नीतिगत पक्षाघात का शिकार हो रहा उत्तर प्रदेश का स्वास्थ्य

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 मानवतावादी होने का दावा करने वाली इसी सरकार ने चिकित्सा शिक्षा का बजट घटा कर आधा कर दिया। गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज समेत सभी सरकारी मेडिकल कॉलेजों को इसी बजट में पैसे मिलते रहे हैं।

सांकेतिक तस्वीर (फोटो साभार- सोशल मीडिया)
सांकेतिक तस्वीर (फोटो साभार- सोशल मीडिया)
पिछली सरकारों ने प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया। नयी सरकार की प्राथमिकता सूची से भी स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार का एजेण्डा गायब है। 

 विडम्बना यह है कि इसी साल मई महीने में उत्तर प्रदेश सरकार ने पोलियो और फाइलेरिया की तरह जापानी इन्सेफेलाइटिस जैसी बीमारी को भी जड़ से उखाड़ फेंकने का अभियान शुरू किया था। लेकिन यह अभियान केवल प्रधानमंत्री मोदी की चाटुकारिता के दायरे में ही रह गया।

गोरखपुर, फर्रुखाबाद और अब लखीमपुर खीरी में हुई तमाम बच्चों की दु.खद मौत ने न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे देश में भाजपा सरकार की हृदयहीनता उजागर की है। प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह कहते हैं कि बच्चों की मौत तो होती ही रहती है, यह सरकार के हत्यारे होने की सनद है। प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उस गोरखपुर जिले से आते हैं और वहीं से लगातार सांसद होते रहे हैं। गोरखपुर में बच्चों की लगातार होने वाली मौतों पर वे लगातार यही कहते रहे हैं कि भाजपा जब सत्ता में आएगी तो सरकार का पहला काम होगा बच्चों की मौत रोकना, लेकिन नतीजा सामने है।

ऑक्सीजन के लिए महज 67 लाख रुपये का भुगतान नहीं देने के कारण ऑक्सीजन की सप्लाई रोक दी गई और 60 से अधिक बच्चों को दम घोंट कर मार डाला गया। मानवतावादी होने का दावा करने वाली इसी सरकार ने चिकित्सा शिक्षा का बजट घटा कर आधा कर दिया। गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज समेत सभी सरकारी मेडिकल कॉलेजों को इसी बजट में पैसे मिलते रहे हैं।

प्रदेश के 14 मेडिकल कॉलेजों और उनके साथ जुड़े अस्पतालों का बजट पिछले वर्ष के 2344 करोड़ से घटा कर इस वर्ष 1148 करोड़ कर दिया गया। बीआरडी मेडिकल कॉलेज के लिए बजट आवंटन पिछले वर्ष 15.9 करोड़ रुपये था, जिसे घटा कर इस वर्ष 7.8 करोड़ कर दिया गया। चिकित्सा से जुड़ी मशीनों और उपकरणों के लिए बीआरडी मेडिकल कॉलेज को मिलने वाली राशि तीन करोड़ रुपये से घटा कर मात्र 75 लाख रुपये कर दी गई। प्रदेश के अन्य सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में भी यही किया गया। कानपुर और इलाहाबाद के मेडिकल कॉलेजों का बजट आवंटन 15.9 करोड़ से घटा कर इस वर्ष क्रमश: 3.3 करोड़ और 4.2 करोड़ कर दिया गया।

गोरखपुर मेडिकल कॉलेज के इंसेफलाइटिस वार्ड में कार्यरत 378 चिकित्साकर्मियों (चिकित्सक, शिक्षक, नर्स और कर्मचारी) को मार्च, 2017 से तनख्वाह नहीं मिली। करीब दर्जन भर पीएमआर कर्मचारियों को 27 महीने से वेतन नहीं मिला। यह क्या है? यह क्या स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति योगी सरकार का मानवीय 'अप्रोच' है? विडम्बना यह है कि इसी साल मई महीने में उत्तर प्रदेश सरकार ने पोलियो और फाइलेरिया की तरह जापानी इन्सेफेलाइटिस जैसी बीमारी को भी जड़ से उखाड़ फेंकने का अभियान शुरू किया था। लेकिन यह अभियान केवल प्रधानमंत्री मोदी की चाटुकारिता के दायरे में ही रह गया। इसके शिकार केवल गोरखपुर, फर्रुखाबाद और लखीमपुर खीरी जिले ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश के अस्पताल हुए हैं।

