिभा से सभी को चौंका दिया। डिम्पल ने ‘एफएक्स लब्स’ में काम करते हुए भारत का पहला पर्सनल कंप्यूटर गेम “अग्नि” बनाने में बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। “हनुमान” नाम से जो गेम बना उसमें भी डिम्पल का जो योगदान था उसे खूब सराहा गया।

...लेकिन दुनिया में आयी आर्थिक मंदी की वजह से ‘एफएक्स लब्स’ भी संकट में आ गयी। कंपनी में काम ना के बराबर हो गया। डिम्पल ने जुलाई २००९ में ‘एक्सिगेंट गेम आर्ट प्राइवेट लिमिटेड’ नाम की कंपनी ज्वाइन की। यहाँ पर भी वे कलाकारों/चित्रकारों की टीम के मुखिया रहे। डिम्पल की ज़िंदगी में बड़ा बदलाव उस समय आया जब उन्हें बहुराष्ट्रीय कंपनी ‘ज़िंगा ’ में काम करने का मौका मिला। ‘ज़िंगा ’ ने साल २०१० में भारत में अपने काम को शुरू किया और तेज़ी से आगे बढ़ाना शुरू किया था। चूँकि एनीमेशन, गेमिंग की दुनिया में डिम्पल ने अपनी कला और प्रतिभा के बल पर खूब नाम कमा लिया था, ज़िंगा ने उन्हें अपना बनाने की सोची और नौकरी की पेशकश की। तनख्वा तगड़ी थी, कंपनी बड़ी और मशहूर थी, काम पसंद का था इसी वजह से डिम्पल ने ज्यादा सोचे बगैर नौकरी की पेशकश मान ली। वे ‘ज़िंगा’ के लिए भारत में पहले आर्टिस्ट बने। शुरूआती दिनों में डिम्पल को सन फ्रांसिस्को में बनाया गए गेम्स को भारत के अनुरूप ट्रांजीशन करने का काम सौंपा गया। काफी मेहनत वाले इस काम को डिम्पल ने अपनी लगन और काबिलियत से बखूबी और शानदार तरीके से अंजाम दिया। डिम्पल ने ‘फिश विल्ले’ , ‘वैम्पायर वार’ जैसे गेम्स के अलावा ‘यो विल्ले’ जैसे बड़े गेम की भी ट्रांजीशन की।

‘ज़िंगा’ के लिए ही काम करते हुए डिम्पल को पहली बार विदेश जाने का मौका मिला। उन्हें ट्रेनिंग के लिए कम्पनी के मुख्यालय सन फ्रांसिस्को भेजा गया। डिम्पल ने कभी सोचा भी नहीं था कि वे एक दिन दुनिया की सबसे मशहूर गेमिंग कंपनी के मुख्यालय में बड़े-बड़े नामचीन तकनीशियनों से सीखेंगे और अपनी कला दिखाकर उन्हें भी अपना दीवाना बनायेंगे। अमेरिका में बिताये ये दिन उनके लिए सबसे हसीन दिनों में थे।

‘ज़िंगा’ में काम करने के दौरान ही एक बार फिर से डिम्पल की ज़िंदगी में एक और बड़ा मुकाम आया। उनके कुछ साथियों ने ‘ज़िंगा’ कंपनी को छोड़ दिया था और कुछ नया और बड़ा करने की सोच रहे थे। इन साथियों की सोच और नज़रिए से डिम्पल भी काफी प्रभावित थे। चूँकि सभी की एक जैसी सोच थी और एक जैसा लक्ष्य था, सभी साथी साथ आये और एक नयी कंपनी खोल ली। तनय तायल, अंकित जैन, कुमार पुष्पेश, ओलिवर जोंस और डिम्पल ने अपनी नई कंपनी को नाम दिया ‘मूनफ्रॉग’।

