अपने ही चक्रव्यूह में 'आप' का 'अभिमन्यु'

"आप" के पांच साल पूरे...

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दिल्ली में पांच साला जश्न, आम आदमी पार्टी की। पांचवां स्थापना दिवस समारोह। सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल। उनकी सियासत के जोड़ीदार कवि कुमार विश्वास की बात बाद में। आइए, पहले सुनते हैं पार्टी के एक अन्य संस्थापक रहे योगेंद्र यादव की खरी-खरी। वह कह रहे हैं, इस पार्टी का जन्म एक अनोखा और शानदार विचार था लेकिन उसने तो 2015 में ही अपनी नैतिकता खो दी थी।

साभार: ट्विटर
साभार: ट्विटर
प्रारंभ में पार्टी ने लोगों के दिलों में आदर्शवाद और यथार्थवाद की नई आशा जगाई थी। अब वह भी बाकी पार्टियों की तरह हो गई है।

अब आइए, पार्टी के 5वें स्थापना दिवस पर देश के जाने माने मंचीय कवि और 'आप' कुनबे के शीर्ष व्यक्ति कुमार विश्वास की सुनते हैं। उन्होंने केजरीवाल पर तीखा हमला बोलते हुए कहा है कि मैं अभिमन्यु हूं, मेरी हत्या में भी मेरी विजय है। 

दिल्ली में पांच साला जश्न, आम आदमी पार्टी की। पांचवां स्थापना दिवस समारोह। सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल। उनकी सियासत के जोड़ीदार कवि कुमार विश्वास की बात बाद में। आइए, पहले सुनते हैं पार्टी के एक अन्य संस्थापक रहे योगेंद्र यादव की खरी-खरी। वह कह रहे हैं, इस पार्टी का जन्म एक अनोखा और शानदार विचार था लेकिन उसने तो 2015 में ही अपनी नैतिकता खो दी थी। प्रारंभ में पार्टी ने लोगों के दिलों में आदर्शवाद और यथार्थवाद की नई आशा जगाई थी। अब वह भी बाकी पार्टियों की तरह हो गई है। पार्टी पहले भ्रष्टाचार पर दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से सवाल पूछती थी। अब लोग केजरीवाल सरकार से पूछ रहे हैं। योगेंद्र यादव इन दिनो किसानों की लड़ाई लड़ रहे हैं। उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया था। 

अब आइए, पार्टी के 5वें स्थापना दिवस पर देश के जाने माने मंचीय कवि और 'आप' कुनबे के शीर्ष व्यक्ति कुमार विश्वास की सुनते हैं। उन्होंने केजरीवाल पर तीखा हमला बोलते हुए कहा है कि मैं अभिमन्यु हूं, मेरी हत्या में भी मेरी विजय है। बीते 8 महीनों से मैं बोला नहीं हूं क्योंकि पीएसी की बैठक नहीं हुई। एक नैशनल काउंसिल हुई, लेकिन वक्ताओं में मेरा नाम नहीं था। बीते 7 महीने से हजारों कार्यकर्ताओं से मिलकर मैंने जाना कि 7 महीने से बोलने का अवसर न मिलने पर मुझमें इतनी बेचैनी है तो जो 5 साल से नहीं बोल पा रहे, उनमें कितनी बेचैनी होगी। यह मेरे लिए भावुक वक्त है। षड्यंत्रकारी कहते हैं कि मैं दूसरी पार्टी में जा सकता हूं। मगर मैं नहीं जा सकता हूं। इस पार्टी में रहने वाला दूसरे दल में जिंदा नहीं रह सकता है।

दिल्ली में पार्टी के राष्ट्रीय सम्मेलन में कुमार विश्वास का बागी तेवर दिखने का अंदेशा पहले से था। रामलीला मैदान में चले जिस अन्ना आंदोलन से आम आदमी पार्टी का (आप) का उदय हुआ था। उसी रामलीला मैदान में 'आप' का तिलिस्म टूटता दिखा। आयोजकों द्वारा पूरी ताकत लगाने के बावजूद आंदोलन के समय जैसी न ही भीड़ थी और न ही उत्साह। मंच पर भी तनाव पसरा दिखा। कुमार विश्वास मंच पर मौजूद जरूर थे मगर 'आप' के अन्य लोगों की उनसे बात नहीं हुई। मंच पर पसरे तनाव से ऐसा लग रहा था कि कुमार विश्वास की मौजूदगी कहीं न कहीं कई नेताओं को अखर रही थी। कुमार विश्वास ने कहा कि आज 6 माह बाद पार्टी में मुझे बोलने का मौका मिला है। उस बूढ़े फकीर अन्ना ने हमें आंदोलन के लिए प्रेरित किया। हम उनके शुक्रगुजार हैं। कुमार विश्वास के साथ एक बड़ी अजीब विडंबना है कि वह कब क्या बोल दें, कब कवि हो जाएं, कब राजनेता, कोई ठिकाना नहीं रहता है। निकट अतीत में वह कहते रहे हैं कि पार्टी जानती है, वह राजनीति नहीं कर सकते हैं। मेरी पार्टी भी जानती है कि मैं राजनीति नहीं कर सकता, इसकी जगह मैं कविता करता हूं। कविता और राजनीति के बीच संतुलन बनाना कठिन है। अगर मैं सुबह एक शेर ट्वीट करूं तो शाम में खबर बनेगी कि विश्वास और अरविंद केजरीवाल के बीच मतभेद बढ़े।

कुमार विश्वास कभी अपनी ही पार्टी के नेता केजरीवाल पर निशाने साधने लगते हैं तो कभी राजनेता के अंदाज में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर - बस भाषण में ज़ोर दिखाना स्वाभिमान नहीं होता, केक सने हाथों से शत्रु का संधान नहीं होता। इस तरह कई बार सियासत की तरह साहित्य में भी विवादित बने रहते हैं। एक बार वह हरिवंश राय बच्चन की एक कविता को लेकर अमिताभ बच्चन के निशाने पर आ गए। हुआ क्या कि कुमार विश्वास ने हरिवंश राय बच्चन की एक कविता गाकर यूट्यूब पर अपलोड कर दी। अमिताभ बच्चन ने उस पर आपत्ति जताते हुए लिखा कि आपको लीगल नोटिस भेजूंगा। इस धमकी पर कुमार विश्वास ने लिखा कि पता नहीं आपको क्यों बुरा लग रहा है, फिर भी अगर आप चाहते हैं तो मैं ये वीडियो डिलीट कर देता हूं। दोनो के बीच बात इससे भी आगे तक गई मगर फिर थम गई। कवि हो और वह राजनेता भी हो जाए, फिर तो उसे हर वक्त कुछ न कुछ बोलना, लिखना है ही। और जिसकी दिनचर्या इस तरह की हो, उसे अपने चक्रव्यूह में फंसना ही फंसना होगा, सो हो रहा है। दरअसल, कुमार विश्वास अब अपने घर के ही चक्रव्यूह में फंस गए है। वह कह तो रहे हैं कि मैं अभिमन्यु हूं, साथ ही ताल भी ठोक रहे हैं कि उन्हें कोई निपटा नहीं सकता। 

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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