कर्नाटक चुनाव: सियासत में महिलाओं की भागीदारी क्यों है नगण्य?

सियासत के समर में वनवास काटती आधी आबादी... 

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महिला सशक्तिकरण पर जब भी विचार होता है, अक्सर राजनीति में महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व पर अफसोस जताया जाता है। इसे पूरी तरह गलत भी नहीं कहा जा सकता। समाज और राजनीति में महिलाओं को बराबर की हिस्सेदारी देने की बात सार्वजनिक मंचों पर आये दिन होती है लेकिन उस पर अमल करने में सभी पार्टियां उदासीनता बरतती आयी हैं।

सांकेतिक तस्वीर (साभार- गर्लटॉक)
सांकेतिक तस्वीर (साभार- गर्लटॉक)
कर्नाटक में इस बार के विधानसभा चुनाव में सभी पार्टियों के उम्मीदवारों में स्त्रियों का प्रतिशत सिर्फ आठ फीसदी था। भाजपा ने कुल 224 उम्मीदवार खड़े किए थे, जिनमें सिर्फ छह स्त्रियां थीं।

यह स्थापित सत्य है कि सियासत और सत्ता के इर्द-गिर्द घूमती है सामाजिक व्यवस्था। यह भी उतना ही बड़ा सत्य है कि शक्ति प्रत्येक कालखण्ड में व्यक्ति / समुदाय की स्थिति का मापदण्ड रही है। अब हमें यदि आजादी से लेकर आज तक महिला की स्थिति को जानना-समझना है तो सियासत में उसकी मौजूदगी के हवालों को भी जानना होगा। दरअसल जब सामाजिक व्यवस्था पुरुषवादी हो तो स्त्री की राजनीतिक क्षेत्र में स्वीकार्यता सहज नहीं हो सकती है लेकिन जम्हूरी हिन्दोस्तान का आईन (संविधान) लिंग-जनित समस्त भेदभावों को संस्थागत तथा सामाजिक स्तर पर अस्वाकीर्य करने का वादा करता है।

अब सवाल यह है कि क्या हमारा समाज सियासत में औरत की मौजूदगी को सहजता से ग्रहण करता है? आखिर क्यों सियासी दलों को एक औरत उम्मीदवार के बनिस्बत पुरुष प्रत्याशी ज्यादा मुफीद लगता है? और जब यह सवाल उत्तर प्रदेश जैसे विशाल, पारम्परिक, संकीर्ण तथा भीरु समाज के बारे में हो, जहां सियासत और स्त्री (अपने नैसर्गिक स्वरूप में) कुछ वैसे ही प्रतीत होते हैं जैसे बेर केर के संग, तो जवाब के लिए जम्हूरी इतिहास के उस वक्त से गुफ्तगू करनी होगी जब हिन्द की सरजमीं पर औरत और मर्द दोनों को मतदान हेतु बराबरी का हक अता किया गया था। उसी वक्त सियासत में इन्दिरा, सुचेता कृपलानी, मायावती, जयललिता और ममता जैसी अनेक महिला सियासतदानों के निर्मित होने का सांचा तैयार हो गया था। जातियों की रेलम-पेल के साथ बाहुबल के बेहूदा शोर के समक्ष ममत्व, कोमलता, सम्वेदनशीलता और सरलता के अबूझ स्वरों को समझने का कौशल जनता को तब ही आ गया था। लेकिन दर्द ये रहा कि कुछ चेहरे तो प्रतीकों के तौर पर स्थापित हुए लेकिन अधि आबादी को अवसर देना सियासी दलों के मिजाज़ में नहीं शामिल हो सका और आम जन मानस भी उन्हें डमी प्रत्याशी के तौर पर मानने लगा ।