‘मूनफ्रॉग’ वही भारतीय कंपनी है जो गेमिंग की दुनिया में कामयाबी ने नए झंडे गाढ़ रही है। ‘मूनफ्रॉग’ ने काफी कम समय में ही खूब प्रसिद्धि हासिल की है। ‘मूनफ्रॉग’ के बनाये मोबाइल फ़ोन गेम्स लोगों में काफी लोकप्रिय हैं। अपने शुरुआती दिनों में विदेशी बाज़ार के लिए मोबाइल फ़ोन गेम्स बनाने वाली ये कंपनी अब भारतीय बाज़ार के लिए देशी गेम्स बना रही है। ‘तीन पत्ती गोल्ड’ गेम काफी मशहूर है। ‘मूनफ्रॉग’ की स्थापना और इसके विकास में डिम्पल का अपना महत्त्वपूर्ण योगदान है।

डिम्पल कहते हैं, “मूनफ्रॉग में मैं बहुत खुश हूँ। यहाँ बहुत अच्छे लोग हैं। काम करने में मज़ा आता है। मेरे लिए बहुत बड़ा मौका है – बड़ा काम करने का। दुनिया-भर में नाम कमाने का।”

एक सवाल के जवाब में डिम्पल ने कहा, “सपने अब भी कई सारे हैं। मैं ऐसी वाटर कलर पेंटिंग बनाना चाहता हूँ जिसे दुनिया-भर के लोग सराहें। एक अच्छे आर्टिस्ट के रूप में मैं दुनिया-भर में पहचाना जाऊं। कुछ ऐसी पेंटिंग्स बनाऊं जिन्हें, लोग मेरे न रहने के बाद भी याद करें। मैं एम एफ हुसैन जैसा बनना चाहता हूँ। ऐसा भी नहीं हैं कि मैं गेमिंग की दुनिया छोड़ दूंगा। मैं हमेशा याद रखे जाने वाले गेम्स भी बनाना चाहता हूँ।“

एक अंतरंग बातचीत के दौरान डिम्पल अपनी कामयाबी की काफी सारा श्रेय अपनी पत्नी शीतल को देने से नहीं चूके । 2005 में उनकी शादी शीतल से हुई थी । डिम्पल के मुताबिक, उनकी पत्नी ने हमेशा उनका साथ दिया । नौकरी के सिलसिले में कई तबादले हुए और इन तबादलों के दौरान भी भरपूर मदद की । पत्नी ने हमेशा प्रोत्साहित किया । इसी मदद और प्रोत्साहन की वजह से वे अपने काम पर पूरा ध्यान दे पाए ।

सच्चाई ये भी है कि आजकल मोबाइल का ज़माना है। एक मायने में सारी दुनिया मोबाइल में आकर सिमट रही है। मोबाइल फ़ोन इंसानी ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन गए हैं। मोबाइल फ़ोन के बगैर ज़िंदगी जीने की कल्पना से ही कई लोग घबरा जाते हैं। मोबाइल फ़ोन के इस दौर में गेमिंग इंडस्ट्री काफी फल-फूल रही है। मोबाइल फ़ोन का इस्तेमाल करने वाले कई लोग मनोरंजन के लिए मोबाइल फ़ोन पर गेम्स खेलते हैं। क्या बच्चे, क्या बड़े, सभी मोबाइल फ़ोन पर गेम खेलने वाले ही हैं। ऐसे दौर में लोगों को दिलो-दिमाग पर छा जाने वाले गेम्स बनाते हुए डिम्पल नित नयी ऊचाईयां छू रहे हैं।

Dr Arvind Yadav is Managing Editor (Indian Languages) in YourStory. He is a prolific writer and television editor. He is an avid traveler and also a crusader for freedom of press. In last 20 years he has travelled across India and covered important political and social activities. From 1999 to 2014 he has covered all assembly and Parliamentary elections in South India. Apart from double Masters Degree he did his doctorate in Modern Hindi criticism. He is also armed with PG Diploma in Media Laws and Psychological Counseling . Dr Yadav has work experience from AajTak/Headlines Today, IBN 7 to TV9 news network. He was instrumental in establishing India’s first end to end HD news channel – Sakshi TV.

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