उत्तर प्रदेश में श्रमिक आंदोलन: सवाल महिला भागीदारी का

उत्तर प्रदेश ट्रेड यूनियन में महिला भागीदारी पर विवेचनात्मक रिपोर्ट...

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महिला श्रमिक बतौर श्रमिक उत्पादन के क्षेत्र में काम करें, पूरा घरेलू काम करें, बच्चे पैदा करें और उन्हें पाले-पोसे और इसके बाद भी हम उनसे उम्मीद करें कि वे ट्रेड यूनियनों या अन्य सामाजिक संगठनों के भी काम करें? यह कैसे मुमकिन है, कि एक व्यक्ति एक साथ इतनी दिशाओं में काम करे? इस सच्चाई के बावजूद हम उनकी ट्रेड यूनियनों से दूरी को अक्सर उनका पिछड़़ापन मानते हैं। क्या महिलाओं के बहुआयामी कार्यक्षेत्र से जुड़े प्रश्नों को सम्बोधित किये बिना हम उन्हें अपने संघर्षों का साथी बना सकते हैं?

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
उत्तर प्रदेश के पुराने उद्योग-कपड़ा मिल, सूती मिले आदि तो लगभग खत्म कर दी गयी हैं, लेकिन चमड़ा उद्योग, रेडीमेड गारमेंट उद्योग, आईटी क्षेत्र, कॉल सेन्टर और मॉल में महिला श्रमिक बड़ी संख्या में हैं। इनमें से सिर्फ चमड़ा उद्योग में यूनियनें है। इनके संघर्षों में महिलाओं की भागीदारी रहती है। इनके संघर्षों में भी आर्थिक प्रश्न ही मुख्य रहता है और इससे आगे की सोच अभी नहीं है।

उत्तर प्रदेश में पिछले कई वर्षों से हम जो भी बड़े श्रमिक आंदोलन हम देख रहे हैं, उनमें आमतौर पर महिलाओं की अच्छी भागेदारी है। आंगनबाड़ी कार्यकत्री, रसोइया श्रमिक, नर्सेज आशा बहु आदि के संघर्षों में तो सिर्फ महिलाओं की उपस्थिति है। इनके शिक्षा मित्र, वित्तविहीन शिक्षक, निर्माण मजदूर आदि के संघर्षों में महिलाओं की उपस्थिति अच्छी है। उत्तर प्रदेश के पुराने उद्योग-कपड़ा मिल, सूती मिले आदि तो लगभग खत्म कर दी गयी है, लेकिन चमड़ा उद्योग, रेडीमेड गारमेंट उद्योग, आईटी क्षेत्र, काल सेन्टर और मॉल में महिला श्रमिक बड़ी संख्या में हैं।

वह (महिला श्रमिक ) बतौर श्रमिक उत्पादन के क्षेत्र में काम करें, पूरा घरेलू काम करें, बच्चे पैदा करें और उन्हें पाले-पोसे और इसके बाद भी हम उनसे उम्मीद करें कि वे ट्रेड यूनियनों या अन्य सामाजिक संगठनों के भी काम करें ? यह कैसे मुमकिन है, कि एक व्यक्ति एक साथ इतनी दिशाओं में काम करें? इस सच्चाई के बावजूद हम उनकी ट्रेड यूनियनों से दूरी को अक्सर उनका पिछड़़ापन मानते हैं। क्या महिलाओं के बहुआयामी कार्यक्षेत्र से जुड़े प्रश्नों को सम्बोधित किये बिना हम उन्हें अपने संघर्षों का साथी बना सकते हैं? कई साथी यह कहेंगे कि ट्रेड युनियनें कोई राजनीतिक संगठन तो है नहीं कि वह सामाजिक सवालों को भी उठायें। या दूसरे अर्थों में कहें तो ट्रेड यूनियनों ने अपने लिए जो दायरा तय किया है, उसी का नतीजा है कि अधिकांश महिला श्रमिक हासिये पर चली जाती है या बाहर हो जाती हैं।

