आज की सेल्फ ऑबसेस्ड युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा है लता मंगेश्कर की विनम्रता

लता मंगेश्कर की जिंदगी को हर कोई करीब से जानान चाहता है। उनकी जीवन गाथा प्रेरक भी है और रोचक भी। यहां जानें उनकी जिंदगी के कुछ ऐसे ही किस्से।

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लता मंगेशकर ही एकमात्र ऐसी जीवित शख्सियत हैं, जिनके नाम पर पुरस्कार दिए जाते हैं। लेकिन जब एक पत्रकार ने उनसे ये सवाल पूछा कि 'क्या वह भी गुरुकुल में संगीत की शिक्षा देगीं'? तो उनका कहा था कि, 'मैं किसी को क्या शिक्षा दूंगी। मुझे तो ख़ुद ही एक गुरु की ज़रूरत हैं।'

लता ने 5 साल की उम्र से ही पिता के साथ एक रंगमंच कलाकार के रूप में अभिनय करना शुरू कर दिया था।
लता ने 5 साल की उम्र से ही पिता के साथ एक रंगमंच कलाकार के रूप में अभिनय करना शुरू कर दिया था।
संगीत की दुनिया में राज करने वाली स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर को एक बार गाने के लिए रिजेक्ट भी किया जा चुका है। फिल्म 'शहीद' के निर्माता 'सशधर मुखर्जी' ने ये कहते हुए लता मंगेशकर को रिजेक्ट कर दिया था, कि उनकी आवाज बहुत पतली है।

"लता जी बचपन में पढ़ाई नहीं कर पाईं, लेकिन दुनिया की 6 बड़ी यूनिवर्सिटीज से उन्हें डॉक्टरेट की डिग्री मिली है। अपनी आवाज को और सुरीला और मीठा बनाने के लिए वो रोज ढेर सारी हरी मिर्च खाती हैं, खासकर तीखी कोल्हापुरी मिर्च"

लता मंगेश्कर जैसी विनम्रता और कहां। वो 87 साल की हैं। हिंदुस्तानी संगीत जगत की मल्लिका हैं। लता मंगेशकर का नाम सुनते ही हम सभी के कानों में मीठी-मधुर आवाज शहद-सी घुलने लगती है। आठ दशक से भी अधिक समय से हिन्दुस्तान की आवाज बनीं लता ने 30 से ज्यादा भाषाओं में हजारों फिल्मी और गैर-फिल्मी गानों में अपनी आवाज़ का जादू बिखेरा। लता ही एकमात्र ऐसी जीवित शख्सियत हैं, जिनके नाम पर पुरस्कार दिए जाते हैं। लेकिन जब एक पत्रकार ने उनसे ये सवाल पूछा कि 'क्या वह भी गुरुकुल में संगीत की शिक्षा देगीं'? तो उनका कहा था कि, 'मैं क्या किसी को शिक्षा दूंगी। मुझे तो ख़ुद एक गुरु की ज़रूरत हैं।'

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दिलीप कुमार के ताने पर लता ने सीख डाली उर्दू

उन पर लिखी किताब 'लता मंगेश्कर इन हर ओन वॉयस' में ख़ुद लता मंगेशकर ने एक किस्से का ज़िक्र किया है कि किस तरह दिलीप कुमार ने लता के मराठी होने की वजह से उनकी उर्दू अच्छी न होने पर टिप्पणी की थी, जिसके बाद लता ने अपनी उर्दू भाषा को ठीक करने के लिए एक टीचर भी रखा। ऐसे ही कई उतार-चढ़ाव के बावजूद सफलता हासिल करने के बारे में पूछे जाने पर वो बताती हैं, 'ये हर किसी की ज़िंदगी में होता हैं कि सफलता से पहले असफलता मिलती है। मैं विवेकानंद और संत ज्ञानेश्वर की भक्त हूं। मैं तो बस लोगों से इतना कहना चाहूंगी कि कभी हार मत मानो। एक दिन आप जो चाहते है वो ज़रूर मिलेगा।'

