ज़ुबानी एक ऐसी लड़की की, जिसे अगवा कर वैश्यावृत्ति के अंधे कुएं में ढकेल दिया गया

वैश्यावृत्ति का शिकार हुई एक लड़की का खुला ख़त...

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वैश्यावृत्ति वो अंधेरी दुनिया है, जहां ढकेले जाने के बाद मासूम बच्चियां चाह कर भी बाहर निकल नहीं पातीं और जब निकलती हैं, तो एक उम्र गुज़र चुकी होती है। हम उस दुनिया की कल्पना भी नहीं कर सकते जहां कि गलियां तंग और छतें नीचे झुकी हुई हैं, जहां एक अजीब तरह की महक एक अजीब तरह की हंसी घूमती है, एक ऐसी हंसी जिसकी सच्चाई सिर्फ रुदन है। आप भी पढ़ें इसी दुनिया की एक ऐसी लड़की की कहानी, जो उसकी ही ज़ुबानी है...

सांकेतिक तस्वीर, साभार: Shutterstock
सांकेतिक तस्वीर, साभार: Shutterstock
वैश्यावृत्ति से पीड़ित लड़कियों का जीवन अक्सर उदासी एवं मानसिक बीमारियों का शिकार होता है। कितनी लड़कियां हैं, जो अपनी सारी ज़िंदगी डर-डर कर सहमें हुए गुज़ार देती हैं।

कुछ लड़कियों को बचा लिया गया, तो कुछ ने आत्महत्या कर ली। कुछ ने अपनी ज़िन्दगी से सारी उम्मीदें छोड़ दीं, तो कुछ उस खाई से बच निकलने में सफल रहीं। उन्हीं में कुछ ऐसी भी हैं जिनकी तलाश अब तक जारी है, लेकिन जो तलाश में भटक रही हैं, वे उत्पीड़ित हैं, दूषित हैं और कई तो ऐसी हैं जो दुनिया छोड़ कर जा चुकी हैं। कुछ को मार दिया गया तो कुछ ने अपना जीवन खुद ही समाप्त कर लिया। भारत में तस्करी और वैश्यावृत्ति का जीवन भयावह है। ये काम इतने अन्यायपूर्ण तरीके से हो रहा है कि कभी-कभी पुलिस और प्रशासन भी इसकी पहुंच से दूर हो जाते हैं। वैश्यावृत्ति से पीड़ित लड़कियों का जीवन अक्सर उदासी एवं मानसिक बीमारियों का शिकार होता है। कितनी लड़कियां हैं, जो अपनी सारी ज़िंदगी डर-डर कर सहमें हुए गुज़ार देती हैं।
उन लड़कियों से जब कोई पूछता है "तुम्हारी जिन्दगी में सबसे उदासी भरे पल क्या थे और क्यूँ?" तो यह डरावना सवाल उस किसी भी लड़की के लिए (जो की उस अंधे कुँए की शिकार बन चुकी है) दिल दहलाने जैसा होती है। ऐसे में एक लड़की का अपने अनुभवों, तकलीफों और जीवन को लेकर आपबीती सुना देना बड़ी हिम्मत का काम है। आईये पढ़ें एक ऐसा ही खुला ख़त जो संकरी गलियों और काली दिवारों से निकलकर यहां आ पहुंचा है...

अगवा कर वैश्यावृत्ति के अंधे कुएं में ढकेल दी जाने वाली लड़की की ज़ुबानी

"मैं 12 वर्ष के उम्र में अगवा कर ली गयी थी और 17 वर्ष की उम्र तक वेैश्यावृत्ति का शिकार होती रही। मैं अपने 12वें जन्मदिन के बाद अपने घर के पास वाले मैदान से अपहृत हुई थी, वो मेरे जन्मदिन की आखिरी पार्टी थी। मेरी नींद एक ट्रक में खुली। मेरी आँखें, हाथ, पैर सब बंधे हुए थे और मुँह बंद किया हुआ था। मुझे उस गाड़ी की ठंडी और कठोर दिवार में टकरा कर ज़ख़्मी होना आज भी याद है। अगले वक़्त मुझे एक कमरे में होश आया जहाँ काफी गंदगी थी। कुछ औरतों ने उसे साफ़ किया और मुझे खाना खिलाया। जब मैं अपनी मदद के लिए पुकार लगाती, चीखती-चिल्लाती तो वो लोग मेरे चेहरे को तकिये से दबा देतीं। मुझे बाद में यह बात पता चला कि वो औरतें मेरा मुंह तकिये से इसलिए दबाती थीं, ताकि वहां मौजूद कुछ शैतान मुझे जानवरों की तरह मारने न लगें।

