पूर्वोत्तर में 23 गांवों और 18 स्कूलों से होकर निकली 'शोधयात्रा',बच्चों के आइडिया से हैरत में पड़ गए जानकार

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रोजमर्रा के कामों में पेश आने वाली छोटी-बड़ी दिक्कतों के समाधान को बड़े-बड़े संस्थानों की प्रयोगशालाओं तक सीमित मानने की गलती न करें, क्योंकि दिनभर खेतों में लगा रहने वाले किसान, आम मजदूर और यहां तक कि छोटे बच्चे भी पारंपरिक जानकारी और सूझबूझ के दम पर अक्सर ऐसी नयी खोज कर जाते हैं, जिनका कोई व्यवसायिक हल बाजार में मौजूद ही नहीं होता।

भारत के सुदूर गांवों में फलने-फूलने वाली ऐसी ही पारंपरिक जानकारी को एकत्र करने के लिए और ग्रामीणों की रचनात्मकता की झलक पाने के लिए सृष्टि :सोसाइटी फॉर रिसर्च एंड इनीशिएटिव्स फॉर सस्टेनेबल टेक्नोलॉजीज़ एंड इंस्टीट्यूशन्स: द्वारा कई अन्य संस्थाओं के सहयोग से साल में दो बार आयोजित की जाती है- ‘शोधयात्रा’।

इस साल 36वीं शोधयात्रा अरूणाचल प्रदेश के निचले सुबांसिरी जिले में की गई, जिसकी रिपोर्ट अहमदाबाद में कल जारी की गई। आईआईएम-अहमदाबाद के प्रोफेसर एवं सृष्टि के संयोजक डॉ अनिल के. गुप्ता के नेतृत्व में की गई यह शोधयात्रा जिंरो से शुरू हुई और येताप तक चली। इस शोधयात्रा के दौरान यात्री कुल 23 गांवों और 18 स्कूलों से होकर गुजरे।

इस रिपोर्ट के अनुसार, यात्रा के दौरान ग्रामीणों से बातचीत में सबसे ज्यादा ध्यान वहां के बच्चों ने खींचा। ये बच्चे अपनी छोटी उम्र के बावजूद अपने आसपास की समस्याओं के प्रति बेहद संवेदनशील थे। इन्हीं में से छठी कक्षा के दो बच्चों डोरा जेम्स और तान्या तेरिंग ने इस पहाड़ी इलाके में बांस को कंधों पर लादकर उंचाई पर ले जाना एक बड़ी समस्या बताया और इस समस्या को सुलझाने के लिए पहिए लगे स्टैंड बनाने का सुझाव भी दिया।

बच्चों की रचनात्मक सोच को देखते हुए जब उन्हें एक पहिए वाला साइकिल नुमा जुताई यंत्र दिखाया गया तो उन्होंने उसमें सुधार के कई सुझाव दे डाले। उन्होंने क्षेत्रीय दुर्गमता को देखते हुए इसमें एक की जगह दो पहिए लगाने, ब्रेकें लगाने जैसी कई अहम बातें कहीं। इन दोनों बच्चों को उनके इस आइडिया पर काम करने के लिए दो हजार रूपए की मदद भी संस्था की ओर से तत्काल दे दी गई। सृष्टि के अनुसार, इन रचनात्मक बच्चों को अगले माह राष्ट्रपति भवन में होने वाले नवोन्मेष उत्सव में भी आमंत्रित किया जा सकता है।

कठिन स्थितियों और संसाधनों के अभाव को नवोन्मेष का उत्प्रेरक मानने की सोच के साथ की गई इस शोधयात्रा के दौरान, विभिन्न स्थानों पर रूककर वहां के लोगों की खोजों को देखा और समझा गया। वहां के लोगों के काम आ सकने वाली उन तकनीकों की जानकारी भी इनके साथ साझा की गई, जो देश के अन्य गांवों में विकसित की गई हैं। यह जानकारी हनी बी नेटवर्क के डाटा बेस में दर्ज है। तरह-तरह की प्रतियोगिताएं आयोजित करके भी स्थानीय प्रतिभा और रचनात्मकता को एक मंच दिया गया।

रिपोर्ट में इलाके के स्कूलों में सुधार की पर्याप्त गुंजाइश तो बताई गई लेकिन साथ ही वहां के कुछ शानदार पहलुओं को भी उजागर किया गया। इलाके की एक अहम बात यह थी कि यात्रियों को वहां का कोई बच्चा कुपोषण का शिकार नहीं मिला। इसके अलावा जैव विविधता के प्रबंधन केंद्रों की सक्रियता ने यात्रियों का अपना ध्यान खींचा। क्षेत्र विशेष के संरक्षण के लिए किए गए सामुदायिक प्रयासों को भी सराहा गया।

देश के सुदूर इलाकों में मौजूद पारंपरिक ज्ञान और रचनात्मकता से रूबरू करवाने वाली इस यात्रा के कुल 65 यात्रियों में किसान, नवोन्मेषक, शिक्षक, पत्रकार और अन्य पेशेवर शामिल थे।