ना इमारत है और ना कोई छत, सड़क किनारे स्कूल चलाती हैं एक प्रोफेसर

0

डॉक्टर ललिता शर्मा इंदौर के सेंट पॉल इंस्टीट्यूट ऑफ प्रोफेशनल स्टडीज में प्रोफेसर के पद पर हैं। वो छात्रों को राजनीति शास्त्र और प्रबंधन जैसे विषय पढाती हैं।  साल 2010 में इंदौर के विजयनगर इलाके में जब उनका घर बन रहा था तो उनके घर के सामने एक पार्क था। जहाँ पर स्कूल के बच्चे स्कूल जाने के जगह वहाँ बैठकर सिगरेट पीते थे और आपस में एक दूसरे के साथ भद्दी भाषा में बात करते थे। डॉक्टर ललिता ने जब उन बच्चों से बात की तो उनको पता चला कि ये बच्चे 8वीं पास हैं, क्योंकि सरकारी स्कलों में 8वीं तक किसी बच्चे को फेल नहीं किया जाता, लेकिन 9वीं में आने पर उन बच्चों पर पढाई का बोझ बढ़ जाता है और उनका बेसिक ज्ञान कमजोर होने के कारण ये बच्चे फेल हो जाते हैं। इस कारण वो स्कूल जाने की जगह इस तरह पार्क या दूसरी जगहों में अपना समय बर्बाद करते हैं। वहीं इन बच्चों के माता पिता को भी पता नहीं चलता कि उनका बच्चा स्कूल गया है या कहीं ओर गलत काम कर रहा है। क्योंकि इन बच्चों के माता पिता छोटा मोटा काम धंधा करते हैं और उनके पास इतना वक्त नहीं कि वो अपने इन बच्चों पर नजर रख सकें। 

डॉक्टर ललिता ने देखा कि स्लम में रहने वाली छोटी लड़कियाँ स्कूल नहीं जाती थीं और वो अपनी मां के साथ घरों में काम करती थीं। तब डॉक्टर ललिता ने सोचा कि क्यों ना ऐसे लड़के लड़कियों को पढ़ाने का काम किया जाये जो किन्ही वजहों से आगे नहीं पढ़ पाते। इसके लिए उन्होंने सड़क किनारे ही इन बच्चों को पढ़ाने का शुरू किया। इसके अलावा जिन बच्चों के माता पिता स्कूल की फीस जमा करने में असमर्थ थे, उनके स्कूल के प्रिसिंपल से मिलकर डॉक्टर ललिता ने बच्चों की आधी फीस माफ कराई। 

ललिता बताती हैं, “शुरूआत में मैने 8 बच्चों को अपने घर की सामने की सडक  के किनारे पढ़ाना शुरू किया। धीरे-धीरे ये संख्या बढ़ती गयी जो की आज 198 तक पहुंच गयी है।” 

इनके साथ 25 वालंटियर भी अपने अपने इलाकों के बच्चों को अपने घर या आसपास की जगहों में पढाने का काम करते हैं। उनकी हर क्लास में कम से 15  या उससे अधिक बच्चे होते हैं। उनकी कोशिशों का ही नतीजा है कि जिन बच्चों का स्कूल छूट गया था, आज वो सभी स्कूल जाने लग गये हैं। इतना ही नहीं डॉक्टर ललिता के पढ़ाये हुई कुछ बच्चे इंजीनियरिंग की भी पढ़ाई कर रहे हैं। उन्होंने शुरूआत में जब बच्चों को पढ़ाना शुरू किया तो स्थानीय लोगों ने उनका विरोध किया, क्योंकि तब कुछ लोगों का मानना था कि वो ये काम सरकारी सहायता से कर रही हैं, लेकिन जब लोगों का सच्चाई से सामना हुआ तो उन्होने विरोध करना बंद कर दिया।