लता की परवरिश महाराष्ट्र में हुई थी। जब लता सात साल की थीं, तब वो महाराष्ट्र आईं थीं। लता ने पांच साल की उम्र से पिता के साथ एक रंगमंच कलाकार के रूप में अभिनय शुरू कर दिया था। लता बचपन से ही गायिका बनना चाहती थीं। लता के पिता शास्त्रीय संगीत के बहुत बड़े प्रशंसक थे, इसीलिए शायद वह लता के फिल्मों में गाने के खिलाफ थे। वर्ष 1942 में उनके पिता का देहांत हो गया। इसके बाद उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बिगड़ गई और अर्थोपार्जन के लिए लता ने मराठी और हिंदी फिल्मों में छोटी-छोटी भूमिकाएं निभानी शुरू कीं। लता ने पहली बार 1942 में मराठी फिल्म 'किती हसाल' के लिए गाना गाया। लता के भाई हृदयनाथ मंगेशकर और बहनें ऊषा मंगेशकर, मीना मंगेशकर और आशा भोंसले सभी ने संगीत को ही अपना करियर चुना। लता जी बचपन में पढ़ाई नहीं कर पाईं लेकिन दुनिया की 6 बड़ी यूनिवर्सिटीज से उन्हें डॉक्टरेट की डिग्री मिली है। अपनी आवाज को और सुरीला और मीठा बनाने के लिए वो रोज ढेर सारी हरी मिर्च खाती हैं, खासकर तीखी कोल्हापुरी मिर्च

लता मंगेश्कर की जिंदगी को हर कोई करीब से जानान चाहता है। उनकी जीवन गाथा प्रेरक भी है और रोचक भी, तो आईये जानते हैं उनकी ज़िंदगी के कुछ ऐसे रोचक किस्से जिसे आपने शायद ही पहले कभी सुना हो...

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"बचपन में लता को रेडियो सुनने का बड़ा शौक था। जब वह 18 वर्ष की थी तब उन्होने अपना पहला रेडियो खरीदा और जैसे ही रेडियो ऑन किया तो के.एल.सहगल की मृत्यु का समाचार उन्हें प्राप्त हुआ। बाद में उन्होंने वह रेडियो दूकानदार को वापस कर दिया।"

किशोर दा से वो पहली मुलाक़ात

40 के दशक में जब लता ने फिल्मों में गाना शुरू ही किया था, तब वो अपने घर से लोकल ट्रेन पकड़कर मलाड जाती थीं। वहां से वो उतरकर स्टूडियो बॉम्बे पैदल टॉकीज जाती थीं। रास्ते में उन्हें किशोर दा भी मिलते। लेकिन वो एक दूसरे को नहीं पहचानते थे। बीबीसी से हुई अपनी बातचीत में लता ने बताया कि किशोर दा मेरी तरफ देखते रहते। कभी हंसते। कभी अपने हाथ में पकड़ी छड़ी घुमाते रहते। मुझे उनकी हरकतें अजीब सी लगतीं। मैं उस वक़्त खेमचंद प्रकाश की एक फिल्म में गाना गा रही थी। एक दिन किशोर दा भी मेरे पीछे-पीछे स्टूडियो पहुंच गए। मैंने खेमचंद जी से शिकायत की, "चाचा ये लड़का मेरा पीछा करता रहता है। मुझे देखकर हंसता है।" तब उन्होंने कहा, "अरे, ये तो अपने अशोक कुमार का छोटा भाई किशोर है।" फिर उन्होंने मेरी और किशोर दा की मुलाक़ात करवाई और हमने उस फिल्म में पहली बार साथ में गाना गाया।

