13 हजार गरीब ग्रामीण महिलाओं की जिंदगी संवार चुका है 'टीएचपी'

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टार्गेटिंग हार्डकोर पुअर यानि कि टीएचपी कार्यक्रम में दाखिला लेने के बाद 13 हजार जीवन में एक नई रोशनी आई है। आईटीसी लिमिटेड द्वारा संचालित और टीम बंधन द्वारा समर्थित ये दो वर्षीय कार्यक्रम गरीबी उन्मूलन के लिए काम करता है। ये कार्यक्रम अपनी विकास गतिविधियों के माध्यम से महिला सशक्तिकरण करता है।

इसमें सबसे वंचित परिवार और महिलाओं को नामित किया गया है। ये नामित लोग और परिवार टीएचपी कार्यक्रम से लाभ उठा सकते हैं। फिर टीम बंधन इस प्रक्रम को आगे फिल्टर करता है। हर गांव में औसतन पांच से छह लोगों का चयन किया जाता है। चयन पूरा होने के बाद, महिलाओं को एक उद्यम विकास कार्यक्रम के तहत एक व्यवसाय चुनने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

एक ग्रामीण महिला पुष्पा बताती हैं कि इस योजना का उपयोग करने के बाद, लोगों ने गांव में मुझे सम्मान देना शुरू कर दिया है। अब, वे मुझे देखकर मुझसे बात करते हैं। पुष्पा के लिए, और उसके जैसे कईयों के लिए यह उनके जीवन सबसे बड़ी उपलब्धि है।

पुष्पा परमार के पति एक ड्राइवर थे जिनके साथ चार साल पहले एक कार दुर्घटना हो गई थी। तब से पुष्पा के परिवार ने एक अलग ही मोड़ ले लिया था। क्योंकि पुष्पा के पति को गलती से एक व्यक्ति की हत्या के आरोप में जेल में बंद कर दिया गया था। हारकर पुष्पा ने अपने तीन बच्चों के पालन पोषण के लिए एक दैनिक वेतन मजदूर के रूप में काम करना शुरू कर दिया। मध्यप्रदेश के सीहोर जिले के बिल्कीसगंज गांव के रहने वाली पुष्पा अपनी दुख व्यथा बताते हुए कहती हैं, 'मैंने रोज़ मजदूर के रूप में काम करना शुरू कर दिया था, लेकिन एक हफ्ते में एक या दो बार काम करने मौका मिलता था। एक दिन मेहनत से काम करने के बाद पता चलता था कि दूसरे दिन मैं फिर से बेरोजगार हूं। पूरे दिन हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी मैं प्रति दिन 100 रुपये ही कमा पाती थी, जो चार के परिवार को खिलाने के लिए बहुत कम पड़ता था।' आज पुष्पा के परिवार के भाग्य ने फिर से एक मोड़ ले लिया है, लेकिन इस बार बेहतर के लिए। पुष्पा अब एक ब्यूटी पार्लर चलाती हैं और गांव में महिलाओं के लिए कपड़े भी सिलती हैं। वो बताती हैं, अब मैं प्रति माह लगभग 5000 रुपये से 5500 रुपये कमा लेती हूं। और तो और कुछ समय जब त्यौहार और शादी का सीजन रहता है तो कमाई 7000 रुपये तक हो जाती है। अब मेरे बच्चों को उचित भोजन मिल जाता है और वो स्कूल भी जाते हैं ।

कौन हैं इन खुशियों की वजह-

न केवल पुष्पा बल्कि 13,000 से अधिक महिलाओं की कुछ ऐसी ही कहानियां हैं। टार्गेटिंग हार्डकोर पुअर यानि कि टीएचपी कार्यक्रम में दाखिला लेने के बाद उनके जीवन में एक नई रोशनी आई है। आईटीसी लिमिटेड द्वारा संचालित और टीम बंधन द्वारा समर्थित ये दो वर्षीय कार्यक्रम गरीबी उन्मूलन के लिए काम करता है। ये कार्यक्रम अपनी विकास गतिविधियों के माध्यम से महिला सशक्तिकरण करता है। कार्यक्रम के एक भाग के रूप में, महिलाओं को स्वयं और उनके परिवार के लिए एक परिपूर्ण जीवन बनाने के लिए सामाजिक-आर्थिक प्रणाली में बदलाव के लिए काम किया जाता है। आईटीसी लिमिटेड के एक अधिकारी ने बताया, जब तय उद्देश्यों को हासिल किया जाता है, तो यह कार्यक्रम उस गांव से आगे बढ़ जाता है। यह कार्यक्रम अफ्रीका और बांग्लादेश में भी सफलतापूर्वक लागू किया गया है।

