सबसे अद्भुत है छठ पर्व का सांस्कृतिक पक्ष

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छठ पर्व-पूजा के मुख्य केंद्रीय राज्य बिहार में आज की सुबह सबसे निराली रही। राजधानी पटना में गंगा के 101 घाटों सहित पूरे बिहार में कल शाम डूबते सूरज को तो व्रतियों ने नमन किया ही, आज सुबह से ही उनका पार्को, तालाबों एवं घरों तथा अपार्टमेंट्स की छतों पर भी सूर्योपासना के दृश्य सुदर्शन लगे। 

छठ पूजा
छठ पूजा
इस महापर्व छठ की महिमा निराली है। ये त्यौहार सदियों से बिहारवासियों के मन में अपनी मिट्टी और संस्कृति के प्रति लगाव और महान आस्था का संगम बना हुआ है। 

आस्था के इस पर्व को देखने के लिए घाटों पर विदेशी सैलानी भी नजर आए जो अपने कैमरों में उत्सव के दृश्य सहेजते जा रहे थे। बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा आदि राज्यों में देखा गया कि घाटों पर नेताओं का आना-जाना भी लगा रहा।

बिहार की संस्कृति और सभ्यता अपने मूल अस्तित्व के साथ अपने आसपास की कई तरह की संस्कृतियों और सभ्यताओं को ओढ़े हुए, अपने अंदर पचाए हुए है। छठ यहां का लोक पर्व है, जो कभी दो दशक पहले तक इसी राज्य की परिधि में हुआ करता था, अब देश की सीमा फांद कर उन विदेशियों के बीच उत्सवी आधार ले चुका है, जहां की संस्कृति उसकी जड़ों से मेल नहीं खाती है। इस महापर्व छठ की महिमा निराली है। ये त्यौहार सदियों से बिहारवासियों के मन में अपनी मिट्टी और संस्कृति के प्रति लगाव और महान आस्था का संगम बना हुआ है। यह पर्व उन तमाम बिहारवासियों के लिए और खास हो जाता है, जो इस वक्त राज्य से बाहर देश-विदेश के किसी और हिस्से में रह रहे होते हैं।

एक ऐसी आपबीती है बिहार कैडर के आईपीएस अधिकारी कुमार आशीष की, जब वह सन 2006-07 फ्रांस में हुआ करते थे। वह बताते हैं कि 10 साल पहले जब वह फ्रांस में स्टडी टूर पर गए थे, तब वहां एक संगोष्ठी में कुछ फ्रेंच लोगों ने उनसे बिहार के बारे में रोचक और अनूठी बातें बताने की अपेक्षा की। तो उस समय उन्होंने बिहार के महापर्व छठ के बारे में विस्तार से उनलोगों को कह सुनाया। सारा किस्सा सुनने के बाद उनका कहना था कि इस विषय पर फ्रांस के साथ फ्रेंच बोलने-समझने वाले अन्य 54 देशों तक भी इस पर्व की महत्ता और पावन संदेश पहुंचाना चाहिए।

शुक्रवार 27 अक्तूबर की सुबह तो जैसे पूरी दुनिया ही छठ पर्व मनाती नजर आई। बीती शाम जहां नदियों के घाटों पर उत्सव जैसा माहौल रहा, श्रद्धालुओं की अपार भीड़ रही, छोटे-छोटे बच्चें, बड़े-बूढ़े, अंसख्य स्त्रियां घाटों पर पूजा के साथ चाट-पकौड़ियों का जायका भी लेती रही, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में छठ मैया के गीतों के झोके आते रहे, वही ढलते सूर्य को अर्घ्य देने के दौरान सेल्फी लेने वालों की रौनक भी देखते ही बन रही थी। और आज सुबह से घाट-घाट फिर वहीं श्रद्धालुओं का सैलाब। आस्था के इस पर्व को देखने के लिए घाटों पर विदेशी सैलानी भी नजर आए जो अपने कैमरों में उत्सव के दृश्य सहेजते जा रहे थे। बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा आदि राज्यों में देखा गया कि घाटों पर नेताओं का आना-जाना भी लगा रहा। घाट भोर से ही गुलजार रहे। इस दौरान घाटों को पक्का कराने की मांगें भी उठती रहीं ताकि व्रतियों को अर्घ्य देने के दौरान किसी परेशानी का सामना न करना पड़े।

