अमेरिका में लोगों को इंडियन फूड बनाने की ट्रेनिंग देने वाली मुंबई की यामिनी

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यामिनी जोशी मूलतः मुंबई की रहने वाली हैं। वह न्यूयॉर्क अमेरिका में युवाओं को भारतीय व्यंजन बनाना सिखाती हैं। अमेरिका में दस-बारह प्रतिशत लोग ही घरेलू खाना खाते हैं। उनकी पाक कला के लोग दीवाने हैं। वह दस साल की उम्र से ही अपने पिता के लिए खाना बनाने लगी थीं, जो आज उनका मुनाफेदार पेशा बन गया है।

यामिनी जोशी
यामिनी जोशी
लीग ऑफ किचन न्यूयॉर्क में एक ऐसा प्रोग्राम चलाता है, जिसके माध्यम से अप्रवासी घरेलू खाना पकाने की ट्रेनिंग लेते हैं। यमिनी बताती हैं कि उन्होंने दस साल की उम्र से ही अपने माता-पिता के साथ खाना बनाना शुरू कर दिया था।

'इन्वेस्टमेंट बैंक यूबीएस' की एक सर्वे रिपोर्ट तैयार के मुताबिक आने वाले एक दशक के भीतर ऑनलाइन फूड इंडस्ट्री 365 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगी। मुंबई से संबंध रखने वाली प्रवासी यामिनी जोशी वैसे तो वह मैनहट्टन (न्यूयॉर्क) के जॉब करती हैं लेकिन सप्ताह में एक दिन वह स्टूडेंट्स को किचन में शुद्ध भारतीय व्यंजन पकाने का प्रशिक्षण भी देती हैं। उनके कुकिंग क्लासेज़ में स्थानीय परिवार भी भोजन बनाने की ट्रेनिंग लेने आते हैं। गौरतलब है कि अमेरिका में दस-बारह प्रतिशत लोग ही घरेलू खाना खाते हैं।

यामिनी अपने छात्रों को खाना बनाने से लेकर खाना परोसने, टेबल पर सजाने तक का प्रशिक्षण देती हैं। उनके छात्र खाना बनाते हुए हंसी मज़ाक भी करते हैं, जिससे यह उनको बोझ नहीं लगता। उनके छात्रों में कुछ पुरुष भी शामिल होते हैं। उनकी कुकिंग क्लासेज़ में आने वाले छात्रों में से ज़्यादातर को भारतीय खाने के बारे में पता होता है लेकिन वे यह नहीं जानते कि इनमें वह ज़ायका कहां से आता है। कई युवा खाना बनाना बिल्कुल नहीं जानते। वह अपने परिवार के लोगों के साथ यह सीख भी नहीं पाते। कई लोग खाना बनाने के तरीक़ों की वीडियो फ़ोटोग्राफ़ी करते हैं।

लीग ऑफ़ किचन से जुड़ी इंस्ट्रक्टर यामिनी कहती हैं कि अपने परिवार से ही उन्होंने खाना बनाने का पहला प्रशिक्षण प्राप्त किया था, और आज वह दावे के साथ साबित कर सकती हैं कि वह कोई साधारण महिला नहीं हैं। वह बाकी दूसरी महिलाओं से अलग हैं। लीग ऑफ किचन न्यूयॉर्क में एक ऐसा प्रोग्राम चलाता है, जिसके माध्यम से अप्रवासी घरेलू खाना पकाने की ट्रेनिंग लेते हैं। यमिनी बताती हैं कि उन्होंने दस साल की उम्र से ही अपने माता-पिता के साथ खाना बनाना शुरू कर दिया था। वह अपने पिता के लिए खास तौर से बड़े धार्मिक त्यौहारों के समय खाना बनाती थीं। उस समय उनके घर में अन्य महिलाओं को उनके लिए खाना बनाने की अनुमति नहीं थी।

वह 1999 में अपने पति और तीन बेटियों के साथ अमेरिका पहुंच गईं। वहां क्वींस (न्यूयॉर्क) में रहते हुए वर्षों उन्होंने मैनहट्टन में गहनों की एक कंपनी में काम किया। वर्ष 2009 तक तो वह अपने सहकर्मियों के लिए दोपहर का भोजन बनाती रहीं। उसके बाद वह खानपान व्यवसाय से जुड़ गईं। अब वह शहर के चारों ओर गैर-लाभकारी और कॉर्पोरेट घरानों के लिए भोजन तैयार करती हैं। खाना पकाने के अलावा, यामिनी पार्टियों में डांस से भी कमाई करती हैं।

यामिनी बताती हैं कि उन्हें अपने पेशे का बहुत बढ़िया अनुभव है। वह काम के दौरान अपने लोगों के साथ दोस्ताना व्यवहार रखती हैं। चाहे वह छात्र हो या इंस्ट्रक्टर। उन्हे लगता है कि भारतीय खाना पकाने का अवसर उनके लिए बेहद मुनाफे का काम है। न्यूयॉर्क में लोगों को भोजन के माध्यम से जोड़ने की एक नई परंपरा भी विकसित हो चुकी है। इससे भी उनके काम को बढ़त मिली है। उनकी रसोई में बड़े होटलों के नामी कुक भी भारतीय खाना पकाना सीखने के लिए पहुंचते रहते हैं। वह जिस ज्वैलरी कंपनी में काम करती हैं, वहां से भी उनकी अच्छी कमाई हो जाती है लेकिन उतनी आमदनी से ही न्यूयॉर्क जैसी महंगी सिटी में घर का खर्च नहीं चल पाता है। छात्रों को कुकिंग सिखाकर उनकी अच्छी कमाई हो जाती है। अब तो खाना बनाना और सिखाना उनका जुनून बन चुका है।

खाना बनाते अथवा सिखाते समय उनका सबसे ज्यादा ध्यान भोजन में बेहतर स्वाद पैदा करने पर रहता है। उनको इस बात पर गर्व भी होता है कि अमेरिका में रहने वालो के बीच उनके भारतीय भोजन का स्वाद इतना पसंद आने लगा है। अब तो जो लोग भी, न्यूयॉर्क सिटी में रहते हैं और उनकी कुकिंग क्लास के बारे में जानते हैं, उनके इस हुनर के दीवाने हो चुके हैं। प्रशिक्षण के दौरान उनके छात्र नाचते-गाते भी रहते हैं। बड़ा दिलचस्प माहौल रहता है उनके घर में। यामिनी भोजन पकाने में भारत के विभिन्न हिस्सों में प्रचलित भोजन के प्रयोग भी करती रहती हैं, मसन गुजराती खाना, बंगाली खाना, राजस्थानी और हरियाणवी व्यंजन, पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार अंचल में खाए जाने वाले भोजन आदि।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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