'शोले' की कव्वाली न फिल्माने पर उदास हो गए थे आनंद बख्शी

जन्मदिन पर मशहूर गीतकार की याद...

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आनंद बख्शी फिल्म इंडस्ट्री के पहले और आखिरी ऐसे गीतकार थे, जो आखिर तक अपने शब्दों में सदाबहार बने रहे। आज (21 जुलाई) उनका जन्मदिन है। कुल साढ़े पांच सौ फिल्मों के लिए उन्होंने लगभग चार हजार गीत लिखे, जिनमें सैकड़ों गीत आज भी लोग गुनगुनाते रहते हैं। उन्हे उस वाकये का बड़ा मलाल रहा, जब फिल्म 'शोले' के लिए लिखी उनकी कव्वाली को आखिरी वक्त में नहीं फिल्माया गया।

यह बात कम ही लोगों को पता है कि ‘शोले’ की ऑरिजिनल स्क्रिप्ट में एक कव्वाली भी थी। जावेद अख्तर चाहते थे कि उस कव्वाली को भोपाल की ‘चार भांड’ स्टाइल में फिल्माया जाए, जिसमें कव्वालों के चार ग्रुप एक-दूसरे का मुकाबला करें।

फिल्मी प्रेम गीतों के अमर गायक आनन्द बख्शी का आज (21) जन्मदिन है। सन् 1930 में उनका जन्म तो रावलपिंडी (पाकिस्तान) में हुआ था लेकिन उनके शब्द-शब्द भारतवासियों के सिर चढ़कर बोलने लगे। घर के लोग उनको नंदू कहकर बुलाते थे। पूरा नाम आनंद प्रकाश था। फिल्मी दुनिया में आनंद कहे जाने लगे। एक जमाने के मशहूर संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, राहुल देव बर्मन, कल्याणजी-आनंदजी, विजु शाह, रोशन, राजेश रोशन आदि के पसंदीदा कवियों में शुमार आनन्द बख्शी के लिखे जिन पुराने और आधुनिक गीतों 'परदेसियों से ना अखियां मिलाना', 'बिंदिया चमकेगी', 'दम मारो दम', 'ए री पवन', 'मैं तुलसी तेरे आंगन की', 'दो लफ्जों की है', 'तू चीज बड़ी है मस्त मस्त', 'दिल तो पागल है', 'हमको तुमसे हो गया है प्यार क्या करें', 'ताल से ताल मिला', 'यह दोस्ती हम नहीं छोड़ेगे'(शोले) आदि सुनते हुए लगता है कि वह फिल्म इंडस्ट्री के पहले और आखिरी ऐसे रचनाकार रहे, जो आखिर तक अपने शब्दों में सदाबहार बने रहे।

बीमारी के कारण 30 मार्च 2002 को 71 साल की उम्र में वह दुनिया छोड़ चले थे। पाक नेवी की नौकरी छोड़कर वह मुंबई की फिल्मी दुनिया में पार्श्वगायक बनने पहुंच गए थे। बंटवारे के बाद वह सपरिवार लखनऊ आ बसे थे, जहाँ उन्होंने कभी टेलीफोन आपरेटर का भी काम किया था। वहीं से अपने सपनों की मंजिल छूने के लिए बम्बई को निकल पड़े।

मुंबई में उनके पहले मददगार बने भगवान दादा। बदकिस्मती ऐसी रही कि जिन पहली दो फिल्मों के लिए उन्होंने गाने लिखे, वह प्रदर्शित ही नहीं हो सकीं। पहली बार उनको 'परदेसियों से न अँखियाँ मिलाना' और 'यह समा है प्यार का' जैसे लाजवाब गीतों से लोकप्रियता मिली। उसके बाद तो 'सावन का महीना', 'बोल गोरी बोल', 'राम करे ऐसा हो जाये', 'मैं तो दीवाना' और 'हम-तुम युग-युग' आदि उनके गीत पूरी दुनिया गुनगुनाने लगी। फिर उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। उसी दौरान फिल्म 'फ़र्ज़(1967)', 'दो रास्ते(1969)', 'बॉबी(1973'), 'अमर अकबर एन्थॉनी(1977)', 'इक दूजे के लिए(1981)', 'कटी पतंग(1970)', 'अमर प्रेम(1971)', हरे रामा हरे कृष्णा(1971', 'लव स्टोरी(1981)' आदि फ़िल्मों को उन्होंने एक-से-एक लोकप्रिय गीत दिए। फ़िल्म अमर प्रेम(1971) के 'बड़ा नटखट है किशन कन्हैया', 'कुछ तो लोग कहेंगे', 'ये क्या हुआ', और 'रैना बीती जाये' जैसे उत्कृष्ट गीत आज भी हर दिल में धड़कते हैं। उन्होंने राज कपूर के लिए 'बॉबी (1973)', 'सत्यम् शिवम् सुन्दरम् (1978)'; सुभाष घई के लिए 'कर्ज़(1980)', 'हीरो(1983)', 'कर्मा (1986)', 'राम-लखन(1989)', 'सौदागर (1991)', 'खलनायक (1993)', 'ताल (1999)' और 'यादें(2001)'; यश चोपड़ा के लिए 'चाँदनी (1989)', 'लम्हे (1991)', 'डर (1993)', 'दिल तो पागल है (1997)'; आदित्य चोपड़ा के लिए 'दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे (1995)', 'मोहब्बतें (2000)' फिल्मों में सदाबहार गीत लिखे। उन्होंने 1973 में फिल्म 'मोम की गुड़िया' के लिए लता मंगेशकर के साथ स्वयं गाना भी गाया था। उन्होंने अपने 43 वर्षों के फिल्मी सफर में कुल साढ़े पांच सौ फिल्मों के लिए लगभग चार हजार गीत लिखे।

