आईएएस मुग्धा सिन्हा से थरथर कांपें गुंडा, माफिया

महिला IAS अॉफिसर मुग्धा सिन्हा...

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राजस्थान कैडर की 1999 बैच की महिला आईएस मुग्धा सिन्हा के नाम से गुंडा-माफिया थरथर कांपते हैं। अपनी बेबाक कार्यशैली से बार-बार ट्रांसफर की कीमत चुकाने वाली मुग्धा कहती हैं- महिलाएं समाज की विपरित परिस्थितियों में भी अपना हौसला न खोएं। समाज भी इस संबंध में अपनी संकुचित सोच से ऊपर उठे।

आईएएस मुग्धा सिन्हा
आईएएस मुग्धा सिन्हा
माफिया और गुंडा तत्व उनके नाम से थरथर कांपते हैं। आईएएस मुग्धा सिन्हा को अपने डेढ़ दशक के करियर में एक दर्जन से अधिक बार स्थानांतरण की कीमत चुकानी पड़ी है। वह भ्रष्ट अधिकारियों और नेताओं की भी आंख में गड़ती रहती हैं लेकिन वह जहां भी होती हैं, उस इलाके का हर सही, आम आदमी उनकी दिल से कद्र करता है।

'मैं शपथ लेता हूं, कसम खाता हूँ, सच को हाज़िर-नाज़िर मानकर कहता हूँ कि अपनी योग्यता का सम्मान करते हुए बिना किसी शर्त के जीवन भर अपने दायित्वों का ईमानदारी से निर्वाह करूंगा। कभी इस शपथ के विरुद्ध आचरण नहीं करूंगा। पूरी कार्यनिष्ठा से सेवारत रहूंगा।' संसद, न्यायपालिका और प्रशासकीय प्रशिक्षु समारोहों में अक्सर ऐसे वाक्य सुनने को मिलते हैं। नेता संसद में, वादी-प्रतिवादी न्यायालयों में, आईएएस-आईपीएस अपने प्रशिक्षण के बाद एकेडमिक विदाई समारोहों में इस तरह के शपथ-वाक्य दुहराते रहते हैं।

आईएएस अधिकारी कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी की प्रतिज्ञा लेते समय संविधान की शपथ उठाते हैं। ड्यूटी ज्वॉइन करने के बाद उनके सामने जब सत्ता के अंग ही शपथ के विरुद्ध आचरण की चुनौतियां, रुकावटें डालने लगते हैं, ज्यादातर प्रशासक अपनी नौकरी बचाने अथवा प्रोन्नति के जायज-नारजायज लालच में अपने शपथ-पथ से विमुख हो जाते हैं। जो अधिकारी अपनी शपथ पर अडिग रहते हैं, वास्तविक जीवन में वह समाज के नायक की तरह सम्मान के हकदार हो जाते हैं। नेता, माफिया, गुंडे, समाज विरोधी तत्व प्रशासनिक अधिकारियों को अपने हाथ की कठपुलती बनाकर रखना चाहते हैं।

कई बार ऐसे अधिकारी खुद कठपुतली बनने के लिए उतावले पाए जाते हैं लेकिन प्रशासनिक सेवाओं में ऐसे अधिकारियों की भी लंबी फेहरिस्त है, जो किसी भी कीमत पर सत्ताबल के सामने घुटने न टेकने के लिए पूरी कार्यनिष्ठा से अपने दायित्वों का निर्वाह करते हुए जनता की जवाबदेही के साथ आए दिन टक्कर मोल लेते रहते हैं। ऐसे अधिकारी अपनी सर्विस के दौरान अपने काम को लेकर हमेशा सुर्खियों में रहते हैं। वह अपने काम में किसी भी तरह की गलत दखलंदाजी अथवा दबाव हावी नहीं होने देते हैं। अपनी इस योग्यता की कीमत उन्हें ट्रांसफर, निलंबन, मुअत्तली आदि, कई तरह से चुकानी पड़ती है। ऐसे ही अडिग प्रशासनिक अधिकारियों में अशोक खेमका, हर्ष मंदर सिंह, संजीव राजेंद्र भट्ट, दुर्गा शक्ति नागपाल, रजनी सेखरी सिबल, भूरे लाल, बी. चंद्रकला, यू सागायम, यशवंत, एम.एन. विजयकुमार, सामित शर्मा, नवनीत कुमार राणा, नरेन्द्र कुमार, शुभ्रा, जिया-उल-हक आदि का नाम बड़े आदर से लिया जाता है।

राजस्थान कैडर की 1999 बैच की एक ऐसी ही आईएस हैं मुग्धा सिन्हा, जो झुंझनू जिले की पहली महिला कलेक्टर के रूप में सुर्खियां बटोर चुकी हैं। गुंडा, माफिया तत्वों पर नकेल कसने के लिए उन्हें बार-बार तबादलों की कीमत चुकानी पड़ी है लेकिन आज भी एक साहसी साहसी और ईमानदार अफसर के रू में वह अपनी शपथ से विचलित नहीं हुई हैं। माफिया और गुंडा तत्व उनके नाम से थरथर कांपते हैं। आईएएस मुग्धा सिन्हा को अपने डेढ़ दशक के करियर में एक दर्जन से अधिक बार स्थानांतरण की कीमत चुकानी पड़ी है। वह भ्रष्ट अधिकारियों और नेताओं की भी आंख में गड़ती रहती हैं लेकिन वह जहां भी होती हैं, उस इलाके का हर सही, आम आदमी उनकी दिल से कद्र करता है।