लता का साइकिल प्रेम

आज जिन स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर के पास भौतिक सुविधा के सभी साधन-संसाधन हैं, वो कभी एक अदद साइकिल के सपने देखती थीं, जैसा कि हर बच्चा देखता है। बचपन में लता मंगेशकर को शौक था कि वे साइकिल चलाएं। इसके लिए उन्होंने बाकायदा अपनी सहेलियों की साइकिल से ये हुनर सीखा भी। इससे उनके मन में ये सपना जागा कि उनके पास अपनी खुद की एक साइकिल हो। मगर वो दौर आर्थिक समृद्धि का नहीं था इसलिए लताजी इस सपने को जिस तरह पूरा करना चाहती थीं, वैसे नहीं कर पाईं। मगर बाद में जब वे फिल्मों में गायन करने लगीं और उनकी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी हो गई, तब उन्होंने अपने उस स्वप्न को फिर जीवंत किया। हालांकि वह उम्र साइकिल चलाने की नहीं थी, इसलिए उन्होंने एक कार खरीदी। इस कार के लिए उन्होंने अपनी कमाई से 8000 रुपए बचाए और अपना सपना सच किया। बाद में मुंबई में वे लंबे समय तक इस कार में खूब शौक से बैठती रहीं और गर्व महसूस करती रहीं।

जब रिजेक्ट हुईं लता

आज संगीत की दुनिया में राज करने वाली लता मंगेशकर को एक वक्त उन्हें गाने के लिए रिजेक्ट कर दिया गया था। फिल्म 'शहीद' के निर्माता 'सशधर मुखर्जी' ने ये कहते हुए लता मंगेशकर को रिजेक्ट कर दिया था कि उनकी आवाज बहुत पतली है।

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मोहम्मद रफी से झगड़ा

60 के दशक में लता दी अपनी फिल्मों में गाना गाने के लिए रॉयल्टी लेना शुरू कर चुकी थीं, लेकिन उन्हें लगता था कि सभी गायकों को रॉयल्टी मिले तो अच्छा होगा। लता मंगेशकरमुकेश और तलत महमूद ने एक एसोसिएशन बनाई थी। उन सबने रिकॉर्डिंग कंपनी एचएमवी और प्रोड्यूसर्स से मांग की, कि गायकों को गानों के लिए रॉयल्टी मिलनी चाहिए। लेकिन उनकी मांग पर कोई सुनवाई नहीं हुई। तो उन सबने एचएमवी के लिए रिकॉर्ड करना ही बंद कर दिया। तब कुछ निर्माताओं और रिकॉर्डिंग कंपनी ने मोहम्मद रफ़ी को समझाया कि ये गायक क्यों झगड़े पर उतारू हैं। गाने के लिए जब पैसा मिलता है तो रॉयल्टी क्यों मांगी जा रही है। लता के मुताबिक, रफी भैया बड़े भोले थे। उन्होंने कहा, "मुझे रॉयल्टी नहीं चाहिए।" उनके इस कदम से हम सभी गायकों की मुहिम को धक्का पहुंचा। मुकेश भैया ने मुझसे कहा, "लता दीदी रफ़ी साहब को बुलाकर आज ही सारा मामला सुलझा लिया जाए।" हम सबने रफी जी से मुलाक़ात की। सबने रफ़ी साहब को समझाया। तो वो गुस्से में आ गए। मेरी तरफ देखकर बोले, "मुझे क्या समझा रहे हो। ये जो महारानी बैठी है। इसी से बात कर।" तो मैंने भी गुस्से में कह दिया, "आपने मुझे सही समझा। मैं महारानी ही हू।" तो उन्होंने मुझसे कहा, "मैं तुम्हारे साथ गाने ही नहीं गाऊंगा।" मैंने भी पलट कर कह दिया, "आप ये तक़लीफ मत करिए। मैं ही नहीं गाऊंगी आपके साथ।" फिर मैंने कई संगीतकारों को फोन करके कह दिया कि मैं आइंदा रफ़ी साहब के साथ गाने नहीं गाऊंगी। इस तरह से हमारा तीन साढ़े तीन साल तक झगड़ा चला।

"आपमें से बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि लता मंगेशकर म्यूज़िक डायरेक्टर भी रह चुकी हैं। उन्होंने फिल्मों में ‘आनंदघन’ के नाम से म्यूजिक दिया है।"

