सेहत और जेब दोनों के लिए फायदेमंद सेब ... माउंटेन लव ने संवारी सेब उत्पादक किसानों की ज़िंदगी 

सेब उत्पादक किसानों को मिल रहा है सेबों का सही दाम...छोटे सेब किसानों को जोड़कर खड़ा किया बड़ा बिजनेस...2014-15 में कंपनी का कुल टर्नओवर 11 करोड़ रुपए...

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सेब की बात चले और भारत के पहाड़ी इलाकों का जिक्र न हो, यह भला कैसे हो सकता है। जी हां, पहाड़ी इलाके के किसानों की आय का मुख्य स्रोत फलों की खेती ही है और उसमें भी मुख्यत: सेब की खेती, जो कि उत्तराखंड, हिमाचल, जम्मू और कश्मीर घाटी में सबसे ज्यादा होती है।

क्या आपने कभी गौर किया है कि एक सेब कितने लोगों की जिंदगी या जीने के स्टाइल को बदल सकता है? इस बात का अनुमान लगाना बेशक मुश्किल है कि सेहत के लिए बहुत ज्यादा पौष्टिक माना जाने वाला यह फल किसानों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति पर किस तरह प्रभाव डाल रहा है। हालाकि किसानों की दयनीय आर्थिक हालत और उनका शोषण भी साफ-साफ दिखाई देता है और इस सब का असर सेब की पैदावार पर भी पड़ता है। 

सेब उत्पादक किसानों की इसी स्थिति को देखते हुए श्री जगदंबा समिति के प्रमुख एल.पी. सेमवाल के मन में एक आइडिया आया कि उत्तराखंड और हिमाचल में सेबों पर काम शुरू करना चाहिए। उसके बाद उन्होंने इसी दिशा में काम करना शुरू कर दिया। वे चाहते थे कि यहां के सेबों के बारे में दुनिया को पता चले और सेब उत्पादक किसानों को भी उनकी मेहनत का सही दाम मिले।

इसके बाद उन्होंने एक ऐसा सामाजिक मॉडल तैयार किया जिसके जरिए जहां किसानों को उनकी उपज की बेहतर कीमत मिल सकती थी साथ ही बिचौलियों के लिए भी कोई गुंजाइश नहीं थी। सेमवाल ने सन 2007 में एक प्रोजेक्ट पर काम शुरु किया जिसका नाम रखा, ऐपल प्रोजक्ट। उसके बाद माउंटेन लव नाम से ब्रॉड की शुरूआत की और उम्मीद के मुताबिक कंपनी ने अपना विस्तार बहुत तेजी से किया।

आज इस कंपनी से 5000 सेब उत्पादक किसान जुड़े हैं। यह उत्तराखंड और हिमाचल के 3 जिलों के 150 गांवों में काम कर रही है।

हर किसान लगभग 300 किलो सेब का उत्पादन करता है जिसके बूते सन 2014-15 में कंपनी का कुल टर्नओवर 11 करोड़ रुपए था। कंपनी की इस सफलता का राज काम करने का क्रिएटिव मॉडल रहा। जिसके माध्यम से केवल सेब उत्पादक किसानों में आत्मविश्वास ही पैदा नहीं हो रहा है बल्कि अब उन्हें अपने सेबों का अच्छा दाम भी मिल जाता है। अब उनका सेब खरीदार न मिलने और समय पर न बिक पाने की वजह से खराब भी नहीं होता। इतना ही नहीं इस मॉडल पर काम करने से किसान इस पूरे प्रोडक्शन सिस्टम में शेयरधारक भी हैं।

पल्लवी देशपांडे माउंटेन लव कंपनी के कामों को मैनेज करती हैं। कंपनी में थ्री टीयर सिस्टम है यानी तीन श्रेणी का सिस्टम है। कंपनी ने सबसे पहले यह ध्यान दिया कि किसानों की असल दिक्कत क्या है? सबसे बड़ी दिक्कत किसानों के पास भंडारन की थी। चूंकि सेब उत्पादक किसान गरीब हैं इसलिए उनके पास अपने सेबों को रखने के लिए कोई ऐसी जगह नहीं थी जहां वे लंबे समय तक स्टोर करके रखे जा सकें। और इस कारण उनकी सेब की कुल फसल का चालीस से पचास प्रतिशत खराब हो जाता था। इसलिए कंपनी ने काम की शुरुआत सबसे पहले इसी समस्या को दूर करने से की।