अब देखिये न, अभी हाल ही में कर्नाटक में चुनाव संपन्न हुये। राजनीतिक दलों ने बढ़-चढ़ के चुनावों में हिस्सा लिया, लेकिन उम्मीदवारों में महिला भागेदारी कितनी थी, यह देखने वाली बात है। कर्नाटक में इस बार के विधानसभा चुनाव में सभी पार्टियों के उम्मीदवारों में स्त्रियों का प्रतिशत सिर्फ आठ फीसदी था। भाजपा ने कुल 224 उम्मीदवार खड़े किए थे, जिनमें सिर्फ छह स्त्रियां थीं। यानी तीन प्रतिशत से भी कम। पर कांग्रेस भी भाजपा से बहुत पीछे नहीं है। राज्य में सत्तारूढ़ कांग्रेस ने भी केवल 15 महिलाओं को ही विधानसभा चुनाव का टिकट थमाया था।

वहीं जनता दल (एस) ने सिर्फ चार महिला उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतार कर महिला उम्मीदवारों पर अपनी राय जाहिर कर दी है। देखने वाली बात यह है कि चुनाव में महिला उम्मीदवारों की इतनी कम भागेदारी उस कर्नाटक में है, जो जीडीपी की दृष्टि से यह भारत का छठा सबसे बड़ा राज्य है। वैसे तो बेरोजगारी की राष्ट्रीय दर 4.9 है, पर कर्नाटक में सिर्फ1.8 लोग बेरोजगार हैं। शिक्षा और साक्षरता में भी यह काफी आगे है। स्त्रियां घरों में दुबकी नहीं रहतीं, बल्कि नौकरी करती हैं तथा विभिन्न सामाजिक क्षेत्रों में सक्रिय भी हैं। यही नहीं देश की सबसे बड़ी रियासत उत्तर प्रदेश की विधान सभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व महज10 प्रतिशत के लगभग है। यूपी में 2017 में संपन्न हुये विधान सभा चुनाव में 485 महिलाएं चुनाव मैदान में उतरी थीं और उनमें से 41 ने जीत दर्ज की। 2012 में यह संख्या 35 थी।

भारतीय संविधान में 73वें और 74वें संशोधन के माध्यम से देशभर में पंचायत स्तर पर निर्वाचन प्रक्रिया में 50 प्रतिशत महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की गई, जिसका परिणाम यह निकला कि पहले पंचायत स्तर पर लगभग 04 प्रतिशत महिलाएं भाग लेती थीं जो अब 50 प्रतिशत के लगभग पहुंच चुकी हैं। इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता है कि पंचायत चुनावों में चुनी गई अधिकांश महिलाएं रबर स्टाम्प हैं किन्तु यह बात भी हौसला बढ़ाने वाली है कि पहला चरण, पहचान का संकट, उसे महिलाओं ने पार कर लिया है। कम से कम समाज उन्हें चिन्हित तो कर रहा है।

यहां यह देखना दिलचस्प है कि उ.प्र. ने राजनीति को बड़े महिला सियासी किरदार दिये हैं। प्रधानमन्त्री से लेकर मुख्यमन्त्री तक। राज्यपाल से लेकर लोकसभा अध्यक्ष तक। लेकिन यह नाम तो आकर्षक हैं किन्तु संख्या सीमित है। सामान्य रूप से यूपी की विधानसभा ने महिलाओं को उनकी वाजिब सियासी नुमाइन्दगी से महरूम रखा है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश की सबसे बड़ी विधानसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व महज आठ फीसदी से कुछ अधिक है। उत्तर प्रदेश में 1952 से लेकर अब तक कुल 17 बार विधानसभा के चुनाव हुए और निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के आधार पर विश्लेषण किया जाय तो अब तक इन विधानसभाओं में महिलाओं का औसत प्रतिनिधित्व मात्र 4.40 प्रतिशत ही रहा।

