3 रुपये रोजाना कमाने वाले मजूमदार आज हैं 255 करोड़ की कंपनी के मालिक

दूध बेचकर खड़ा कर लिया 255 करोड़ का बिज़नेस

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 मजूमदार पश्चिम बंगाल के आठ जिलों में फैले तीन दूध प्रसंस्करण संयंत्रों और 22 दूध शीतल संयंत्रों के मालिक हैं। उनकी कंपनी रेड काव डेयरी प्राइवेट लिमिटेड आज पूर्वी भारत में दूध और दूध उत्पादों की सबसे बड़ी आपूर्तिकर्ता डेयरी है।

नारायण मजूमदार (फोटो साभार- द वीकएंड लीडर)
नारायण मजूमदार (फोटो साभार- द वीकएंड लीडर)
उन्होंने कोलकाता में 612 रुपये की मासिक वेतन में डेयरी केमिस्ट के रूप में एक आइसक्रीम कंपनी में नौकरी की लेकिन वह जल्द ही एक अन्य सहकारी डेयरी में बेहतर पदनाम और वेतन में के कारण नौकरी छोड़ चले गए।

2003 में उन्होंने इस कंपनी को रेड काव डेयरी प्राइवेट लिमिटेड में तब्दील कर दिया। जिसके निदेशक खुद पति और पत्नी थे। नारायण कहते हैं कि उनके लिए चेंजिंग मूमेंट 2009 का था जब उनके बेटे नंदन ने उनकी कंपनी ज्वाइन की।

दुग्ध उत्पादन के मामले में भारत दुनिया का सबसे बड़ा देश है। यहां लोग दूध के कारोबार से वो मुकाम हासिल कर रहे हैं जो शायद ही किसी ने किया हो। 1997 में नारायण मजुमदार ने साइकिल पर अपने गांवों के किसानों से दूध का संग्रह करके अपना डेयरी कारोबार शुरू किया था। लेकिन दो दशकों के तमाम संघर्ष के बाद आज वह 255 करोड़ रुपये का वार्षिक कारोबार कर पश्चिम बंगाल के सबसे बड़े दुग्ध व्यपारियों में से एक हैं। आज मजूमदार पश्चिम बंगाल के आठ जिलों में फैले तीन दूध प्रसंस्करण संयंत्रों और 22 दूध शीतल संयंत्रों के मालिक हैं। उनकी कंपनी रेड काव डेयरी प्राइवेट लिमिटेड आज पूर्वी भारत में दूध और दूध उत्पादों की सबसे बड़ी आपूर्तिकर्ता डेयरी है।

प्रत्येक दिन रेड काव डेयरी 1.8 लाख लीटर पैक दूध, 1.2 मीट्रिक टन पनीर, 10 मीट्रिक टन दही, 10-12 मीट्रिक टन घी, 1,500 केन रसगुल्ले के डिब्बे और 500 केन गुलाब जामुन बेचती है। इतना बड़ा कारोबार करने के बाद मजूमदार का लक्ष्य 2017-18 के लिए 300 करोड़ रुपये का कारोबार करना है। नारायण उच्च जीवन के बजाय उच्च सोच में विश्वास रखते हैं और इस शानदार सफलता को प्राप्त करने के बावजूद वह एक साधारण जीवन जी रहे हैं। 25 जुलाई 1958 को पश्चिम बंगाल के नाडिया जिले के फुलिया गांव में पैदा हुए नारायण तीन भाई-बहनों में दूसरे हैं। उनकी दो बहनें हैं। नाराय के पिता बिमलंदु मजूमदार एक किसान थे जबकि उनकी मां बसंत मजूमदार एक गृहिणी थीं।

नारायण कहते हैं, "मेरे पिता के पास गांव में एक एकड़ जमीन थी, लेकिन यह परिवार चलाने के लिए पर्याप्त नहीं था। कभी-कभी वह आय में बढ़ोतरी करने के लिए कई तरह की नौकरियां करते थे, लेकिन फिर भी वह कभी भी 100 रुपये से ज्यादा या एक महीने में पैदा नहीं कर पाते थे। ये बात तब कि है जब मेरा जन्म हुआ था। उस समय मेरे घर की वित्तीय स्थिति तनावपूर्ण थी।" हालांकि इन सभी मुश्किलों के बावजूद आज नरायण ने वो मुकाम हासिल किया है जो सभी का सपना होता है। वे कोलकाता से करीब 15 किलोमीटर दूर दानकुनी में अपने पॉश कार्यालय में बैठते हैं।

