दूध बेचने वाले के बेटे और मजदूर की बेटी ने किया बोर्ड एग्जाम में टॉप

मध्य प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के टॉपर्स की कहानी...

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मध्य प्रदेश माध्‍यमिक शिक्षा बोर्ड में इस बार टॉप करने वाले साजापुर के हर्षवर्धन परमार दूध बेचकर घर-गृहस्थी चलाने वाले पिता की संतान हैं। इसी तरह 12वीं के कला संकाय की मेरिट में पहला स्थान प्राप्त करने वाली छिंदवाड़ा के गांव बीचकवाड़ा की शिवानी पवार एक मजदूर की बेटी हैं। मध्यप्रदेश की ऐसी ही एक और होनहार स्टुडेंट शाहजहां खातून के पिता तो पंक्चर जोड़ते हैं।

हर्षवर्धन और शिवानी (फोटो साभार- सोशल मीडिया)
हर्षवर्धन और शिवानी (फोटो साभार- सोशल मीडिया)
शिवानी के पिता दिनेश पवार मजदूरी करते हैं। मुश्किल परिस्थितियां होने के बाद भी शिवानी ने हार नहीं मानी, वो सुबह 4 बजे उठकर हर दिन 10 घंटे तक पढ़ाई करती थी। आस-पास के लोगों ने भी उसे प्रोत्साहित पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया और आज शिवानी ने यह मुकाम पाया।

मध्य प्रदेश माध्‍यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा घोषित 10वीं और 12वीं के रिजल्‍ट ने मेहनतकश और गरीब परिवारों के बच्चों के लिए एजुकेशन में कामयाबी की एक और नई लौ जलाई है। कालापीपल (साजापुर) में दूध बेच कर घर-गृहस्थी की गाड़ी खींचने वाले पिता की होनहार संतान हर्षवर्धन परमार ने दसवीं के बोर्ड एग्जाम में पूरे प्रदेश में टॉप किया है। हर्षवर्धन को 500 में से कुल 495 नंबर मिले हैं। टॉप टेन के अन्य छात्रों में उमरिया के सुभाष पटेल, प्रभात शुक्ला, आगर मालवा संयम जैन और ब्यावरा राजगढ़ के राधेश्याम सोंधिया को 494, बुरहानपुर के चितवन नाइक, आयुषी शाह, नरसिंहपुर की साक्षी लोही, छतरपुर की प्रिया साहू तथा अनूपपुर की पलक गौतम को 493 अंक मिले हैं।

हर्षवर्धन परमार ने दिन-रात एक करके तैयारी की और टॉपर बनें। हर्षवर्धन के पिता दूध बेचकर परिवार चलाते हैं। उनका सपना है बेटा हर्षवर्धन अच्छी पढ़ाई करके बड़ा अफसर बने। वहीं हर्षवर्धन का सपना है कि वो आगे पढ़ाई करके एनडीए अफसर बने। वो आर्मी में जाना चाहते हैं। हर्षवर्धन का कहना है कि वो माता-पिता के सपनों को पूरा करना चाहते हैं और हर फील्ड में सफल होना चाहते हैं। शुरू में हर्षवर्धन ने पिता के कामों में मदद करनी चाही, लेकिन पिता ने उन्हें पढ़ाई में मन लगाने की हिदायत देते हुए अपने काम में हाथ बंटाने से मना कर दिया था।

हर्षवर्धन के साथ-साथ अनामिका साध भी टॉपर हैं। दोनों को एक समान अंक मिले हैं। अनामिका सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनना चाहती है। इसके लिए वह जेईई की तैयारी कर रही हैं।

इसी तरह मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के छोटे से गांव बीचकवाड़ा में रहने वाली शिवानी पवार ने वो कर दिखाया है जो हर किसी के लिए सीख है कि मेहनत करके सफलता का मुकाम हासिल किया जा सकता है। शिवानी ने 12वीं के कला संकाय की मेरिट में पहला स्थान प्राप्त किया है। शिवानी शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, उमरेठ की छात्रा हैं। हर दिन उन्हें 10 किमी का सफर तय कर स्कूल जाना पड़ता था, जिसमें से 5 किमी. कच्चे रास्ते पर पैदल चलना पड़ता था।

शिवानी के पिता दिनेश पवार मजदूरी करते हैं। मुश्किल परिस्थितियां होने के बाद भी शिवानी ने हार नहीं मानी, वो सुबह 4 बजे उठकर हर दिन 10 घंटे तक पढ़ाई करती थी। आस-पास के लोगों ने भी उसे प्रोत्साहित पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया और आज शिवानी ने यह मुकाम पाया। शिवानी का सपना टीचर बनना है, वो चाहती हैं कि उसकी तरह मुश्किल परिस्थितियों में रह रहे बच्चे अच्छे से पढ़े और आगे चलकर अपने माता-पिता और गांव का नाम रोशन करे। गौरतलब है कि 10वीं और 12वीं में 70 फीसदी से अधिक अंक लाने वाले स्‍टूडेंट्स की स्वयं सरकार की ओर से करियर काउंसलिंग कराई जाएगी। 10वीं में हर्षवर्धन परमार के अलावा विदिशा की अनामिका साध ने भी टॉप किया है। 10वीं में प्रभात शुक्ला और प्रसाद पटेल दूसरे स्थान पर रहे।

