आईटी के अलावा अन्य क्षेत्रों में नेत्रहीनों के सपने साकार करता 'SRVC'

कोचीन के प्रसिद्ध इन्फो पार्क इलाके में स्थित है रोटरी क्लब कोचीन ग्लोबल द्वारा संचालित Society for Rehabilitation of the Visually Challenged (एसआरवीसी) का केेंद्रवर्ष 2000 में सुनील जे मैथ्यू और एम.सी. राॅय ने की स्थापना और वर्ष 2002 में प्रारंभ किया एनजीओनेत्रहीनों द्वारा संचालित आॅर्केस्ट्रा और देखने में अक्षम खिलाडि़यों की एक फुटबाॅल टीम भी कर  रखी है तैयारइनके यहां से प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके कई नेत्रहीन कई अच्छे संस्थानों में अच्छे पदों पर कर रहे हैं नौकरी

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कोच्चि के प्रसिद्ध इन्फो पार्क इलाके में आजकल एक नजारा आगंतुकों की आंखों को काफी सुहा रहा है। टाटा, काॅग्निज़ेंन्ट ओर विप्रो जैसी कई बड़ी कंपनियों के बीच में स्थित विस्मया बिल्डिंग के ग्राउंड फ्लोर पर स्थित है रोटरी क्लब कोचीन ग्लोबल द्वारा संचालित Society for Rehabilitation of the Visually Challenged (एसआरवीसी) का केेंद्र। हालांकि इनके पास काम करने के लिये वहां मौजूद कई बड़े नामो की तरह आलीशान और भव्य इमारतें नहीं हैं लेकिन एसआरवीसी का माहौल और वातावरण इसे औरों से अलग एक उत्कृष्ट स्थान पर प्रदान करता है। 15 वर्ष से 45 वर्ष के मध्य के नेत्रहीन लोग एसआरवीसी के इस केंद्र संचालित होने वाली कक्षाओं में भाग लेकर अपने कौशल में सुधार करते हैं जो उन्हें अपने पैरों पर खड़े होने में मददगार साबित होता है।

एसआरवीसी में आने वाले सभी छात्र या तो जन्मजात नेत्रहीन हैं या फिर वे बाद में किसी दुर्घटना या विकार के चलते अपनी आंखों की रोशनी खो बैठे हैं। ये छात्र या तो सिर्फ इनके लिये विशेष रूप से तैयार किये गए हाॅस्टल में रहते हैं या फिर बाहर पेईंग गेस्ट के रूप में रहते हैं। एसआरवीसी में इन्हें दिया जाने वाला प्रशिक्षण विविधता लिये हुए होता है और इन्हें डेटा प्रविष्टि, टेलीमार्केटिंग, संगीत, मेडिकल ट्रांसक्रिप्शन, भोजन चखने (चाय चखने, वाइन चखने, आदि), परख करने की क्रिया (सुगंध, आवश्यक तेलों और अर्क आदि), परामर्श और फिजियोथैरेपी के क्षेत्र में पारंगत बनाता है।

एसआरवीसी की स्थापना वर्ष 2000 के प्रारंभ में की गई और वर्ष 2002 में सुनील जे मैथ्यू और एम.सी. राॅय की पहल पर इसे गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) के तौर पर पंजीकृत करवाया गया। सुनील इसके बारे में जानकारी देते हुए कहते हैं, ‘‘विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार भारत में करीब 37 मिलियन नेत्रहीन हैं जो पूरी दुनिया में सबसे अधिक है। मैं इस संबंध में एक शोध कर रहा था कि देश में मौजूद नेत्रहीनों की इस बड़ी संख्या को किस तरह उनके पैरों पर खड़े होने में मदद की जा सकती है। इसी दौरान मेरे करियर में मदद करने वाली आईटी क्रांति ने मुझे नेत्रहीनों के लिये एक प्रशिक्षण और पुर्नवास केंद्र शुरू करने की प्रेरणा दी। ‘स्क्रीन एक्सेस रीडर’ के टेक्स्ट-टू-आॅडियो साॅफ्टवेयर के सहारे इन लोगों को बैंक, काॅल सेंटर इत्यादि में रोजगार मिलने के अवसरों में खासी वृद्धि देखने को मिली है।’’