आंकड़ों का रौशनी में देखा जाय तो 1952 से लेकर 2017 हुए विधानसभा के कुल 17 चुनावों में खड़ी हुईं 2,470 महिला उम्मीदवारों में से 826 औरतों ने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ा है लेकिन उनमें से सिर्फ तीन ही चुनाव जीत सकीं। चुनाव आयोग के दस्तावेजों के मुताबिक वर्ष 1977 में हुए विधानसभा चुनाव में सण्डीला से कुदसिया बेगम के रूप में पहली बार निर्दलीय प्रत्याशी ने जीत दर्ज की थी। उसके बाद वर्ष 1989 के चुनाव में गौरी बाजार क्षेत्र से लालझण्डी नामक निर्दलीय महिला चुनाव जीती थीं। बाद में 1996 में बलिया सीट से निर्दलीय प्रत्याशी मंजू ने विजय हासिल की लेकिन उसके बाद से यह सिलसिला आगे नहीं बढ़ सका।

प्रदेश के चुनावी इतिहास पर नजर डालें तो समाजवाद का झण्डा बुलन्द करने वाली पार्टियों- सोशलिस्ट पार्टी, किसान मजदूर प्रजा पार्टी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, जनता दल, भारतीय क्रान्ति दल और समाजवादी पार्टी ने 15वीं विधानसभा तक कुल 122 महिलाओं को उम्मीदवार बनाया। राष्ट्रवाद का नारा बुलन्द करने वाले जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी ने प्रदेश के संसदीय इतिहास में कुल 131 महिलाओं को प्रत्याशी बनाया है। वहीं, वर्ष 1989 में पहली बार चुनाव लडऩे वाली बसपा ने 15वीं विधानसभा तक सिर्फ 52 महिलाओं को ही उम्मीदवार बनाया। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 1952 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में कुल 347 सीटों पर खड़े हुए 2604 प्रत्याशियों में से सिर्फ 25 महिला उम्मीदवार मैदान में थीं जिनमें से सिर्फ चार को ही जीत मिली। इस तरह उस विधानसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व मात्र 0. 86 प्रतिशत रहा।

17वीं विधानसभा (2017)में सबसे अधिक 41 महिला विधायक चुनी गईं। आजादी के बाद महिलाओं की अब तक की सबसे बड़ी तादाद इस बार यूपी असेम्बली में थी। इस तरह 'आधी आबादीÓ कही जाने वाली महिलाओं का विधानसभा में प्रतिनिधित्व सबसे अधिक दस प्रतिशत के आंकड़े तक को ही छू सका जो महिला आरक्षण विधेयक पर तीखी बहस के दौर में सियासत में महिलाओं की नुमाइन्दगी की जमीनी हकीकत बताने के लिए काफी है।

अब बात सियासत के राष्ट्रीय फलक की। आज भारत के 03 राज्यों जम्मू-कश्मीर, पश्चिम बंगाल तथा राजस्थान में महिला मुख्यमन्त्री भारत की इस प्रतिबद्धता को व्यक्त कर रही हैं कि भारत में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी में किसी प्रकार की भी कोई बाधा नहीं है। यही नहीं भारत में राष्ट्रीय तथा क्षेत्रीय स्तर के 04 मुख्य राजनीतिक दल ऐसे हैं जिनका पूरा नेतृत्व और नियन्त्रण महिलाओं के हाथ में है, जैसे -कांग्रेस की सोनिया गांधी, बहुजन समाजवादी पार्टी की मायावती, पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी तथा जम्मू-कश्मीर पी.डी.पी. की मुखिया महबूबा मुफ्ती।

दरअसल भारत की प्रथम महिला प्रधानमन्त्री इन्दिरा गांधी के काल से ही यह सिद्ध हो चुका था कि भारत में राजनीतिक स्वतन्त्रता, संविधान के अक्षरों के रूप में ही नहीं अपितु वास्तविक रूप में क्रियान्वित है। भारतीय राज्यों में 1947 से आज तक लगभग 23 महिलाएं राज्यपाल पद को भी सुशोभित कर चुकी हैं। उत्तर प्रदेश की तो प्रथम महिला राज्यपाल भारत कोकिला और सुविख्यात स्वतन्त्रता सेनानी सरोजनी नायडू बनी थीं। यह तो वह उपलब्धियां हैं जो सूबे और देश की सियासत में स्त्री की शक्ति और सामथ्र्य को स्थापित करती हैं किन्तु समाज का नजरिया अभी भी भेदभाव मूलक है।