पुष्पा अब अपने बूते पर घर चला रही हैं
पुष्पा अब अपने बूते पर घर चला रही हैं

कैसे काम करता है ये प्रोग्राम-

यह कार्यक्रम एक सहभागिता ग्रामीण मूल्यांकन (पीआरए) की बैठक के साथ शुरू होता है, जहां ग्रामीण परिवारों के सदस्य आईटीसी और बंधन अधिकारियों से मिलते हैं। परिवारों को अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार मानचित्रित किया जाता है और सबसे ज्यादा जरूरतमंद नामित किया जाता है। एक बार महिलाओं की पहचान हो जाने के बाद, चयनित महिलाओं को सत्यापित करने के लिए एक घरेलू सर्वेक्षण किया जाता है। सत्यापित करने के लिए 135 सवालों का एक दौर चलता है। आईटीसी के एक प्रवक्ता ने बताया, पीआरए एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से सबसे वंचित परिवार और महिलाओं को नामित किया गया है। ये नामित लोग और परिवार टीएचपी कार्यक्रम से लाभ उठा सकते हैं। फिर टीम बंधन इस प्रक्रम को आगे फिल्टर करता है। हर गांव में औसतन पांच से छह लोगों का चयन किया जाता है। चयन पूरा होने के बाद, महिलाओं को एक उद्यम विकास कार्यक्रम के तहत एक व्यवसाय चुनने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। उन्हें किराने की दुकान, बकरी पालन, सिलाई, सौंदर्य पार्लर चलाने, झाड़ू बनाने और दूसरों के व्यवसाय-प्रबंधन के विकल्प दिए गए हैं।

इस कार्यक्रम से लाभांवित एक और महिला सरिता के मुताबिक, सबसे पहले उन्होंने हमारे गांव का सर्वेक्षण किया और फिर मुझे चुना गया था। तब मुझे उद्यम की मेरी पसंद के बारे में पूछा गया। मैंने उन्हें एक किराने की दुकान के लिए पूछा। फिर तीन दिनों के लिए मुझे प्रशिक्षण के लिए कार्यालय भेज दिया गया। बिल्कीसगंज गांव की निवासी यमुना बाई का कहना है, 'उन्होंने हमें सिखाया कि कैसे हमारे नाम लिखने के लिए वर्णमाला का इस्तेमाल किया जाता है, 1 से 10 तक की गिनती कैसे होती है। उन्होंने हमें अपने परिवेश को साफ रखने, हमारे घर के पास खाली जगह में पेड़ लगाए रखने और शौचालय बनाने में मदद करने के लिए भी क्लासेज दीं।'

आत्मनिर्भर हो गई हैं सरिता बाई 
आत्मनिर्भर हो गई हैं सरिता बाई 

इस कार्यक्रम के अंतर्गत कार्यकर्ताओं ने गांवों में जाकर लोगों आय के साथ, बचत की आदत को भी प्रोत्साहित किया गया और महिलाओं को बैंकिंग प्रणाली में पेश किया गया। बैंक के अधिकारियों ने पिगी बैंक में हर रोज 10 रुपये बचाने के लिए महिलाओं को प्रोत्साहित किया। यमुना आगे बताती हैं, 'अब मुझे कार्यालय से 200 रुपये मिलते हैं जो मैं बैंक में जमा करती हूं। इससे पहले मुझे नहीं पता था कि बैंक क्या था, लेकिन अब मुझे पता है। अब मेरे बैंक में और मेरे गुल्लक बैंक में पैसा है।' हर प्रशिक्षण कार्यक्रम लगभग 18 महीने तक रहता है। ये कार्यक्रम असम, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, मध्य प्रदेश, तेलंगाना और बिहार में चल रहा हैं। कार्यक्रम की शुरुआत में, यहां आने वाले लोगों के घर की औसत आय 1500 रुपये से 3500 रुपये प्रति माह होती है जोकि बाद में बढ़कर प्रति माह 5000 रुपये से 7000 रुपये तक हो जाती है।

पुष्पा बताती हैं कि इस योजना का उपयोग करने के बाद, लोगों ने गांव में मुझे सम्मान देना शुरू कर दिया है। अब, वे मुझे देखकर मुझसे बात करते हैं। पुष्पा के लिए, और उसके जैसे कईयों के लिए यह उनके जीवन सबसे बड़ी उपलब्धि है।

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