पिछले 25-30 वर्षों में नयी तकनीकी पर आधारित उत्पादन-वितरण सेवा क्षेत्रों का जो नया स्वरूप उभरा है, उसमें महिला श्रमिकों की संख्या में काफी इजाफा हुआ है। कुछ ऐसे क्षेत्र भी सामने आए हैं, जहां सिर्फ महिलाएं ही काम पाती है, आज रेडीमेट गारमेंट, टूरिज्म स्वास्थ्य बाल शिक्षा सेल्स वित्त आईटी, सामाजिक कल्याण की योजनाएं आदि में महिला श्रमिक ही बहुसंख्यक है। इनमें से अधिकांश में या तो ट्रेड यूनियनें हैं ही नहीं या है भी तो बेहद कमजोर स्थिति में संगठित एवं सरकारी क्षेत्रों में कार्यरत पुरानी टे्रड यूनियनें जो पूरे ट्रेड यूनियन संघर्षों का आमतौर पर नेतृत्व करती हैं, उनकी सोच और दायरा आज भी वही पुराना है। इनके ढांचे में महिला श्रमिकों के लिए आज भी जगह नहीं है, और न ही ये नए क्षेत्रो में कार्यरत बहुसंख्य महिला श्रमिकों में कोई राह दिखा पाते हैं।

महिला श्रमिकों की बात तो जाने दें, पिछले दस वर्षों में वेतन आयोगों और वेतन समझौतों ने स्थाई और संविदा श्रमिकों के बीच इतनी गहरी खाई पैदा कर दी है, कि ये यूनियनें अपने ठोस आधार का भी बड़ा हिस्सा खो चुकी है। इन यूनियनों के पास आज ले दे कर जो आधार बचा है, उसकी मांगे और सोच एक हद तक मध्यमवर्गीय हो गयी है। उसके सपने किसी भी रूप में श्रमिकवर्गीय नहीं रह गये है, जो पूरे श्रमिक जनता के बीच मौजूद असमानतओं और अन्याय के खिलाफ नहीं लड़ सकता वह पूंजीवाद के खिलाफ कैसे लड़ेगा। वह पूंजीवाद से सिर्फ समझौता करेंग, तालमेल करेगा, जैसा कि आज कई श्रमिकों की राजनीतिक पार्टियां कर रही है। इन संघर्षों से पहले महिलाएं बहिष्कृत थी, और अब ठेका-संविदा स्कीम उन्हें नौकरियों से वंचित कर रहें हैं। उत्तर प्रदेश की पूरी श्रमिक आबादी का बहिष्कृत हिस्सा बहुसंख्यक है, यदि इसमें असंगठित, खेतिहर, दिहाड़ी श्रमिकों को जोड़ दिया जाय तो इनका अनुपात नब्बे प्रतिशत तक हो जाता है। इस 90 प्रतिशत में आधे से अधिक महिलाएं हैं। अब सवाल यह उठता है कि हम कौन सी राह चुनें? इस बहिष्कृत बहुमत को मुख्यधारा की ट्रेड यूनयनों से जोड़े या इन्हें ही एक नयी मुख्यधारा बनाने के बारे में सोचें?

इस दौरान देश में महिला श्रमिकों के दो महत्वपूर्ण आंदोलन हुए। मुन्नार, केरल के चाय बगानों की महिला श्रमिकों ने पिछले वर्ष अपनी अगल यूनियन बनाकर लड़ाई लड़ी और एक हद तक आर्थिक एवं सामाजिक मागों को पूरा करवाने में सफल रहीं। इनकी लड़ाई ट्रेड यूनियनों के स्थापित ढांचे से काफी बाहर गयी और इसके लिए इनहें काफी विरोध झेलना पड़ा। ये पूरी दृढ़ता से अलग संगठित हुयी, संघर्ष किया और आगे बढ़ी इनके संघर्षों में एक नयी दिशा निकलती है।

दूसरा आन्दोलन अप्रैल 2016 में बंग्लोर के पास स्थित गारमेंट हब के श्रमिकों का हुआ। इस आंदोलन में महिलाओं की संख्या भी अधिक थी और एक हद तक उनका ही नेतृत्व था। यह आंदोलन बहुत जल्द ही काफी रेडिकल हो गया। इससे पहले की आंदोलन देशव्यापी होता, सरकार केंद्रीय ने पीएफ की निकासी पर जो प्रतिबंध इस साल लगाया था उसे वापस लेने की घोषणा कर दी। यह भी महिलाओं की भागीदारी से बाहर जाकर कुछ नयी बातें कह रहा था।