1974 में उन्होंने (नारायण) अपने गांव में एक बंगाली माध्यमिक सरकारी स्कूल फुलिया शिक्षा निकेतन से अपनी स्कूलिंग पूरी की थी। वह अभी भी याद करते हैं कि उनकी वित्तीय स्थिति इतनी बुरी थी कि उनके पिता को 1973 में अपनी बड़ी बहन की शादी के खर्च के लिए अपनी जमीन बेंचनी पड़ी थी। नारायण ने रानाघाट कॉलेज में रसायन विज्ञान में स्नातक की पढ़ाई शुरू की, लेकिन एक साल के भीतर उन्होंने इस विषय में अपनी रुचि खो दी। वे कहते हैं कि "मुझे वास्तव में रसायन विज्ञान में दिलचस्पी नहीं थी, प्लस मुझे जल्द ही कमाई करनी थी क्योंकि मेरी घर की स्थिति ठीक नहीं थी।" नारायण आगे कहते हैं कि "मेरे गांव में एक पशुपालक अधिकारी ने सलाह दी कि अगर मैं रसायन शास्त्र में सम्मान की डिग्री के बजाय डेयरी खेती में कोर्स करूँ तो मुझे जल्द ही नौकरी मिल जाएगी। मुझे उनका सुझाव पसंद आया और मैंने अपने पाठ्यक्रम को बदलने का फैसला किया।"

1975 में नारायण ने हरियाणा के करनाल स्थिति राष्ट्रीय डेयरी इंस्टीट्यूट से डेयरी टेक्नोलॉजी में बीटेक की शुरुआत की। यह चार साल का पाठ्यक्रम था। अपने रहने और पढ़ाई के खर्चे के लिए उन्होंने एक दूध विक्रेता के यहां 5 बजे से 7 बजे तक प्रत्येक दिन सेल्समैन का काम शुरू किया। नारायण याद करते हुए कहते हैं कि, "मैं रोजाना 3 रुपये कमाता था। मेरे पिता ने पहले ही 12,000 रुपये बतौर पाठ्यक्रम शुल्क का भुगतान करने के लिए अपनी जमीन का एक और हिस्सा बेच दिया था, इसलिए मैंने अपने दैनिक खर्चों के लिए काम करना शुरू कर दिया था।"

डेयरी प्लांट की तस्वीर
डेयरी प्लांट की तस्वीर

जुलाई 1979 में अपने पाठ्यक्रम को पूरा करने के बाद नारायण ने एक के बाद एक कई नौकरियां की। उन्होंने कोलकाता में 612 रुपये की मासिक वेतन में डेयरी केमिस्ट के रूप में एक आइसक्रीम कंपनी में नौकरी की लेकिन वह जल्द ही एक अन्य सहकारी डेयरी में बेहतर पदनाम और वेतन में के कारण नौकरी छोड़ चले गए। वह अब उत्तरी बंगाल के सिलिगुड़ी में एक डेयरी पर्यवेक्षक बन गए थे। नारायण कहते हैं "मैंने एक साल से भी ज्यादा समय तक काम किया लेकिन दिसंबर 1980 में इस्तीफा दे दिया क्योंकि कोलकाता की एक अन्य डेयरी कंपनी में मुझे 1,300 रुपये प्रति माह वेतन मिला रहा था। मैंने अगले पांच साल तक वहां काम किया और वरिष्ठ तकनीकी अधीक्षक के रूप में जब मुझे 2,800 रुपये वेतन मिल रहा था तब मैंने वो नौकरी छोड़ दिया।"

1982 में नारायण मजूमदार ने काकली मजूमदार से शादी कर ली। दो साल बाद उनके एक बेटा हुआ जिसका नाम उन्होंने नंदन मजूमदार रखा। जुलाई 1985 में नारायण ने संयुक्त अरब अमीरात में एक डेनिश डेयरी के साथ एक छोटी सी शुरुआत की, जहां उन्होंने 18,000 रुपये का बड़ा वेतन अर्जित किया, लेकिन फैमिली वीजा न मिलने के कारण वह वापस लौट आए। संयुक्त अरब अमीरात से वापस लौटने के बाद नारायण फिर से अपनी पुरानी तकनीकी अधीक्षक की नौकरी करने लगे और इस बार उन्होंने 10 साल तक इसी पद पर काम किया। जब उन्होंने 1995 में नौकरी छोड़ी तब वे गुणवत्ता नियंत्रण अधिकारी बन चुके थे। नौकरी छोड़ने के बाद उसी साल वह महाप्रबंधक के रूप में एक अन्य डेयरी फर्म में प्रति माह 50,000 रुपये का वेतन पाने लगे थे। ये कंपनी दूध और दुग्ध उत्पाद करती थी। नारायण ने 2005 तक उनके साथ 10 वर्षों तक काम किया।