सुनील डिजाइन और साॅफ्टवेयर कंपनी सिस्टिका सिस्टम्स प्राईवेट लिमिटेड के संस्थापक हैं जिसकी टीम में एक नेत्रहीन प्रोग्रामर सहित कुल आठ लोग शामिल हैं, और इन्होंने आईटी के क्षेत्र की अपनी विशेषज्ञता और दक्षता को एसआरवीसी के लिये प्रयोग करने का फैसला किया। ‘‘प्रारंभिक दौर में हम सिर्फ समर कैंपों का आयोजन करते थे जिसमें हम आईटी कंपनियों में काम करने वाले कर्मचारियों और इस क्षेत्र के अन्य विशेषज्ञों को भी आमंत्रित करते थे। इसके बाद वर्ष 2008 में हमें एक एक अच्छा कार्यालय मिल गया जिसे अच्छी-खासी जगह होने के अलावा बहुत सारे उपकरण थे और यह पूरी तरह से स्थापित था। इसके बाद हमनें अपने छात्रों के लिये 6 से आठ महीनों की अवधि के बैच भी संचालित करने प्रारंभ कर दिये।’’

कुछ वर्षों के बाद इस जोड़ी ने अपने पाठ्यक्रमों का विस्तार गैर-आईटी क्षेत्र में करने का फैसला किया, ‘‘क्योंकि हर कोई कंप्यूटर पर कार्य करने में सहज महसूस नहीं करता।’’ और इसी के बाद एम.सी. का संगीत के प्रति जुनून सामने आया और एसआरवीसी के अपने आॅर्केस्ट्रा का जन्म हुआ। ‘‘हमने कई ऐसी संगीतमय प्रस्तुतियां दीं जहां दर्शकों को यह मालूम ही नहीं था कि सभी संगीतकार नेत्रहीन हैं और जब प्रदर्शन के अंत में उन्हें इस बात की जानकारी दी गई तो वे हैरान और आश्चर्यचकित रह गए।’’

समय के साथ इन्होंने अपनी गतिविधियों के दायरे का भी विस्तार किया है। एसआरवीसी से प्रशिक्षित इन नेत्रहीन छात्रों को अब आईटी के अलावा डाटा एंट्री, टेलीमार्केटिंग, काॅलसेंटा इत्यादि जैसे क्षेत्रों में भी रोजगार के अवसर बहुतायत में उपलब्ध हो रहे हैं।

एसआरवीसी की शानदार उपलब्धियों को इनकी फुटबाॅल टीम एक बिल्कुल नया रंग देती है। ’’वर्ष 2013 में हम अपनी एक राष्ट्रीय टीम के साथ थाईलैंड मंे आयोजित हुए सात टीमो के अंर्तराष्ट्रीय नेत्रहीन फुटबाॅल प्रतियोगिता में शामिल हुए। हम इस प्रतियोगिता के सेमीफाइनल तक पहुंचने में कामयाब रहे और हमारे लिये बिल्कुल नया होने के बावजूद उस मुकाम तक पहंचना एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। उस प्रतियोगिता में हम ईरान जैसी टीम के साथ प्रतिस्पर्धा करनी पड़ी जो दुनिया की पांचवें नंबर की टीम है।’’

इसके अलावा इनके पास रिफ्लेक्सोलाॅजी से संबंधित गतिविधियां भी मौजूद हैं। सुनील कहते हैं, ‘‘हमारा एक पूर्व छात्र मालिश के काम में पारंगत है और उसने अपने इस कौशल का अधिक फायदा उठाने के उद्देश्य से एक मसाज केंद्र शुरू किया। लोगों को उसका काम बहुत पसंद आया और अब उसने 4 अन्य नेत्रहीनों को अपने यहां नौकरी पर रखा है।’’

एसआरवीसी से प्रशिक्षण पाकर अपने पैरों पर खड़े होते हुए रोजगार पाने वाले छात्रों की संख्या करीब 65 प्रतिशत है और यह एक बहुत बेहतरीन आंकड़ा है। विभिन्न व्यापारिक घरानों ने अपने काॅल सेंटरों, एडमिन इत्यादि के कामों में लोगों को भर्ती करने के लिये इनके साथ हाथ मिला रखा है। ‘‘आपकी जानकारी के लिये बताते हैं कि एक ये हुआ कि हमारे यहां से प्रशिक्षित कुछ छात्रों को प्रसिद्ध टेलीकाॅम कंपनी आईडिया में साक्षातकार के लिये भेजा गया और उन्हें हमारा यह विचार इतना पसंद आया कि अगले वर्ष वे हमारे पूरे बैच को ही अपने यहां नौकरी देने को तैयार थे!’’ इसके अलावा इनके यहां से प्रशिक्षित कई अन्य नेत्रहीन छात्र लौंड्री, खाद्य और पेय उद्योग और टेस्टिंग इत्यादि जैसे क्षेत्रों में रोजगार पाने में सफल रहे हैं और कुछ तो कोचीन के एक पांच सितारा होटल के स्थायी संगीत आॅर्केस्ट्रा के समस्य भी बन गए हैं। शेष बचे हुए 35 प्रतिशत छात्र जो रोजगार पाने से महरूम रह जाते हैं वे मुख्यतः शिक्षण और प्रशिक्षण के कामों में वापस चले जाते हैं जिन्हें वे पहले से ही कर रहे होते हैं।

