चार हजार से अधिक शौचालय बना चुकी हैं कलावती देवी 

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भारत स्वच्छता मिशन का आगाज होने के बाद से तो खासकर देश के पिछड़े इलाकों की आधी आबादी में भी शौचालय को लेकर अभूतपूर्व जागरूकता आई है लेकिन उससे वर्षों पहले से सक्रिय कानपुर की कलावती देवी अब तक चार हजार से अधिक शौचालय बना चुकी हैं।

कलावती बताती हैं कि उसी दौरान एक स्थानीय एनजीओ इस दिशा में काम करने के लिए आगे आया। वह भी उससे जुड़ गईं। उन्होंने अपने हुनर से मोहल्ले का पहला सामुदायिक शौचालय बनाया। यद्यपि यह सब कर पाना उनके लिए कत्तई आसान नहीं था।

उत्तर प्रदेश के जिला सीतापुर की हैं कलावती देवी। उनका तेरह साल की उम्र में ही अठारह साल के युवक से बाल विवाह हो गया था। शादी के बाद वह पति के साथ सीतापुर से कानपुर पहुंच गईं। जिसके मायके वालो की मजबूरी बिटिया को किशोर वय में ही ब्याह देने की रही हो, उससे शिक्षा दिलाने की उम्मीद कौन करे, सो कलावती देवी ने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा लेकिन वह आज अपने काम से सुर्खियों में आ चुकी हैं। भले वह दैनिक मजदूर हों, ईंट-गारे का काम करती हों, एक राजमिस्त्री के रूप में अपनी पूरी जिन्दगी घर चलाने, बच्चों के पालन-पोषण में खपाते, कन्नी-बसुली चलाते हुए भी उन्होंने अपने स्तर के एक ऐसे बड़े काम को अंजाम दिया है, जिसे सुनकर लोग दांतों तले उंगलियां दबा लेते हैं। आज छप्पन साल से अधिक की उम्र तक वह चार हजार से ज्यादा शौचालय बना चुकी हैं। वह बताती हैं कि जब सीतापुर से पति के साथ कानपुर पहुंचीं तो वहां के स्लम क्षेत्र राजा का पुरवा में रहने लगीं। वहां की आबादी लगभग सात सौ है। एक जमाने में वह पूरा मोहल्ला ही जैसे गंदगी का ढेर हुआ करता था। पूरे मोहल्ले में एक भी सामुदायिक शौचालय नहीं। सब लोग खुले में शौच जाते थे।

कलावती बताती हैं कि उसी दौरान एक स्थानीय एनजीओ इस दिशा में काम करने के लिए आगे आया। वह भी उससे जुड़ गईं। उन्होंने अपने हुनर से मोहल्ले का पहला सामुदायिक शौचालय बनाया। यद्यपि यह सब कर पाना उनके लिए कत्तई आसान नहीं था। इंचों में मापी जा सकने वाली जमीन के टुकड़ों पर बसर करने वाले लोग शौचालय के लिये जमीन खाली करने के लिये राजी नहीं थे। इसके अलावा लोगों को शौचालय की जरूरत ही महसूस नहीं होती थी। तब वह इस संबंध में लोगों से बातें करने, उन्हे समझा-बुझाकर सहमत करने में जुट गईं। तब तक वह काम उनका जुनून बन चुका था। धीरे-धीरे कुछ लोग सहमत होने लगे। उसी दौरान वह कानपुर नगर निगम के तत्कालीन आयुक्त से मिलीं। उनके सामने उन्होंने प्रस्ताव रखा कि राजा का पुरवा की तरह ही कानपुर की अन्य स्लम बस्तियों में भी सामुदायिक शौचालय बनाने में निगम उनकी मदद करे। आयुक्त को योजना रास आ गई। उन्होंने प्रस्ताव रखा कि यदि किसी भी मोहल्ले के लोग शौचालय की कुल लागत का एक तिहाई खर्च उठाने को तैयार हों तो दो तिहाई पैसा सरकारी योजना के तहत लिया जा सकता है।

कलावती देवी बताती हैं कि उन्हे अच्छी तरह पता था, रिक्शा वालों और दिहाड़ी मजदूरों से पैसे इकट्ठा करना कितना मुश्किल है। फिर भी किसी तरह पैसों का इन्तजाम होने लगा। उन्होंने पहली बार बड़े पैमाने पर अपने हाथों से पचास सीटों का एक सामुदायिक शौचालय तैयार किया। उस दौरान उन्हे पहली बार यह पता चला कि जो काम वह कर रही हैं, इससे बेहतर काम और कोई हो नहीं सकता। शौचालय बनाकर वह न सिर्फ पर्यावरण की स्वच्छता में अपना योगदान दे रही हैं बल्कि महिलाओं की गरिमा की रक्षा भी कर रही हैं। उस वक्त तक वह एक अनहोनी का शिकार भी हो चुकी थीं। पति उनका साथ छोड़ दुनिया से विदा हो चुके थे। फिर भी उन्होंने व्यक्तिगत के शौचालय मिशन से खुद को अलग नहीं किया। अब तक वह चार हजार से ज्यादा शौचालय बना चुकी हैं।

आज केंद्र सरकार के स्वच्छता भारत मिशन के चल पड़ने के बाद तो पूरे देश की महिलाओं में आश्चर्यजनक जागरूकता आई है। अक्षय कुमार और भूमि पेडनेकर की 'टॉयलेट : एक प्रेम कथा' फिल्म तक बन चुकी है। पूरी बस्ती में पहले पक्के शौचालय का निर्माण कराने वाली श्योपुर (म.प्र.) की रामोतार बैरवा को सम्मानित किया गया है। छत्तीसगढ़ में 106 साल की स्वच्छता दूत कुंवर बाई का भले ही हाल ही में निधन हो चुका हो, लेकिन वह पूरे समाज को संदेश दे गई हैं कि उन्होंने बकरियां बेचकर उसकी आमदनी से अपने घर में शौचालय का निर्माण कराया था। उनके इस कारनामे से पीएम नरेंद्र मोदी इतने अधिक प्रभावित हुए थे कि उनका पैर छू लिया था। अमेरिका के बोस्टन में पली-बढ़ीं मार्टा वैन्डुज़र-स्नो राजीव गांधी महिला विकास परियोजना की वॉलंटियर बनकर इस समस्या से निजात दिलाने में हमारे देश की मदद कर रही हैं। उनका कहना है कि शौचालय तो हर भारतवासी का मूलभूत अधिकार होना चाहिए।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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