मैं किशोर और जवान थी इस लिए मुझे शानदार कमरे में रखा गया। मेरी कौमार्य एक शेख़ के बड़े बंगले में बेचा गया। वह मुझे कई दिनों या सप्ताहों तक लूटता रहा। मैं एक-एक कर उसके सारे साथियों द्वारा लुटती रही। मैं बस उस शानदार कमरे में अनंत काल तक लेटी रही। लोग आते और उनका जो जी करता करके चले जाते। कभी-कभी मैं अपनी मानसिक वेदना तथा शारीरिक दर्द के कारण सो भी नही पाती, तो कभी-कभी मेरी नींद तब खुलती जब पहले से ही कमरे में कोई आ चुका होता था। कभी-कभी कोई डॉक्टर आ कर मेरा चेकअप कर चला जाता, ताकि मैं दुबारा किसी शेख़ के बंगले में उसका शिकार बन पाऊं। मेरे अन्दर इंसानियत जीवित थी, जिसकी वज़ह वो औरत थी जो रोज़ मुझे नहलाने और खिलाने मेरे कमरे में आया करती थी। वो जब भी मुझे देखती, बहुत ही उदास हो जाती। कभी-कभी उसकी भी आँखें आंसुओं से भर जातीं, जिससे मुझे यह एहसास होता कि जो कुछ भी हो रहा था वो गलत था। मैं कोई जानवर नही हूँ, मेरा जो दर्द था वो सच था और जिसे वो औरत महसूस कर रही थी।

एक रोज़ मेरी नींद शेख के कमरे से निकल कर किसी दूसरे कमरे में खुली। मैं रोने लगी, शायद कुछ घंटे... कुछ दिनों या कुछ हफ्ते तक, क्योंकि मुझे शेख के उस कमरे की आदत हो गई थी। मैं उन औरतों के बीच ज्यादा दिनों तक नहीं रही, जो चुप-चाप अपने हाथों में ब्रश और तरह तरह के रंग लेकर मेरे चेहरे बदलने (मेकअप) की कोशिश करती थीं। वो कोशिश में थीं, कि मुझे जीवित रख सकें। मेरी रौनक को बरकरार रख सकें। इस नए कमरे में मैं एक नए मास्टर के साथ थी, जो मुझे दिखावटी ताम-झाम से आकर्षक बनाता था और मुझे नाचना सिखाता था। मैं उस मास्टर के द्वारा तथा उसी के साथ नए-नए तरीकों से ग्राहकों की खिदमत करने के तौर-तरीके के लिए प्रशिक्षित की जाती थी। उस कमरे में शेखों का आना बंद हो गया था, उस कमरे में लोग शराफत की पोशाकें पहन कर आते थे। मेरे भीतर से सोचने-समझने की शक्ति समाप्त हो चुकी थी। मैं किसी रोबोट की जिन्दगी जी रही थी। मैं न तो किसी को रोक पाती न हीं किसी का विद्रोह कर पाती थी। मैं बस सबके हुक्म की गुलाम बन चुकी थी।

एक दिन एक ख़ाकी साड़ी पहनी हुई महिला ने मुझे वहाँ से खींच निकला। उसने मुझे झकझोरते हुए मेरा नाम पूछा। मैं उस वक़्त कुछ भी समझ नहीं पा रही थी, कि मेरे साथ क्या हो रहा है। मैं भूल चुकी थी कि लोग मुझे किस नाम से पुकारते थे। मैं रोने लगी और यह मेरे अगवा होने के बाद पहली बार हो रहा था, कि कोई सूती कपड़े पहनी महिला मुझे अपने सीने से लगा रही थी। वह बोल रही थी कि मैं तुम्हे बचाने आई हूँ, यहाँ इस अँधेरे कुँए से निकालने आई हूँ। मुझे भी बाकी औरतों के साथ वैन में बिठाया गया और पुलिस स्टेशन ले जाया गया। मुझे लगा की मैं मुंबई में हूँ, मुझे बताया गया कि मुझे 5 साल पहले अपहृत किया गया था और कुछ वर्षों तक हैदराबाद में रखा गया था। मुझे एक बचाव घर में रखा गया। मुझे मनोचिकित्सक से बात करवाई गई और उन्होंने मेरी कुछ क्लासिज़ लीं। फिर मैं परीक्षा में उपस्थित हुई। उस वक़्त मुझे यह सिखाया जाता रहा कि कैसे मुझे शेखों के उस शानदार कमरे से अलग हो कर जीना होगा। उस नरक भरी जिन्दगी से कैसे बहार आना होगा। 