12वीं में आर्ट्स में शिवार पवार, फाइन आर्ट्स में तमन्ना कुशवाहा, 12वीं साइंस (बायोलॉजी) में दीपल जैन, गणित में ललित पंचोरी, कॉमर्स में आयुषी धेंगुला ने टॉप किया है। दसवीं में इस बार 11 लाख 352 हजार स्टूडेंट्स ने परीक्षा दी थी, जिनमें से 66.54% बच्चों ने सफलता हासिल की है। दिव्यांग वर्ग में नेत्रहीन छात्र शाही शेखर प्रकाश ने टॉप किया है। इन मेरिटोरियस स्टूडेंट्स को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह सम्मानित करेंगे। पिछले साल 10वीं कक्षा में 49.9 फीसदी बच्चे पास हुए थे, जिसमें 51.46 फीसदी छात्राएं और 48.5 छात्र थे। हर्षवर्धन और शिवानी की तरह दो और ऐसी छात्राएं हैं, जिन्होंने अपने विपरीत घरेलू हालात से लड़ते हुए उज्ज्वल भविष्य का मंच खुद तैयार कर लिया है।

एक बैतूल की ऋषिका और दूसरी हैं उमरिया की शाहजहां खातून। इन दोनों ने समस्याओं का सामना तो किया लेकिन सफलता के लिए खूब मेहनत की और चुनौतियों के सामने घुटने नहीं टेके। शाहजहां खातून और ऋषिका खोबरे ने क्रमश: 500 में से 476 और 500 में से 472 अंक हासिल करके टॉप 10 में जगह बनाई है। शाहजहां गणित संकाय से तो है ऋषिका जीवविज्ञान की छात्रा हैं। शाहजहां के पिता मोहम्मद मुश्ताक की पंक्चर की दुकान है, जबकि ऋषिका के पिता एक छोटे से किसान हैं। ऋषिका के पिता ने तो बेटी की पढ़ाई के लिए गांव तक छोड़ दिया था और बैतूल शहर में किराये के मकान में रह रहे थे। शाहजहां खातून उमरिया जिले के एक छोटे से कस्बे करकेली और ऋषिका बैतूल के चिचोली ब्लॉक के गोधना गांव की रहने वाली हैं।

जो बच्चे अपनी संपन्न पारिवारिक पृष्ठभूमि के चलते ऐसी परीक्षाओं में बेहतर सफलता हासिल करते हैं, उसमें उनकी प्रतिभा के साथ घरेलू स्थितियों का भी निश्चित रूप से योगदान होता है लेकिन गरीबी में जन्मे, मुफलिसी में पले-बढ़े हर्षवर्धन परमार और शिवानी पवार जैसे स्टूडेंट्स जब ऐसे सभी बच्चों को पीछे छोड़ते हुए मेरिट टॉपर बन जाते हैं, सचमुच उन पर उनके माता-पिता और टीचर ही नहीं, देश के पूरे बौद्धिक समाज को गर्व होता है। ऐसे संसाधनहीन बच्चों का परीक्षा पास हो जाना और बात है लेकिन जब वह आज के कठिन समय में समस्त आर्थिक चुनौतियों को ठेंगा दिखाते हुए सबके सिरहाने जाकर बैठ जाते हैं, सुनने वाले के मुंह से बरबस निकल पड़ता है - वाह मेरे गुदड़ी के लाल, तू ने कर दिया कमाल।

ऐसी सफलताएं सिर्फ छात्र समुदाय ही नहीं, पूरे भारतीय शिक्षा जगत को एक बड़ा संदेश देती हैं कि स्कूल-कॉलेज में किसी गरीब छात्र की कत्तई उपेक्षा नहीं होनी चाहिए क्योंकि फटेहाली में पला-बढ़ा कोई छात्र भी अपने स्कूल-कॉलेज का नाम पूरे देश में रोशन कर सकता है। हमारे देश में तमाम सामाजिक संस्थाएं ऐसी भी हैं, जो टैलेंट का झंडा गाड़ देने के बाद ऐसे छात्रों की मदद भी करती हैं। सरकारी स्तर पर भी ऐसे छात्रों को कई अतिरिक्त सुविधाएं मिलने लगती हैं। जाहिर है कि आज के जमाने में हर खाते-पीते परिवार का बच्चा बिना ट्यूशन लिए एक कदम नहीं चल पाता है लेकिन संसाधनहीन परिवारों के बच्चे सिर्फ अपनी प्रतिभा के बूते जब उन सबको पीछे छोड़ देते हैं तो लगता है कि प्रतिभा किसी स्टेटस की मोहताज नहीं होती है। वह अपना रास्ता खुद बनाती जाती है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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