आज ही के दिन 1945 में जापान ने अमेरिका के सामने क्यों किया था आत्मसमर्पण?

पूरी मानवता के लिए कलंक एक सांप का परमाणु-फन

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अमेरिका द्वारा नागासाकी हिरोशिमा पर परमाणु बम बरसाकर लाखों लोगों की हत्या कर देने पर आज ही के दिन 15 अगस्त 1945 को जापान ने अमेरिका के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था। उससे पहले अमेरिका ने हिरोशिमा पर 06 अगस्त को और नागासाकी पर 09 अगस्त को परमाणु बम गिराया था। अपने देश की आजादी के सालाना जश्न के मौके पर आइए, आज हम पूर्व पाकिस्तानी राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ की कुछ दिन पहले एक जापान के ही अखबार 'मैनिचि शिमबुन' से भारत पर परमाणु बम गिराने संबंधी बातों के उल्लेख के साथ पूरी मानवता के ऐसे दुश्मनों से घृणा का इजहार करते हैं।

फोटो साभार: wordpress.com
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एक जापानी अखबार में सनसनीखेज खुलासा करते हुए पूर्व पाकिस्तानी राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ ने बताया, कि 2001 में वह भारत पर परमाणु बम गिराने पर विचार कर रहे थे लेकिन जवाबी कार्रवाई के डर से उन्होंने ऐसा नहीं किया।

भारत पर परमाणु बम गिराना चाहिए या नहीं, इस बात को लेकर पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ कई रातों तक चैन से सो नहीं सके थे। 

कुछ दिन पहले मीडिया में एक बड़ी खबर आहिस्ते से तैरी थी, जिसे आज मुल्क की आजादी के सालाना जश्न के मौके पर सविस्तार साझा कर लेना समीचीन लगता है। वह खबर थी- दुबई में एक जापानी अखबार 'मैनिचि शिमबुन' से सनसनीखेज खुलासा करते हुए पूर्व पाकिस्तानी राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ ने बताया कि 2001 में वह भारत पर परमाणु बम गिराने पर विचार कर रहे थे लेकिन जवाबी कार्रवाई के डर से उन्होंने ऐसा नहीं किया। भारत पर परमाणु बम गिराना चाहिए कि नहीं, इसे लेकर वह कई रातों तक चैन से सो नहीं सके थे।

उस वक्त भारत की ओर से कहा गया था कि अगर उस पर परमाणु हमला हुआ तो उसका पूरी ताक़त से जवाब दिया जाएगा। गौरतलब है कि उस समय भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी थे। एक राष्ट्राध्यक्ष के ऐसे वहशियाना खयालात के बारे में भला क्या कहा जा सकता है। ऐसे शख्स पूरी मानवता के दुश्मन होते हैं। जबकि उसी परवेज को प्रेम की इमारत ताजमहल के दीदार कराते हुए वाजपेयीजी ने आगरे में शानदार दावत नवाजते हुए तहे दिल से दोस्ताना हाथ थमाया था। कवि अज्ञेय की एक कविता की लाइन है- 'साँप ! तुम सभ्य तो हुए नहीं, नगर में बसना भी तुम्हें नहीं आया, एक बात पूछूँ, उत्तर दोगे? तब कैसे सीखा डँसना, विष कहाँ पाया?'

अब आइए, उस परमाणु नर-संहार पर दृष्टि डालते हैं, जिसे सुनकर आज भी दुनिया दहल जाती है। वर्ष 1945 में इसी अगस्त माह की छह तारीख को एनोला गे नामक एक अमेरिकी बी-29 बमवर्षक ने ‘लिटिल ब्वॉय’ नामक परमाणु बम हिरोशिमा पर बरसाया था। अमेरिकी बॉम्बर प्लेन बी-29 ने जमीन से तकरीबन 31000 फीट की ऊंचाई से परमाणु बम गिराया था। जिस जगह पर बम गिराया गया था, उसके आसपास की हर चीज जलकर खाक हो गई थी। जमीन लगभग 4,000 डिग्री सेल्सियस गर्म हो उठी थी। उस परमाणु हमले में लगभग 1.4 लाख लोग मारे गए थे। जो लोग बम हमले से बच गए थे, रेडिएशन की चपेट में आने के कारण बाद में मर गए थे। इसी तरह जापान के पत्तन शहर नागासाकी पर भी 9 अगस्त को परमाणु बम से हमला बोला गया था। इसमें 70 हजार लोग मारे गए थे।

यूरेनियम वाला बम हिरोशिमा पर गिराया गया और प्लूटोनियम वाला नागासाकी पर। यह दूसरा बम बहुत ख़र्चीला था और तब तक बिना परीक्षण का था। यानी उसका गिराया जाना सीधे लड़ाई के मैदान में परीक्षण जैसा था। बम वर्षा के कुछ दिन बाद 15 अगस्त 1945 को जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया था और युद्ध समाप्त हो गया था। 

कहा जाता है कि परमाणु बम का निर्माण 1941 में तब शुरू हुआ जब नोबेल विजेता वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलीन रूजवेल्ट को इस प्रोजेक्ट को फंडिंग करने के लिए राजी किया। उस समय खुद आइंस्‍टीन ने भी नहीं सोचा होगा कि उसके इतने घातक परिणाम होंगे।

एक संजीदा, संवेदनशील मनुष्य ऐसा सोच भी कैसे सकता है कि परमाणु बम गिराकर लाखों लोगों का सामूहिक संहार कर दिया जाए, जबकि हम दुश्मन के घर में भी किसी वयोवृद्ध का भी इंतकाल हो जाने पर अपनी आंखें नम कर लेते हैं। एक ओर आदमी अपनी आजादी, अपने परिजनों, प्रियजनों की खुशहाली के लिए जीवन भर परिस्थितियों से पछाड़े खाता फिरता है, दूसरी तरफ मानव समाज के बीच से कोई पूरी मनुष्यता को डंसने के लिए फन फैलाए डोलता रहता है। वह फन आजकल आतंकवाद के रूप में पूरी दुनिया की मानवता को डरा-धमका रहा है। थर्रा देने वाली खूंरेजी का इतिहास लिख रहा है। आए दिन दुनिया के किसी न किसी कोने में लोगों की सामूहिक हत्याएं हो रही हैं। कोरिया की ओर से भी प्रायः परमाणु बम गिराने की धमकियां विश्व मीडिया की सुर्खियां बनती रहती हैं। दुनिया का कोई भी राष्ट्राध्यक्ष परमाणु बम चाहे जहां गिराने की बच्चों जैसी बात करे, उसके अंदर की शैतानियत हर किसी को विचलित कर देती हैं।

यह दुनिया कितनी खूबसूरत है। उसमें भी मनुष्य की संरचना जीवधारियों में सबसे सुंदरतम और उसे ही नष्ट कर देने की मंशा मन में पालने वाले को सांप नहीं तो और क्या कहा जा सकता है। ऐसे मानवद्रोही बम, दरअसल, मनुष्यता की कोख पर गिराने की बात करते हैं।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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