आज डॉक्टर ललिता शर्मा अपने घर की आगे की रोड और पीछे की रोड में बच्चों को पढ़ाने का काम करती हैं। वो हर रोज शाम 4 बजे से 6 बजे तक बच्चों को पढ़ाने का काम करतीं हैं। ये बच्चे 8वीं से 12वीं कक्षा तक के छात्र हैं। सोमवार से शुक्रवार तक ये बच्चों को उनके पाठ्यक्रम से जुड़ी किताबें पढाती हैं जबकि शनिवार और रविवार को वो उन बच्चों को नैतिक शिक्षा के संस्कार देती हैं। डॉक्टर ललिता खुद बहाई विचारधारा से जुड़ी हुई हैं। इसलिए वो इन बच्चों को बहाई विचारधारा की नैतिक शिक्षा की किताबें भी देती हैं। वो बताती हैं कि नैतिक शिक्षा का इन बच्चों पर बहुत ही सकारात्मक प्रभाव पढ़ा है। उनके माता पिता डॉक्टर ललिता को बताते हैं कि उनके बच्चे अब घर में झगड़ा नहीं करते हैं और ना ही दूसरों को ऐसा करने देते हैं। इनके पास पढ़ने वाली कुछ लड़कियां नैतिक शिक्षा की इन किताबों को अपने साथ ले जाकर उन्हें अपने घर के आस पास बांटने का भी काम करती हैं।


डॉक्टर ललिता उन बच्चों को गर्मियों की छुट्टियों के दौरान वोकेशनल ट्रेनिंग भी देतीं हैं। पिछले साल उन्होने लड़कियों को टेलिरिंग और ज्वेलरी मेकिंग सिखायी थी। इस साल उन्होने बच्चों को कम्प्यूटर सिखाने के लिए गेल कंपनी से बात की और कंपनी उनके बच्चों को कम्प्यूटर सिखाने के लिए तैयार हो गये हैं। डिजिटल इंडिया कैंपेन के माध्यम से इन बच्चों को कम्प्यूटर सिखाया जा रहा है। डॉक्टर ललिता बताती हैं कि फिलहाल 60 बच्चे ही गेल के सेंटर में कम्प्यूटर सिखने लिये जाते हैं। हालांकि उनकी कोशिश ज्यादा से ज्यादा बच्चों को कम्प्यूटर सिखाने की है। 

डॉक्टर ललिता बताती हैं कि अपने इस काम में उन्हें अपने परिवार का बहुत सहयोग मिलता है। खासतौर पर उनकी सास का। उनकी सास इन बच्चों को आर्ट और क्राफ्ट की ट्रेनिंग देती हैं, जबकि डॉक्टर ललिता इन बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाती हैं। बाकी विषय इनके साथ जुड़े वॉलेंटियर पढ़ाते हैं। इनमें से एक वालंटियर यादव  इनके साथ शुरूआती दिनों से जुड़े हैं। वो पेशे से इंजीनियर हैं। वो इन बच्चों को गणित और साइंस पढ़ाते हैं। कुछ बच्चे जो पहले इनके यहां पर पढ़ते थे, आज वो भी दूसरे बच्चों को पढ़ाने का काम करते हैं। सड़क किनारे चलने वाला इनका स्कूल कहीं भी पंजीकृत नहीं है, इसलिए स्कूल चलाने में जो भी खर्च आता है वो उसे खुद ही वहन करती हैं। इनके काम को देखते हुए दूसरे लोग इनके पास बच्चों को देने के लिए कपडे और खाना लेकर आते हैं। जिसे वो बहुत ही विनम्रता से मना कर देती हैं। वो उनसे कहती हैं कि अगर वो मदद ही करना चाहते हैं तो वो इन बच्चों को पढाने में मदद करें। डॉक्टर ललिता कहती हैं कि “मैं इन बच्चों को आत्मनिर्भर बनाना चाहतीं हूं। अगर मैं इन बच्चों को कुछ देती हूं तो इससे इनकी आदत खराब हो सकती हैं। हो सकता है कि ये कल खुद अपने पैरों में खड़े होने की कोशिश ही ना करें।” 

अब डॉक्टर ललिता की कोशिश है कि वो इंदौर के दूसरे इलाकों में भी इस तरह की कक्षाएं चलाएं ताकि जो बच्चे शिक्षा से दूर हो चुके हैं, उनको एक मौका दोबारा मिले। खास बात ये है कि इस साल 2 जनवरी में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने जिन सौ महिलाओं को सम्मानित किया उनमें डॉक्टर ललिता शर्मा भी एक थी। डॉक्टर ललिता शर्मा को ये सम्मान उनके शिक्षा के क्षेत्र में काम को देखते हुए दिया गया।