उसके बाद सेब किसानों को साथ लाकर उनके उत्पादन को एक करना था। फिर कंपनी ने दस-दस किसानों का एक ट्रस्ट बनाया इससे वे सभी एक हो गए। उनके पास जो थोड़ा-थोड़ा पैसा था वह भी एक साथ जुड़कर ज्यादा हो गया। अब उनके पास इतना पैसा हो चुका था कि वे कुछ निर्णय ले सकते थे। इस प्रकार ट्रस्ट बनाकर कंपनी को भी फायदा हुआ क्योंकि अब उन्हें एक-एक किसान को अलग से तकनीकी ज्ञान देने की आवश्यकता नहीं थी। यह किसानों के लिए भी बड़ा मौका था कि वे एक दूसरे की तकनीकों के बारे में जान पा रहे थे।

उसके बाद किसानों की दूसरी बड़ी समस्या यह थी कि उनके पास मोल भाव करने की क्षमता कम थी। इसका कारण तालमेल की कमी तो था ही साथ ही किसानों के पास अपने माल को मार्केट तक पहुंचाने के सही साधन भी नहीं थे और ना ही उनको बाजार मूल्यों की जरा भी जानकारी थी। इसलिए एक ज्वाइंट वेंचर कंपनी की शुरूआत हुई जो फार्मर ट्रस्ट और इंवेस्टर के बीच की खाई को भरे। आमतौर पर किसान प्रतिदिन के हिसाब से जो भी उत्पादन हो उसे बेचकर पैसा ले लेता है लेकिन कंपनी ने किसानों को समझाया कि वह सेबों को तुरंत ना बेचें बल्कि उस समय बेंचे जब सेबों का मौसम न हो। इससे भले ही उनको पैसे थोड़ी देरी से मिलें लेकिन मूल्य उन्हें काफी ज्यादा मिलेगा। साथ ही कंपनी ने माल के लिए गोदामों की भी व्यवस्था करनी शुरू की ताकि किसानों का माल खराब न हो और सही समय पर वे इसे बाजार में बेच सकें। कंपनी में एशिया का तीसरा सबसे बड़ा कंट्रोल एट्मोस्फेयर सिस्टम स्टोरेज है।

'स्टिचिंग हेट ग्रीन वॉट' यानी एस.एच.जी.डब्लू. यह कंपनी के सोशल इंवेस्टर हैं। इस कंपनी की 'फ्रेश फूड टेक्नोलॉजी' की मदद से कंपनी को इन बेहतरीन सेबों को सुरक्षित रखने में बहुत मदद मिली। ये 15 करोड़ की बेहतरीन वर्ल्ड क्लास तकनीक है जो लगभग 1200 मैट्रिक टन सेबों को एक साथ रख सकता है।

कंपनी सेबों की 20 अलग-अलग प्रकार की वैराइटी को अलग-अलग ग्रेड में रखती है। सन 2013 तक मुख्यत: यहां पर पुरुष ही काम किया करते थे लेकिन अब महिलाओं को भी इस प्रोजेक्ट के लिए प्रोत्साहित किया गया है और महिलाओं की संख्या में भी खासी बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। यहां बनने वाले सेबों के जूस को माउंटेन लव लेबल के अंतर्गत बेचा जाता है। यह प्रोजेक्ट दो साल पहले ही शुरु हुआ था और पिछले साल से यह उत्पाद बाजार में है। अब हर घंटे 2000 लीटर तक सेब का जूस यहां बनाया जाता है। कंपनी अपने विस्तार के लिए कई दिशाओं में काम कर रही है। हाल ही में कंपनी ने आनंदा स्पा के साथ साझेदारी की है।