कभी न ओझल होगा बच्चों के मन पर उड़ता नंदन का पराग

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डॉ कन्हैयालाल नंदन जितने कुशल संपादक, उतने ही पठनीय कवि-लेखक, पत्रकार भी रहे। उनकी डेढ़ दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हुईं, वह अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित हुए लेकिन उन्हें उतनी गंभीरता से नहीं लिया गया, जिसके वे हकदार रहे। डॉ. नंदन की 25 सितम्बर को पुण्यतिथि है।

'पराग' पर अपने बचपन का एक छोटा से अनुभव साझा करते हुए प्रचण्ड प्रवीर बताते हैं कि 'हमारे घर में ढेरों किताबें थीं। उन किताबों में सिरमौर हुआ करती थी 'पराग'। पिताजी अपने बचपन में बालक और चुन्नू-मुन्नू पढ़ते आये थे। 

सत्तर-अस्सी के दशक के ऐसे करोड़ों हिन्दी भाषियों को वह बाल-पत्रिका 'पराग' आज भी नहीं भूली होगी, जिसके संपादक हुआ करते थे प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ कन्हैयालाल नंदन। 'पराग' के बाल-साहित्य में गोते लगाते हुए उस जमाने के तमाम बच्चे आज घर-गृहस्थी वाले हो चुके हैं। अब अपने बच्चों को उस तरह का, अपने जमाने जैसा बाल-साहित्य उपलब्ध कराना उनके लिए आसान नहीं रह गया है। डॉ. नंदन की आज (25 सितम्बर) पुण्यतिथि है। सत्तर-अस्सी की उसी पीढ़ी ने बड़े होकर डॉ नंदन के ही सम्पादन में प्रकाशित होने वाली 'सारिका' और 'दिनमान' जैसी पत्रिकाएं पढ़ते हुए आज देश-विदेशों तक अपनी साहित्यिक समझ को परिपक्व किया है। डा. नंदन उन सम्पादकों में रहे, जिन्हें उनकी योग्यता और मेहनत के काम से वह मान-सम्मान नहीं मिल सका, जिसके वे हकदार थे।

फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) के तिवारी परिवार में जन्मे डॉ नंदन ने कानपुर से बीए, इलाहाबाद से एमए और भावनगर यूनिवर्सिटी से पीएचडी की उपधियाँ ली थीं। स्कूल-कॉलेजों से निकलने के बाद उन्होंने पहले-पहल मुम्बई विश्वविद्यालय से सम्बद्ध कॉलेजों में चार सल तक अध्यापन किया। फिर धर्मयुग में सहायक सम्पादक बन गए। उसके बाद उन्होंने मुंबई छोड़ दिल्ली में कदम रखा और क्रमशः पराग, सारिका और दिनमान के संपादक रहे। वह तीन साल तक नवभारत टाइम्स में फीचर संपादक भी रहे। बाद में वे छह साल तक 'संडे मेल' के सम्पादक, फिर टीवी की दुनिया में इंडसंइड मीडिया के डायरेक्टर बने। पद्मश्री, नेहरू फैलोशिप आदि से सम्मानित डॉ नंदन की पत्रकारिता, साहित्य, कला, फिल्म आदि क्षेत्रों में गहरी समझ और पहचान रही।

'पराग' पर अपने बचपन का एक छोटा से अनुभव साझा करते हुए प्रचण्ड प्रवीर बताते हैं कि 'हमारे घर में ढेरों किताबें थीं। उन किताबों में सिरमौर हुआ करती थी 'पराग'। पिताजी अपने बचपन में बालक और चुन्नू-मुन्नू पढ़ते आये थे। उन्होंने अपने बच्चों के लिए अख़बार वाले से कह कर नंदन, पराग, चम्पक, बाल भारती और बालहंस मँगाना चालू किया था। आज भी उन सभी प्रतियों का संकलन हमारे घर में कीड़ों, दीमकों और सीलन से सुरक्षित अलमारियों में मौजूद है। हर आदमी अपने बचपन को ले कर संताप कर सकता है, मसलन बचपन में अच्छी बारिश होती थी। फूल सुन्दर हुआ करते थे। मौसम अच्छा हुआ करता था। चाँद धरती के करीब था और सूरज पहाड़ी के पीछे छिपा रहता था। याद किया जा सकता है कि अभिभावकों से हमने क्या सीखा, क्या भूल गए। कौन से कौन से लोग थे, क्या खेल हम खेला करते थे। हज़ारों बातों में मेरी उम्र के लोग पराग नहीं भूल सकते।'

आज प्रवीर जी की तरह न जाने कितने लोग होंगे, जो पराग को तो याद रखे हुए होंगे, पर उसके पीछे के संपादक को भूल गए होंगे! यह पराग ही था जिसमें लम्बी कहानी – हरा बंगला, गलबा सियार के पराक्रम, हम सबका का घर जैसे रोचक कहानियाँ धारावाहिक के तौर पर आती थीं। दो चित्रकथाएं- शेहाब की लम्बू-छोटू और कार्टूनिस्ट प्राण की बिल्लू नियमित रहती थी। कहीं उनमें होता था पराग ज्ञानकोष, जिसे लोग सामान्य ज्ञान के लिए सहेज कर रख लेते थे। प्रवीर जी की भी अभिलाषा रही थी कि अगर कभी सिविल सर्विसेज का सोचा तो पराग को पढ़ के पास कर जाएंगे। पराग के कभी अंतरिक्ष कथा विशेषांक, कभी विज्ञान कथा विशेषांक, कभी विदेशी कथा विशेषांक, होली-दीवाली विशेषांक से तमाम लोगों का बचपन रंगा रहा है।

डॉ नंदन जितने कुशल संपादक, उतने ही पठनीय कवि-लेखक, पत्रकार भी रहे। उनकी डेढ़ दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हुईं, जिनमें ‘लुकुआ का शाहनामा’, 'घाट-घाट का पानी’, 'अंतरंग’, नाट्य-परिवेश’, 'आग के रंग’, 'अमृता शेरगिल’, 'समय की दहलीज’, 'ज़रिया-नजरिया’, ‘गीत संचयन’ आदि बहुचर्चित एवं प्रशंसित रही हैं। वह अनेकानेक पुरस्कारों के साथ साहित्य में अवदान के लिए ‘परिवार-पुरस्कार’ से पुरस्कृत, ’पद्मश्री’ से अलंकृत और नेहरू फेलोशिप से सम्मानित किए गए। कालांतर में साहित्य अकादमी ने उनके द्वारा सम्पादित हिन्दी के श्रेष्ठ गीतों का एक संकलन प्रकाशित किया था। उनकी ग़ज़लों की भाषा एक अलग ही स्वाद लिए हुआ करती थी, जैसे 'हर सुबह' शीर्षक की यह ग़ज़ल -

हर सुबह को कोई दोपहर चाहिए।
मैं परिंदा हूँ उड़ने को पर चाहिए।
मैंने माँगी दुआएँ, दुआएँ मिली
उन दुआओं का मुझ पे असर चाहिए।
जिसमें रहकर सुकूँ से गुज़ारा करूँ
मुझको एहसास का ऐसा घर चाहिए।
ज़िंदगी चाहिए मुझको मानी भरी
चाहे कितनी भी हो मुख़्तसर चाहिए।
लाख उसको अमल में न लाऊँ कभी
शानो-शौकत का सामाँ मगर चाहिए।
जब मुसीबत पड़े और भारी पड़े
तो कहीं एक तो चश्मेतर चाहिए।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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