छठ पर्व-पूजा के मुख्य केंद्रीय राज्य बिहार में आज की सुबह सबसे निराली रही। राजधानी पटना में गंगा के 101 घाटों सहित पूरे बिहार में कल शाम डूबते सूरज को तो व्रतियों ने नमन किया ही, आज सुबह से ही उनका पार्को, तालाबों एवं घरों तथा अपार्टमेंट्स की छतों पर भी सूर्योपासना के दृश्य सुदर्शन लगे। पूरे राज्य में चारो तरफ सुबह से ही घाटों पर बड़ी संख्या में भक्तों की भीड़ को संभालने के लिए पुलिसकर्मी तैनात रहे। मुख्य मार्गों पर जाम से निपटने के लिए यातायात पुलिस के जवान भी भोर से ही मुस्तैद रहे। व्रतियों ने उगते हुए सूर्य को अर्घ्य अर्पित किया।

इसके साथ ही छठ महापर्व संपन्न हो गया। व्रती सूर्योदय से पहले ही घाटों पर पहुंच गए थे। बिहार जैसा ही नजारा उत्तराखंड के हरिद्वार और ऋषिकेश सहित पूरे राज्य में गंगा के घाटों पर रहा। सुबह स्नान कर व्रतियों ने भास्कर देव को ऋतु फल, कंद मूल और नाना प्रकार के पकवानों से अर्घ्य देकर परिवार और राष्ट्र की सुखशांति की कामना की। कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की चतुर्थी (नहाय-खाय) से शुरू हुआ छठ महोत्सव सप्तमी शुक्रवार को उगते भास्कर देव को अर्घ्य देने के साथ ही संपन्न हो गया।

भोर की बेला में व्रती महिलाएं अपने परिवारजनों के साथ सूप तथा टोकरे में फल-पकवान लेकर छठी मइया के गीत गाते हुए गंगा तट पहुंचने लगी थीं। पहले तो कमर तक नदी में खड़ी होकर सूर्यादय की प्रतीक्षा करती रहीं। सूर्यदेव के प्रकट होते ही व्रतियों ने गाय के दूध से अर्घ्य दिया। इस दौरान खूब आतिशबाजी भी हुई। गंगा घाटों पर छठ के समापन पर लोग गाजे-बाजे के साथ पहुंचे। घंटों ढोल-नगाड़े बजते रहे।

छठ दरअसल, लोक आस्था का पर्व बन चुका है। ग्रामीण भारत का लोकमन माटी की तरह उर्वर और निर्मल होता है। छठ के घाटों से गुजरते हुए मन के भीतर कबीर बजने लगते हैं- कबीरा मन निर्मल भया, जैसे गंगा नीर...। यह पर्व पवित्रता से मनाया जाता है। साफ सफाई पर विशेष जोड़। बिना किसी सरकारी सहायता से गाम-घरों में लोगबाग सड़क से लेकर घाटों तक की सफाई कर देते हैं। घर-आंगन की तो पूछिए मत। सबकुछ चकमक, सूरज की रोशनी की तरह। मन के भीतर लालसाओं की तरह खेत पथार भी असंख्य फल-फूलों को उपजाती है, जिसे हम इस लोक पर्व में सूर्य को अर्पित करते हैं। लालसाओं के पीछे भागते मन को यह पर्व रोकने के लिए कहता है और संग ही यह भी संदेश देता है कि हम प्रकृति के समीप जाएं।

कबीर की एक वाणी याद आ रही है- मन दाता, मन लालची., मन राजा, मन रंक। लोक जीवन के इस पर्व को एक किसान के तौर पर जब हम देखते हैं तो लगता है कि किसानी कर रहे लोग कितनी सहजता और प्रेम से सबकुछ भूलकर छठ पूजा में लग जाते हैं। आलू-मक्का के नवातुर पौधों को प्रकृति के भरोसे छोड़कर छठ घाटों पर किसानों की चहलकदमी बढ़ जाती है। लोक जीवन के इस बृहद उत्सव के लिए जो सामान बटोरे जाते हैं वे सभी कृषि आधारित होते हैं। केला, नीबू, सिंघाड़ा, गन्ना, हल्दी, नारियल, अदरक...ये सभी प्रकृति के गोद से छठ पूजा के लिए तैयार घाट तक पहुंचते हैं। छठ पूजा के गीतों को यदि आप ध्यान सुनेंगे तो आप यह सब जान जाएंगे। मसलन इस गीत के शब्दों को पढिए- कवन देई के अइले जुड़वा पाहुन, केरा –नारियर अरघ लिहले। सबसे अद्भुत है छठ गीतों का सांस्कृतिक पक्ष।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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