राजनीतिक दलों के भेदभावपूर्ण रवैये के बावजूद मतदाता के रूप में महिलाओं की भागीदारी नब्बे के दशक के अन्त से उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है। महिलाओं की चुनाव प्रक्रिया में भागीदारी का विश्लेषण एक पिरामिड मॉडल के रूप में किया जा सकता है। इसमें सबसे ऊपर लोकसभा में उनकी 1952 में मौजूदगी, 22 सीट को रखा जा सकता है जो 2014 में 61 तक आ गई है। यह वृद्धि 36 प्रतिशत है। लेकिन लैंगिक भेदभाव अब भी भारी मात्रा में मौजूद है और लोकसभा में 10 में से नौ सांसद पुरुष हैं। 1952 में लोकसभा में महिलाओं की संख्या 4.4 फीसदी थी जो 2014 में करीब 11 प्रतिशत है लेकिन यह अब भी वैश्विक औसत 20 प्रतिशत से कम है।

चुनावों में महिलाओं को टिकट न देने की नीति न सिर्फ राष्ट्रीय पार्टियों की है बल्कि क्षेत्रीय पार्टियां भी इसी राह पर चल रही हैं और इसकी वजह बतायी जाती है उनमें जीतने की क्षमता कम होना, जो चुनाव में सबसे महत्वपूर्ण है। हालांकि भारत के आम चुनावों में महिला उम्मीदवारों की सफलता का विश्लेषण करने वाले एक विशेषज्ञ के अनुसार यह पिछले तीन चुनावों में बेहतर रही है। वर्ष 2014 के आम चुनावों में महिलाओं की सफलता 09 फीसदी रही है जो पुरुषों के छह प्रतिशत के मुकाबले तीन फीसदी ज्यादा है। यह आंकड़ा राजनीतिक दलों के जिताऊ उम्मीदवार के आधार पर ज्यादा टिकट देने के तर्क को खारिज कर देता है और साथ ही महिला उम्मीदवार न मिलने की बात को निराधार ठहराता है। लोकसभा और फैसले लेने वाली जगहों, जैसे कि मन्त्रिमण्डल में महिलाओं का कम प्रतिनिधित्व सीधे-सीधे राजनीतिक ढांचे से उनको सुनियोजित ढंग से बाहर रखने और मूलभूत लैंगिक भेदभाव को रेखांकित करता है। हालांकि महिलाएं राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर ठीक-ठाक संख्या में राजनीतिक दलों का प्रतिनिधित्व करती हैं लेकिन इन राजनीतिक दलों में भी उच्च पदों पर महिलाओं की उपस्थिति कम ही है।

महिला सशक्तिकरण पर जब भी विचार होता है, अक्सर राजनीति में महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व पर अफसोस जताया जाता है। इसे पूरी तरह गलत भी नहीं कहा जा सकता। समाज और राजनीति में महिलाओं को बराबर की हिस्सेदारी देने की बात सार्वजनिक मंचों पर आये दिन होती है लेकिन उस पर अमल करने में सभी पार्टियां उदासीनता बरतती आयी हैं। ऐसे में महिला आरक्षण विधेयक के मार्फत ही 'आधी आबादी' के साथ इन्साफ होने की उम्मीद की जा सकती है। यदि यह कानून लागू हो जाय, तो लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या स्वत: 179 हो जाएगी। इस विधेयक की राह में बरसों से रोड़े अटकाये जा रहे हैं। गौरतलब है कि बीते 70 बरस में हमारी संसद में महिला सांसदों की संख्या मात्र 39 बढ़ी है। यदि वृद्धि की रफ्तार यही रही, तो 179 के आंकड़े को छूने में करीब ढाई सौ साल लग जाएंगे और तब तक हम अन्य देशों से बहुत पीछे खिसक जाएंगे।

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लेखक / पत्रकार

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