यह बात कम ही लोगों को पता है कि ‘शोले’ की ऑरिजिनल स्क्रिप्ट में एक कव्वाली भी थी। जावेद अख्तर चाहते थे कि उस कव्वाली को भोपाल की ‘चार भांड’ स्टाइल में फिल्माया जाए, जिसमें कव्वालों के चार ग्रुप एक-दूसरे का मुकाबला करें। वह कव्वाली फिल्म में सूरमा भोपाली वाले ट्रैक का हिस्सा थी। ये कव्वाली गाने के लिए चार गायक चुने गए – किशोर कुमार, मन्ना डे, भुपिन्दर और स्वयं आनंद बख्शी भी। प्लान के मुताबिक भोपाल से ‘चार भांड’ गानेवाले कव्वाल बुलाए गए। पंचम ने धुन रची और कव्वाली रिकॉर्ड भी हो गई लेकिन उसे फिल्माया नहीं गया क्योंकि फिल्म पहले ही निर्धारित तीन घंटे से ज्यादा लम्बी हो चुकी थी। आखिरकार उस कव्वाली पर ही कैंची चल गई। इससे आनंद साहब को बहुत दुख हुआ था। उस कव्वाली के बोल थे -

चांद सा कोई चेहरा ना पहलू में हो
तो चांदनी का मज़ा नहीं आता।
जाम पीकर शराबी ना गिर जाए तो
मैकशी का मज़ा नहीं आता।

‘ये समां.. समां है ये प्यार का’, ‘एक था गुल और एक थी बुलबुल’ भी आनंद बख्शी के सुपरहिट गीत रहे। फिल्म ‘हिमालय की गोद में’ के लिए लिखा गया उनका गीत ‘चांद सी महबूबा हो मेरी कब ऐसा मैंने सोचा था’ को भी लोगों ने काफी पसंद किया। वर्ष 1967 में प्रदर्शित सुनील दत्त और नूतन अभिनीत फिल्म 'मिलन' के गाने 'सावन का महीना पवन करे शोर' और ‘युग युग तक हम गीत मिलन के गाते रहेंगे‘, ‘राम करे ऐसा हो जाये’ ने तो लोकप्रियता की रिकार्ड ऊंचाइयों को छू लिया। कहा जाता है कि राजेश खन्ना को सुपर स्टार की ऊंचाइयां देने में आनंद बख्शी के गीतों का अहम रोल रहा।

फिल्म 'आराधना' में लिखे गाने ‘मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू' के जरिये राजेश तो सुपर स्टार बने ही, साथ में किशोर कुमार को भी वह मुकाम हासिल हो गया, जिसकी उन्हें बरसों से तलाश थी। उनके गानों ने ही कपूर खानदान के फ्लॉप हीरो को सबका चहेता ‘शशि कपूर’ बना दिया। आनंद बख्शी के लिखे फिल्मी भजनों की भी एक लंबी श्रृंखला रही है, जैसे कि जय माता दी, हे माई मेरी सच्चियां जोतां वाली, ओ शेरोंवाली, ऊँचे डेरों वाली, जय माँ अष्ट भवानी, हे नाम रे, सबसे बड़ा तेरा नाम, गणपति अपने गाँव चले, बप्पा मोरया रे आदि। देशभक्ति प्रधान गीतों में नफरत की लाठी तोड़ो मेरे देश प्रेमियों, वतन वालो वतन ना बेच देना आदि गीतों को भी खूब लोकप्रियता मिली। उन्हें अपने गीतों के लिए चालीस बार फिल्म फेयर अवॉर्ड के लिये नामित किया गया था लेकिन इस सम्मान से चार बार ही उन्हें नवाजा गया।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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