मूर्तियों में जान फूंकने वाली 'शिल्पी'

पति के साथ मिलकर शुरू किया कलाकृतियां बनाना दुनिया को दिखाया कि महिलाएं भी बना सकती हैं कांसे के बुतदेश-विदेश में खासी लोकप्रिय है जसु की बनाई प्रतिमाएं

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‘‘मूर्तियां बनाना लड़कियों का काम नहीं है’’ एक मासूम सी लडकी ने 16 साल की उम्र में एक किताब में माइकल एंजलों के इन शब्दों को पढ़ा और तभी निर्णय लिया कि वे इसे गलत साबित करके रहेंगी और भविष्य में वे मूर्तिया बनाने वालों के लिये एक मिसाल बनीं। अहमदाबाद के एक छपाई करने वाले परिवार में जन्मी जसु आशरा को अब दुनिया जसु शिल्पी के नाम से जानती है। जसु ने मूर्तिकला के क्षेत्र में वह मुकाम हासिल किया जिसे पाना बड़े-बड़े मूर्तिकारों का सपना होता है और देश-दुनिया में अपना नाम रौशन किया।

जसु शिल्पी
जसु शिल्पी

ऐसा नहीं कि जसु शिल्पी को सफलता और शोहरत रातों-रात मिल गई। इस सफलता को हासिल करने के लिये उन्होंने जीवन भर संघर्ष किया। चित्रकला की छात्रा के तौर पर जसु एक बार ग्वालियर गईं और वहां झांसी की रानी की प्रतिमा को देखकर उन्होंने एक शिल्पकार बनने का फैसला किया। जसु के एक मशहूर शिल्पकार बनने में उनके पति मनहरभाई का बहुत बड़ा योगदान रहा जिनसे उन्होंने घर से भागकर प्रेमविवाह किया था, क्योंकि वे एक मुसलमान थे।

हालांकि मनहरभाई ने शादी के लिये अपना धर्म भी बदल लिया था लेकिन जसु के परिवार ने कभी उन दोनों को नहीं अपनाया और दोनों अंबावाड़ी के एक छोटे से कमरे में रहने लगे। मनहरभाई पहले से ही शिल्पकार थे और अहमदाबाद के महिपात्र आश्रम में बच्चों को लकड़ी और धातु की कलाकृतियां बनाना सिखाते थे।

शादी के बाद जसु ने कुछ समय एक स्कूल में बच्चों को पेंटिंग सिखाई लेकिन उन दोनों की कमाई से मुश्किल से ही घर का खर्चा चल पाता था। इस दौरान उन्होंने एक अखबार में राजकोट नगर पालिका का एक मूर्ति बनाने का टेंडर देखा और वे खुद स्कूटर चलाकर राजकोट के मेयर से मिलने चली गईं। उनके साहस और दृढ़ता से प्रभावित होकर मेयर ने 25 हजार रुपये में बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर के आदमकद बुत का आर्डर उन्हें दे दिया।

उनके पति को तबतक छोटी-मोटी मूर्तियां बनाने का तो अनुभव था लेकिन आर्डर लेने के बाद उन दोनों के सामने सबसे बड़ी चुनौती एक आदमकद मूर्ति को तैयार करना था। दोनों कई दिनों तक इसी पसोपेश में लगे रहे कि कैसे इस बुत को बनाएं और इसी समय उनकी मुलाकात बांग्लादेश के मशहूर मूर्तिकार हमीद्दुजमान से हुई जो कांसे की मूर्तियां बनाने में माहिर थे। उन्होंने खुले दिल से इस युगल की यहायता की और एक सप्ताह में ही दोनों को बुत बनाने के गुर सिखा दिये।

आखिरकार जसु और मनहरभाई ने अपना पहला बुत बनाकर तैयार कर लिया जो राजकोट शहर की मुख्य सड़क पर लगाया गया। इस बुत की सब लोगों ने बहुत सरहना की और जल्द ही उन्हें पूरे गुजरात से काम मिलने लगा। काम मिलने के बाद दोनों के सामने अब उसे निबटाने के लिये जगह का इंतजाम करना एक बड़ी चुनौती था क्योंकि उनका किराये का घर बहुत छोटा था और इस काम के लिये बड़ी जगह की जरूरत थी।