तो एसआरवीसी अपने परिचालन को जारी कैसे रख पाता है? इस केंद्र ने स्वयं को व्यक्तिगत रूप से या फिर सीएक के माध्यम से मिलने वाले दान और प्रायोजकों के माध्यम से संचालित रखने में सफलता प्राप्त की है। गर्व से भरे सुनील बताते हैं, ‘‘हम पिछले आठ वर्षों में करीब 10 बैच सफलतापूर्वक संचालित कर चुके हैं और बढ़ती हुई मांग को पूरा करने के लिये हमें दिसंबर 2014 में एक और केंद्र खोलना पड़ा जहां पर हम चार महीनों के लघु पाठ्यक्रम संचालित करते हैं। हम मुख्यतः अग्रेजी अभिविन्यास और कंप्यूटर विज्ञान की जानकारी देने पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं।’’

हालांकि इनका सफर बेहद लंबा और कठिनाइयों से भरा रहा है। सुनील बताते है कि अन्य गैर लाभकारी संगठनों की तरह इन्हें भी आर्थिक कठिनाइयों से तो पार पाना ही पड़ा लेकिन इनके सामने सबसे बड़ी चुनौती भारतीय लोगों की इस मानसिकता को दूर करने की रही कि नेत्रहीन व्यक्ति नियमित कामकाज करने के काबिल नहीं होते। एक तरफ तो ऐसा होता है कि कई अभिभावक अपने नेत्रहीन बच्चों को घर से बाहर भेजने में भी असहज महसूस करते हैं और दूसरी तरफ नयोक्ता उन्हें अपनी टीम का हिस्सा बनाना पसंद नहीं करते हैं। वे कहते हैं, ‘‘बीते 12 वर्षों के दौरान हमने बेहद प्रतिभाशाली नेत्रहीन लोगों का एक बेहतरीन पूल तैयार किया है और इस लंबे अनुभव के बाद मैं दावे से इस बात को कह सकता हूँ कि आमतौर पर नियोक्ता इन नेत्रहीनों की क्षमता से परिचित ही नहीं होते हैं और उन्हें इनकी क्षमताओं को लेकर कई प्रकार की भ्रांतियों से घेर रखा होता है।’’ कुछ अन्य मामलों के बारे में बात करते हुए वे कहते हैं, ‘‘हमारे पास पाठ्यक्रम में शामिल होने के लिये कई ऐसे नेत्रहीन व्यक्ति भी आते हैं जो अपने घर पर आसानी से घुलमिल पहीं पाते हैं और उनके माता-पिता को इसी का अंदाजा नहीं होता कि उनके साथ क्या करना चाहिये।’’

सुनील से इस सवाल को कई बार पूछा जा चुका है कि इतने लंबे समय तक उन्हें इस काम को करने की प्रेरणा कहां से मिलती रही है। सुनील कहते हैं, ‘‘कई लोग हमसे पूछते हैं कि हम समय कैसे निकाल पाते हैं। मेरा मानना है कि हम सबसे पास समय है और बात सिर्फ इतनी है कि हम उसकी तरफ देखना नहीं चाहते हैं। जो लोग परोपकार करना चाहते हैं उन्हें किसी चीज की आवश्यकता नहीं होती, वे सिर्फ चुपचाप परोपकार करते रहते हैं। जिस लोगों के साथ हम काम करते हैं उनकी ताकत हमारे लिये कोई अन्य विकल्प नहीं छोड़ती है।’’ जब उनये यह पूछा गया कि कभी उन्होंने निराशा में इस काम को छोड़ने के बारे में सोचा हैै तो उनका जवाब था, ‘‘वास्तव में मैं कई बार अपनी नौकरी को छोड़कर अपना पूरा समय इस काम को समर्पित करने के बारे में सोचता हूँ।’’