जब लता ने कोरस में गाया था गाना

बॉलीवुड के दिग्गज संगीतकारों में शुमार अनिल विश्वास एक दिन सुरिंदर कौर का कोई गीत रिकॉर्ड करा रहे थे। संयोग से उस दिन लता मंगेशकर भी वहां मौजूद थीं। अनिल दा ने बड़े प्यार से लता मंगेशकर को अधिकारपूर्वक बुलाते हुए कहा, 'लतिके ! इधर आओ, तुम कोरस में गाओ। इससे गाना अच्छा हो जाएगा।' लता ख़ुद इस वाक़़ये को याद करते हुए कहती हैं, "दादा ने ना जाने किस मूड में बड़ी प्रसन्नता से यह बात कही थी, तो मुझे भी लगा उनके मन की बात करते हैं और आप विश्वास करिए कि मुझे उस समय कोरस में गाकर भी उतना ही आनंद आया, जितना की उनके मुख्य स्त्री किरदारों के लिए रचे गए गीतों को गाते हुए होता था।" यह एक बड़े फ़नकार का दूसरे बड़े फ़नकार के प्रति सम्मान का भाव ही कहा जाएगा, क्योंकि जब लता मंगेशकर कोरस में गाने के लिए तैयार हुईं तब वह लीडिंग सिंगर के तौर पर स्थापित हो चुकी थीं। लता मंगेशकर के जीवन से जुड़े ऐसे ही दिलचस्प विवरणों का दस्तावेज़ है 'लता- सुर गाथा।' वाणी प्रकाशन से प्रकाशित ये किताब लता मंगेशकर के साथ भारतीय फ़िल्म संगीत की भी झलक पेश करती है।

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विवाह के बंधन में क्यों नहीं बंधी लता?

बचपन में कुंदनलाल सहगल की एक फिल्म चंडीदास देखकर वह कहती थीं, कि वह बड़ी होकर सहगल से शादी करेंगी। लेकिन उन्होंने शादी नहीं की। उनका कहना है कि घर के सभी सदस्यों की जिम्मेदारी उन पर थी, ऐसे में जब शादी का ख्याल आता भी तो वह उस पर अमल नहीं कर सकती थीं। लता ने अपने करियर में कई उपलब्धियां हासिल की हैं। उनकी कोयल सी मधुर आवाज ने सैकड़ों फिल्मों के गीतों को अमर बनाया है।

"लता मंगेशकर को पहली बार मंच पर गाने के लिए 25 रुपये मिले थे, उन्होंने पहली बार 1942 में मराठी फिल्म 'किती हसाल' के लिए गाना गाया था।"

लता को जहर दिया जा रहा था

1962 में जब लता 32 साल की थी तब उन्हें स्लो प्वाइजन दिया गया था। लता की बेहद करीबी पद्मा सचदेव ने इसका जिक्र अपनी किताब ‘ऐसा कहां से लाऊं’ में किया है। जिसके बाद राइटर मजरूह सुल्तानपुरी कई दिनों तक उनके घर आकर पहले खुद खाना चखते, फिर लता को खाने देते थे। हालांकि, उन्हें मारने की कोशिश किसने की, इसका खुलासा आज तक नहीं हो पाया।

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लता मंगेशकर को है भोजपुरी गीतों से लगाव

लता मंगेशकर का भोजपुरी गीतों के प्रति भी काफी लगाव है। वे खुद मानती हैं कि भोजपुरी में गाए गए गीत किसी को भी मंत्रमुग्ध कर सकते हैं। उन्होंने खुद कहा कि भोजपुरी लोकगीतों की स्वर लहरियां बेमिसाल हैं। साठ के दशक में बनी पहली भोजपुरी फिल्म- गंगा मइया तोहे पियरी चढइबो के कई गानों को लता मंगेशकर ने ही आवाज दी थी।

भोजपुरी फिल्मों में 'लागी नाही छूटे रामा' एक बहुत ही मशहूर फ़िल्म रही है जो सन् 1963 में बनी थी। हिन्दी फ़िल्म जगत के उस वक्त ऐसे दो मशहूर संगीतकार थे जिनका भोजपुरी फ़िल्म संगीत में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। ये थे एस. एन. त्रिपाठी और चित्रगुप्त। फ़िल्म 'लागी नाही छूटे राम' में चित्रगुप्त का संगीत था।

-प्रज्ञा श्रीवास्तव

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