राजस्थान में एक बार तो उनके ट्रांसफर के खिलाफ गांव वाले सड़कों पर उतर पड़े। प्रदर्शन करने लगे। उस वक्त किसी तरह भीड़ को काबू किया गया लेकिन मुग्धा का ट्रांसफर नहीं थमा। सर्वोच्च प्रशासनिक पदों पर बैठे कई ऐसे अधिकारियों और सत्ता की कुर्सी संभाल रहे नेताओं के बीच भ्रष्ट किस्म का गठजोड़ मुग्धा जैसे अफसरों के काम में बाधा बना रहता है। झुंझुनू में अपनी पहली पोस्टिंग के दौरान कलेक्टर मुग्धा सिन्हा की रोजमर्रा की दिनचर्या में शुमार था, आम लोगों की फरियाद पूरे ध्यान सुनना और उनके निराकरण में ईमादारी से पहल करना। इससे वह कुछ ही समय में लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हो गईं।

उन दिनो झुंझुनू में ग्राउंड वाटर से जुड़े गैरकानूनी मामले बड़े पैमाने पर धड़ल्ले से चल रहे थे। बेखौफ माफिया और दबंग अनुसूचित जाति के लोगों की जमीनों पर कब्जा करते जा रहे थे। कलेक्टर सिन्हा ने उन माफिया का डटकर सामना किया। इसी दौरान, जैसा कि हमारे समाज में स्वाभाविक रहता है, उनके कई एक दुश्मन भी पैदा हो गए। महिलाओं को लेकर हमारी सामाज की मानसिक बनावट भी ऐसी महिला अधिकारियों के काम में आड़े आती रहती है। जब अपनी योग्यता से सिस्टम की ताकत से लैस होकर वह शासन-प्रशासन की बागडोर थामती हैं, पुरुष समाज खामख्वाह उचक जाता है। लाख उचकने के बावजूद मुग्धा ने उन दिनो झुंझनू में माफिया तत्वों की एक नहीं चलने दी। उनके गैरकानूनी थम गए। इसके बाद उनके ट्रांसफर की साजिशें शुरू हो गईं और एक दिन उन्हें झुंझुनू से अन्यत्र श्रीनगर भेज दिया गया। इससे पहले वह बूंदी, हनुमानगढ़ आदि जिलों में अपनी सही ड्यूटी की कीमत अदा कर चुकी थीं।

आईएएस मुग्धा सिन्हा
आईएएस मुग्धा सिन्हा

मुग्धा सिन्हा उन कुशल और कर्मठ आईएएस महिला अफसरों में एक हैं, जो सम्मान के साथ खुलकर जीती हैं और चाहती हैं कि इस तरह का अवसर आम लोगों की जिंदगी में भी आए। ट्रांसफर के बाद भी मुग्धा ने अफने काम से कभी समझौता नहीं किया। वह कहती हैं - 'उन्हें मात्र केवल अपने काम से मतलब रहता है।' अपने सम्मान के साथ वह समाज के निचले से निचले स्तर के व्यक्ति के भी मान-सम्मान का ध्यान रखती हैं। किसी गुंडा, माफिया अथवा भ्रष्ट राजनेता से उन्हें डर नहीं लगता है। वह अपने जीवन कभी सच का साथ देते समय परेशान नहीं होती हैं और बुराई के सामने कत्तई झुकती नहीं हैं। वह कभी भी अपने काम से समझौता नहीं करती हैं।

देश के संविधान का, नियम-कानून का वह पूरी तरह पालन कराने के पक्ष में अटल रहती हैं। जब वह राजस्थान स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट एंड इंवेस्टमेंट कॉरपोरेशन में कमीश्नर रहीं तो इस दौरान समय से ड्यूटी की पाबंद मुग्धा ने लेट-लतीफी करने वाले लापरवाह अस्सी अफसरों की हाजिरी रजिस्टर में मार्क कर दी थी। इसी साल अप्रैल में प्रदेश सरकार ने खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग की सचिव मुग्धा सिन्हा को सीकर जिले का प्रभारी सचिव मोकर्रर कर दिया। मुग्धा सिन्हा बचपन से ही पढ़ाई-लिखाई में कुशाग्र रही हैं। दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) से उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की है। वह इंटरनेशनल रिलेशन में मास्टर और इंरनेशनल डिप्लोमेसी में एमफिल हैं।

वह अंतर्राष्ट्रीय विषयों को जानने, पढ़ने में गहरी दिलचस्पी रखती हैं। वह कहती हैं कि महिलाओं के सशक्तीकरण के मामले में समाज आगे बढ़ रहा है। इसमें निरंतर सुधार हो रहा है। हमें अपने आपको निरंतर प्रशिक्षित करते रहना है। महिलाएं समाज की विपरित परिस्थितियों में भी अपना हौसला न खोएं। अपने कार्यकाल के दौरान उन्हे लिंग-भेद जैसी स्थितियों का सामना करना पड़ता है। इसके प्रति हमे समाज की समझ को भी विकसित करना होगा। आम लोगों को ठीक तरीके से बताना होगा कि महिला और पुरुष में कोई भेद नहीं होता है। इस संबंध में अपनी संकुचित सोच से ऊपर उठना होगा।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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