पिछली सरकारों ने प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया। नयी सरकार की प्राथमिकता सूची से भी स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार का एजेण्डा गायब है। 15 साल बाद सत्ता में लौटी भाजपा सरकार के पहले बजट में इन्हें सुधारने के लिए कोई योजना पेश नहीं की गई। कोई बड़ा ऐलान नहीं किया गया। पिछले साल के मुकाबले इसका बजट भी सिर्फ 09 फीसदी ही बढ़ाया गया। विश्व स्वास्थ्य संगठन के वर्ष 2016 के अध्ययन के अनुसार, उत्तर प्रदेश में सभी स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं में आधे से ज्यादा डाक्टर हैं। यह अनुपात देश भर में सबसे अधिक है। अन्य स्वास्थ्य कर्मियों की पर्याप्त संख्या नहीं होने का एक नतीजा है। उत्तर प्रदेश में, महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की संख्या भी सबसे कम है। यह संख्या करीब 19.9 फीसदी है, जबकि भारतीय औसत 38 फीसदी है।

नर्सों की संख्या के हिसाब से रैकिंग देखें तो देश में नीचे से 30 जिलों में से ज्यादातर जिले इसी राज्य के हैं। राज्य में देश की 16.16 फीसदी आबादी रहती है, लेकिन समग्र स्वास्थ्य कार्यकर्ता 10.81 फीसदी हैं। जनसंख्या के मुताबिक प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों के निर्माण से लेकर विभिन्न स्तर के अस्पतालों की स्थापना के कानूनी प्रावधानों का पालन करने की बात तो छोड़िए, जो मेडिकल कॉलेज अस्पताल पहले से हैं उन्हें भी फेल करने की तरफ भाजपा की सरकार अग्रसर है। पूंजी घरानों को मजबूत करने और स्वास्थ्य-माफियाओं को सुखी-सम्पन्न करने के लिए सरकार काम कर रही है।

केन्द्र सरकार भी इस साल जो नयी राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति लेकर आई, उसने पूंजी घरानों को स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में आखेट करने का मौका दिया है। इस नीति के तहत स्वास्थ्य सेवाएं भी निजी घरानों-संस्थानों से खरीदी जाएंगी। इंग्लैण्ड, न्यूजीलैण्ड, स्वीडन जैसे कई पूंजी-परस्त देशों में यह व्यवस्था वर्षों पहले (1985 से) लागू है, लेकिन उन देशों में भी 'परचेजर प्रोवाइडर स्प्लिट मॉडल' की व्यवस्था फेल साबित हो चुकी है। ऐसी ही व्यवस्था को अपने यहां माथे पर उठा कर उसे नयी राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के नाम से बेचा जा रहा है।

यूपी सरकार ने भी 'बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउण्डेशन' के साथ मिल कर प्राथमिक चिकित्सा सेवाओं को 'आउटसोर्स' करने का करार किया था। इस करार की शर्त ही थी कि स्थानीय सेवादाताओं को इसमें शामिल नहीं किया जाएगा। नयी स्वास्थ्य नीति लागू होने के बाद स्वास्थ्य सेवाओं के घरेलू बाजार का बड़े पैमाने पर विस्तार होगा और इस क्षेत्र में खर्च होने वाला सरकारी धन स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में काम करने वाली निजी कम्पनियों के आर्थिक स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद साबित होगा। इसीलिए चिकित्सा क्षेत्र में सेवाएं प्रदान करने और अस्पतालों की शृंखला चलाने वाली ज्यादातर बड़ी कम्पनियां राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति-2017 से बेहद प्रसन्न हैं।

देश की नयी स्वास्थ्य नीति का लाभ आम मरीजों को क्या मिल पाएगा, इस बारे में आप समझ सकते हैं और यह भी बखूबी समझ सकते हैं कि निजी कम्पनियां इससे कितना बेशुमार धन कमाएंगी? उत्तर प्रदेश के अस्पतालों पर सरकार की ओर से जारी ताजा आंकड़े बेहद निराशाजनक हैं। ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी-216 के अनुसार, उत्तर प्रदेश के सीएचसी में 84 फीसदी विशेषज्ञों की कमी है। यदि पीएचसी और सीएचसी, दोनों को एक साथ लिया जाए तो उनकी जरूरतों की तुलना में मात्र पचास फीसदी स्टाफ हैं। देश के दूसरे राज्यों की तुलना में उत्तर प्रदेश के सार्वजनिक बुनियादी ढांचे का स्तर भी बहुत खराब है। योगी सरकार को चाहिए कि वो पिछली सरकारों की गलतियां दोहराने के बजाय प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार और उनके विकास की समग्र नीति बना कर उसे अमली जमा पहनाए।

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