श्रमिक आंदोलन में इस तरह की नयी परिघटनाएं पूरे देश और उत्तर प्रदेश में भी लगातार पैदा हो रही है, सवाल है इन्हें एक वैचारिक रूप देने का। यदि जीवन और समाज लगातार विकसित हो रहा है, तो निश्चित रूप से उन्नीसवीं, बीसवी शताब्दी के संघर्ष के औजारों को भी इक्कीसवीं शताब्दी के हिसाब से नया अर्थ देना होगा, अपनी कल्पना से नहीं, बल्कि जो हमारे सामने वास्तव में घटित हो रहा है, उससे। यहां तक कि श्रमिक वर्ग को भी एक नया अर्थ और विस्तार देना होगा। उत्पादन के नये-नये क्षेत्र और रूप आज हमारे सामने हैं, किसानों के बड़े हिस्से का भी अन्र्तवस्तु बदल गया है। यह बदलाव देश की बहुसंख्यक आबादी को श्रमिक जनता की जमात में शामिल होने की ओर ले जा रहा है। आज की आबादी में जो जमात सच्चे अर्थों में बहुसंख्यक हैं, उसके हितों के संरक्षण के लिए कोई स्पष्ट नियम-कानून नहीं हैं।

पूरी समस्या को समझने के लिए यह कहना काफी नहीं है, कि आज के ट्रेड यूनियन आंदोलन से महिलाएं अलग हैं। यह तो सभी जानते हैं कि यह सच है, लेकिन एक दूसरा सच भी है जो खुद को तमाम फुटकर संघर्षों के जरिए प्रकट कर रहा है। यह सच है कि श्रमिक जनता खुद को नए तरीके से लामबंद करने की कोशिश कर रही है, और इस नयी लामबंदी में महिलाएं भी मौजूद हैं। हमारे पास इस प्रयासों को एकीकृत करने और उसके साथ मिलकर काम करने की दृष्टि है या नहीं? इन सदंर्भों में हमें गांधीजी के आन्दोलनों से सीखना होगा।

देश में वही एक ऐसा आंदोलन था, जो सही मायनों में जनआंदोलन था। इसमें महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों आदि के लिए आंदोलन का कोई जरूरी काम करने को था। इसलिए वहां पर हम महिलाओं की बड़े पैमाने पर भागीदारी देखते हैं। गांधीजी हमेशा आंदोलन का एकीकृत रूप तय करते थे। उसमें आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक एवं शैक्षिक पहलू एक साथ जैविक रूप से एकताबद्घ होते थे। इसी से पूरा समाज उसमें भागीदार होता था और राजनीतिक रूप से प्रशिक्षित होता था। हमारे ट्रेड यूनियनों और मजदूर आंदोलनों ने इस समझदारी का परिचय नहीं दिया और आज इसलिए इतीन कमजोर स्थिति पर पहुंच गये हैं।

श्रमिक आन्दोलन, जिसके कंधों पर एक नया समाज, एक वर्ग विहीन समाज बनाने की जिम्मेदारी है, वह कैसे अपने को आर्थिक सुधारों के दायरे तक सीमित रख सकता है? एक श्रमिक जो एक कारखाने में काम करता है, लेकिन इसके साथ व एक नागरिक भी हैं, उसका परिवार भी है, उसका गांव है, उसका शहर है, नाते-निश्तेदार हैं। वह कारखाने की ही नहीं, सामाजिक जीवन की हर छोटी-बड़ी घटनाओं से प्रभावित होता है। वह सामाजिक जीवन भी हर छोटी-बड़ी चीजों का उपयोग करता है या उपयोग करने से वंचित कर दिया जाता है। हमारे श्रमिक संघर्षों में क्या यह पहलू शामिल हुआ या नहीं? यदि शामिल नहीं हुआ, तो महिला श्रमिक कैसे उसका हिस्सा बनें?

सामाजिक जीवन की अधिकांश समस्याएं तो सीधे महिलाओं के कंधों पर है। निश्चित तौर पर हमें भी महिलाओं वाले मोर्चे पर भी हाथ बांटने के बारे में सोचना पड़ेगा और अपने संघर्ष के मुद्ïदों को सिर्फ एक श्रमिक की ही नहीं बल्कि एक नागरिक के नजरिए से देखना होगा इसी से श्रमिक आंदोलन एक व्यापक राजनीतिक जन आंदोलन का रूप लेगा।

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लेखक / पत्रकार

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