मेरा शरीर उन गंदी घिनौनी चीजों का आदि हो चुका था, जिसके कारण मुझे हमेशा किसी अनहोनी की आशंका लगी रहती। मैं नई जिन्दगी जीना सीख रही थी, जो उस वक़्त मेरे लिए तकलीफदेह तो थी, लेकिन प्रतिष्ठा, गरिमा और सम्मान से भरी हुई थी। वहाँ मुझे पता चला की कई बार मेरे असुरक्षित गर्भपात भी किये गए थे, जिसके कारण मैं कभी माँ नहीं बन सकती। एक ग्राहक के द्वारा मेरी कलाई घुमा कर तोड़ दी गयी थी जिसके कारण यह झुक गयी और कभी ठीक नहीं हो सकती। डॉक्टरों की मदद से मैं अपने बचपन को याद कर पायीl NGO के लोगों ने जब मेरे घर वालों का पता लगाया तो यह पता चला कि मेरे गुमशुदगी के कारण मेरी माँ ने अपना खान-पान त्याग दिया था, जिसके कारण उनकी मृत्यु हो गयी और मेरे पिता ने खुद को अकेला और असहाय पा कर ख़ुदकुशी कर ली। मेरी NGO ने मुझे दिल्ली में एक संस्था के हवाले कर दिया, जो मुझे आर्थिक संरक्षण देने लगी और मैं उनकी मदद के द्वारा कंप्यूटर तथा विदेशी भाषा के पाठ्यक्रम से जुड़ गयी। मैं अब एक कंप्यूटर सेंटर में बतौर शिक्षिका काम करती हूँ और एक किराये के घर में दो लड़कियों के साथ रह रही हूँ।

मेरा एक दोस्त है जो मुझसे बहुत प्यार करता है और बहुत इज्ज़त भी। वो मेरी पिछली जिन्दगी से वाकिफ़ है लेकिन जब भी मैं अपने पुराने दिनों को दुहराती हूँ तो वह मुझे रोक देता है। आज भी मैं कभी-कभी नहीं सो पाती हूँ। यह सोचते हुए जाग जाती हूँ, कि मैं वापस उसी नर्क में चली गयी हूँ। फिर मैं अपने दोस्त को आधी रात में भी बुलाती हूँ और वो आ कर मुझे समझाता है। मुझे एहसास दिलाता है, कि मैं सुरक्षित हूँ। वह एक पंजाबी लड़का है। हमेशा मुझे हँसाता रहता है। मेरी ख़ुशी के लिए नाचता है, गाता है, मुझे घुमाने ले जाता है और मेरे लिए खाना भी पकाता है। वो मुझे अपने साथ जिम जाने को भी कहता है, क्योंकि वर्षों की कैद के कारण मेरा शरीर कमजोर हो गया है। वो एक साधारण परिवार से तालुकात रखता है, इसलिए वो अपने परिवार तथा दोस्तों को मेरे अतीत के बारे में नहीं बता सकता। प्रॉमिस डे के दिन उसने मुझे प्रपोज़ भी किया था। मैंने उसे हां नहीं कहा। मैं उसके लायक नहीं हूँ। वह देखने में बहुत सुंदर है, ईमानदार है, पढ़ा-लिखा है और बहुत समझदार भी है। मैं टूटी हुई हूँ, गंदी हो चुकी हूँ और मैं किसी की पत्नी बनने योग्य नहीं हूँ। वह बोला कि उसकी तरफ से कोई दवाब नहीं है, वह मेरा इंतज़ार करेगा और बच्चे गोद ले लेगा। उसे मेरी बीती जिन्दगी से कोई परेशानी नहीं है। मगर मैं उस दिन का इंतज़ार कर रही हूँ जिस दिन उसे यह एहसास हो जाए की उसे मुझसे अच्छी लड़की मिल जायेगी। मैं अपनी बोझ भरी जिन्दगी से उसकी सपनों भरी जिन्दगी को बर्बाद नहीं करना चाहती।

यह मेरे जिन्दगी के सबसे गहरे उदासी भरे राज़ थे, जिसे आपने अपना कीमती समय निकाल कर पढ़ा। 

-आप सबको मेरा धन्यवाद.."

उसके पास उसके माता-पिता भी नहीं हैं, जिनसे वह बता सकती कि माँ मैं उस नर्क से वापस आ गयी... उसके पास कोई अपने सगे भी नहीं, जो उसे सांत्वना दे सकते। वह अपनी जिन्दगी बस जीने के लिए जी रही है। उसके भूत ने उसके वर्तमान को इतना घायल कर दिया है कि वह अपने भविष्य को लेकर कुछ अच्छा सोच ही नहीं पाती। फिर भी इतना सबकुछ लिख देने की हिम्मत कुछ ही लड़कियों में होती है।

इस लड़की की दिल दहला देने वाली कहानी कहीं न कहीं यह देखने-सोचने को मजबूर कर देती है, कि आज के दौर में भी लडकियाँ कितनी असुरक्षित हैं, जोकि हम सब देशवासियों की अपने प्रति जवाबदेही है।

प्रस्तुति: उत्पल आनंद

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