नारायण कहते हैं कि "कंपनी का मालिक मेरे लिए बहुत अच्छा था उन्होंने मुझे अपना खुद का व्यवसाय शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया। यह मुख्य रूप से उनके प्रोत्साहन और प्रेरणा के कारण था कि मैंने किसानों से दूध खरीदना शुरू किया और फिर मैंने वही दूध उसी फर्म को बेंचना शुरू किया जिसके लिए मैंने काम करता था।" उन्होंने दूध इकट्ठा करना शुरू कर दिया था। उन्होंने बहुत पहले दिन 320 लीटर दूध जमा किया। उन्होंने एक स्वामित्व वाली कंपनी शुरू की जिसे रेड काव दूध कहते हैं। नारायण कहते हैं, "कुछ गांवों की सड़कों बहुत ऊबड़-खाबड़ी थीं और मैं अक्सर दूध की खरीद के लिए कई किलोमीटर तक चला जाता था।"

डेयरी प्लांट की बिल्डिंग
डेयरी प्लांट की बिल्डिंग

"मेरा व्यवसाय किसानों से कच्चा दूध इकट्ठा करने और इसे कंपनी को आपूर्ति करने में शामिल था। पहले साल में मुझे कोई लाभ नहीं हुआ क्योंकि मैंने दूध संग्रह प्रक्रिया को नए क्षेत्रों में विस्तारित करने के लिए सारा पैसा खर्च कर दिया था।" 1999 में उन्होंने 10,000 रुपये के मासिक किराए पर हुगली जिले के अरामबाग में अपना पहला दूध शीतकरण संयंत्र खोला। जोकि अभी भी चल रहा है। 2000 तक कच्चे दूध का संग्रह 30,000-35,000 लीटर तक बढ़ गया था और उनकी कंपनी का वार्षिक कारोबार भी 4 करोड़ रुपये तक बढ़ गया था। उसी साल उन्होंने अपनी पत्नी के साथ एक समान साझेदारी नें रेड काव डेयरी साझेदारी कंपनी खोली।

2003 में उन्होंने इस कंपनी को रेड काव डेयरी प्राइवेट लिमिटेड में तब्दील कर दिया। जिसके निदेशक खुद पति और पत्नी थे। नारायण कहते हैं कि उनके लिए चेंजिंग मूमेंट 2009 का था जब उनके बेटे नंदन ने उनकी कंपनी ज्वाइन की। एमबीए कर चुके नंदन बतौर निर्देशक के रूप में शामिल हो गए और व्यापार के लिए आधुनिक संवेदनशीलता और विशेषज्ञता लाए। उनके ज्वाइन करने के बाद 2011-12 में उनका कारोबार करीब 74 करोड़ रुपये पर पहुंच गया।

2012 में कंपनी ने नंदन की पत्नी उर्मिला के एक अन्य निदेशक के तौर पर अपने साथ जोड़ा। दो साल बाद उन्होंने 2.84 करोड़ रुपये का निवेश करते हुए उदयनारायणपुर में एक पूर्ण प्रसंस्करण संयंत्र स्थापित किया। नए संयंत्र में प्रति दिन 50,000 लीटर की उत्पादन क्षमता थी।

2016 में उन्होंने 18 करोड़ रुपये के निवेश पर बर्दवान जिले के जोगरा में एक और अत्याधुनिक सात एकड़ में एक संयंत्र का निर्माण किया। संयंत्र में प्रति दिन 3.5 लाख लीटर की उत्पादन क्षमता थी। आज रेड काव डेयरी पश्चिम बंगाल में निजी क्षेत्र की सबसे बड़ी डेयरी कंपनी है। जिसमें राज्य के 400 से अधिक कर्मचारियों और 225 वितरकों शामिल हैं। नारायण कहते हैं, "हम डेयरी क्रीमर और उत्पादित पेयजल को उत्पाद लाइन में जोड़ने की योजना बना रहे हैं।" उन्होंने कहा कि वह अगले पांच सालों में करीब 400 करोड़ रुपए का कारोबार शुरू करना चाहते हैं।

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