इस दौरान उनके घर दो बच्चों का भी जन्म हो चुका था और उन्होंने काम पूरा करने के लिये घर के नजदीक ही रायपुर में एक जगह किराये पर ले ली थी। मूर्तियों के भारी सांचों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना काफी मुश्किल काम था और उनकी गैरहाजिरी में बच्चों की देखभाल करने वाला भी कोई नहीं होता था। इस चुनौती से पार पाने के लिये दोनों ने कुछ दोस्तों और बैंक से लोन लेकर बस्तरपुर में एक जमीन खरीदी और घर और कारखाना एक ही जगह पर बना लिये।

इस दौरान मूर्तियों के आर्डर मिलने काफी कम हो गए तो परिवार फिर आर्थिक तंगहाली में आ गया। चित्रकला में तो जसु पहले ही पारंगत थी लिहाजा वे पेंटिंग के काम भी लेने लगीं। उन्होंने उकाई डैम की दीवारों की पेंटिंग का काम लिया जिसे उन्होंने तीन महीने में पूरा किया और दोबारा उनका जीवन पटरी पर आ गया। इस बीच दंपत्ति ने अपने काम के अनुरूप ‘शिल्पी’ (मूर्तिकार) का उपनाम अपना लिया।

मुश्किलों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा और इसी दौरान उनके पति को कैंसर हो गया और थोड़े ही दिनों भी वे उन्हें इस दुनिया में अकेला छोड़कर चल बसे। पति की मौत के बाद भी जसु ने खुद को टूटने नहीं दिया और दृढ़ता के साथ अपने काम में लगी रहीं। मनहरभाई की मौत के कुछ समय बाद जसु को दस फीट ऊंचे और दस फीट लंबे छत्रपति शिवाजी के बुत को बनाने का आर्डर मिला जो उनके लिये एक सपना था क्योंकि किसी भी महिला मूर्तिकार ने इतनी विशाल मूर्ति नहीं बनाई थी। आखिरकार कई दिनों की मेहनत के बाद जसु ने 3.25 टन की शिवाजी की कांस्य प्रतिमा को तैयार करने में सफलता पाई जिसे काफी धूमधाम के साथ राजकोट के रेसकोर्स रोड पर लगाया गया।

इसके बाद उन्होंने सफलतापूर्वक महाराणाप्रताप का 11 फीट ऊंचा एक बुत भी तैयार किया। इसके अलावा उन्होंने राजकोट नगरपालिका के लिये झांसी की रानी का एक बुत भी बनाया। उनके काम की ख्याति दूर-दूर तक फैलने लगी और उन्होंने अपन दोनों जवान हो चुके बच्चों को भी अपने साथ ही काम में लगा लिया।

जसु के काम की ख्याति विदेशों में भी फैली और उन्हें अमेरिका सहित कई अन्य देशों से भी कांसे की मूर्तियां बनाने के आॅर्डर मिले जिन्हें उन्होंने सफलतापूर्वक किया। अमेरिका में उनके बनाये हुए गांधीजी और अब्राहम लिंकन आज भी देश का मान बढ़ा रहे हैं और दुनिया को दिखा रहे हैं कि एक महिला अगर कुछ करने की ठान ले तो क्या नहीं कर सकती। शिल्पकला की दुनिया में उनके योगदान को देखते हुए अमेरिका में रह रहे गुजराती समुदाय ने उन्हें एक अवार्ड देकर भी नवाजा।

आखिरकार 14 जनवरी 2013 को मकर संक्रांति के दिन हार्ट अटैक की वजह से जसु शिल्पी इस दुनिया को हमेशा के लिये अलविदा कह गईं लेकिन उनके बनाए पुतलों में उनकी छवि आज भी देखी जा सकती है।

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