रिटायर्ड लोगों की बच्चों के लिए 3 लाख किलोमीटर की यात्रा, इसे आप क्या कहेंगे?

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रिटायर होने के बाद आमतौर पर लोग आराम की जिंदगी जीना पसंद करते हैं। लगता है एक लंबे समय तक नौकरी के बाद थोड़ा आराम किया जाए। स्वाभाविक भी है। लोग ज़िंदगी को रूटीन से अलगाकर जीने लगते हैं, लेकिन उम्र के उस पड़ाव में कुछ ऐसे भी लोग होते हैं जो अपने बीते जीवन के अनुभव और ज्ञान का निचोड़ दूसरों तक पहुंचाने की कोशिश में रहते हैं। ऐसी ही एक कोशिश का नाम ‘विज्ञानवाहिनी’। ये एक मोबाइल साइंस लेबोरेट्री है। जो पिछले 21 सालों के दौरान महाराष्ट्र के सभी 38 जिलों की 288 तहसील के स्कूलों का दौरा कर चुकी है। खास बात ये है कि ‘विज्ञानवाहिनी’ से जुड़े सभी 22 लोगों की उम्र ना सिर्फ 60 साल से ज्यादा है बल्कि ये अपनी-अपनी नौकरियों से रिटायर हो चुके हैं। खास बात ये है कि इन सभी लोगों की पृष्ठभूमि साइंस ही है।


‘विज्ञानवाहिनी’ नाम की इस मुहिम को शुरू करने का श्रेय जाता है डॉक्टर मधुकर देशपांडे और पुष्पा देशपांडे को। जिन्होंने साल 1995 में विज्ञानवाहिनी नाम से एक मुहिम शुरू की। इसे शुरू करने से पहले दोनों ने पहले हैदराबाद और पुणे में पढ़ाई की। इसके बाद डॉक्टर देशपांडे अमेरिका चले गये और वहां जाकर उन्होंने गणित जैसे विषय पर पीएचडी की। कई सालों तक अमेरिका में काम करने के बाद जब डॉक्टर मधुकर देशपांडे रिटायर हुए तो वो अमेरिका की मार्क्वेट विश्वविद्यालय में गणित के हेड ऑफ द डिपार्टमेंट के तौर पर काम कर रहे थे। वहीं पुष्पा देशपांडे वहां के एक स्कूल में गणित पढ़ाती थीं। अमेरिका में लंबे वक्त तक रहने के बावजूद दोनों चाहते थे कि वो देश के विकास के लिये कुछ सामाजिक काम करें। लेकिन क्या करना है वो दोनों ये नहीं जानते थे। 


एक दिन पुष्पा देशपांडे टीवी देख रहीं थी तो उन्होंने देखा कि फिल्म में एक बस कुछ कॉलेजों में जाती थी और साइंस से जुड़े उपकरण वो कुछ वक्त के लिए कॉलेज में छोड़ देती थी। ताकि वहां के बच्चे उनका इस्तेमाल कर सकें। इसके बाद वो बस दूसरे कॉलेज में जाती थी। तब पुष्पा देशपांडे के मन में ख्याल आया कि भारत के स्कूलों में भी अच्छी साइंस लेबोरेटीज की काफी कमी है तो क्यों ना इसी तरह का काम अपने देश में भी शुरू किया जाये। जिसके बाद दोनों अपनी नौकरियों से रिटायरमेंट के बाद वापस पुणे आ गये और यहां आकर अपने दोस्तों के सामने अपना विचार रखा। दोनों का ये आइडिया उनके दोस्तों को काफी पसंद आया।


इस तरह साल 1995 में 4-5 लोगों ने मिलकर एक बस को किराये पर लिया और पुणे के आसपास के कुछ स्कूलों में गये और वहां पर स्कूली छात्रों को कई तरह के साइंस एक्सपेरिमेंट्स करके दिखाये। इन लोगों की ये कोशिश रंग लाने लगी जिसके बाद इनको कुछ जगह से फंडिंग मिलने लगी और ये लोग अपने लिये एक नई बस खरीदने में कामयाब हो सके। ‘विज्ञानवाहिनी’ के सचिव शरद गोडसे के मुताबिक, 

“शुरूआत में हम लोग स्कूलों को पत्र लिखकर बस के बारे में जानकारी देते थे लेकिन धीरे धीरे जब लोगों को जानकारी हुई तो हालात बदल गये और आज स्कूल हमको पत्र लिखकर इस बस को अपने यहां बुलाने की गुजारिश करते हैं। आज विज्ञानवाहिनी की ये बस शहरों के स्कूलों में ना जाकर दूर दराज के ग्रामीण इलाकों के स्कूलों में जाती है और वहां पढ़ने वाले बच्चों को विज्ञान से जुड़े तजुर्बे सिखाती है।"


अब तक विज्ञानवाहिनी की ये बस महाराष्ट्र के सभी 38 जिलों की 288 तहसील का दौरा कर चुकी है। इसके अलावा ‘विज्ञानवाहिनी’ की टीम उत्तर-पूर्वी राज्यों जैसे नागालैंड, अरूणाचल प्रदेश, मेघालय और असम के अलावा मध्यप्रदेश का भी दौरा कर चुकी हैं। यहां पर ना सिर्फ बच्चों को विज्ञान से जुड़ी जानकारी दी जाती हैं, बल्कि अध्यापकों के लिये ये कई तरह की वर्कशॉप का आयोजन भी कर चुके हैं। अब तक विज्ञानवाहिनी की टीम 3 लाख से भी ज्यादा छात्रों के साथ जुड़ चुकी है। विज्ञानवाहिनी से जुड़े लोग विभिन्न क्षेत्रों से हैं लेकिन सबकी पृष्ठभूमि साइंस से है। 22 लोगों की इस टीम में कोई इंजीनियर है, तो कोई टेक्सटाइल इंजीनियर, फार्मेसिस्ट, आईआईटी का पूर्व छात्र, टीचर, प्रोफेसर है। विज्ञानवाहिनी के सचिव शरद गोडसे जो इस सारे काम पर नजर रखते हैं वो खुद एक मैकेनिकल इंजीनियर रह चुके हैं। उनका कहना है, 

“टीम में काम को लेकर काफी एकजुटता है इसलिये किसी मुद्दे पर आपस में कोई मतभेद भले ही रहता हो लेकिन जो भी अंतिम फैसला होता है उसे सभी मानते हैं। इसके लिए टीम का कोई सदस्य पैसा नहीं लेता और स्वेच्छा से अपने काम को अंजाम देता है।”

‘विज्ञानवाहिनी’ के सदस्य समय समय पर स्कूलों का दौरा करते हैं यहां पर बच्चों को फिजीक्स, केमेस्ट्री और बॉयोलॉजी जैसे विषय पढ़ाते हैं। खासतौर से इनका ध्यान लड़कियों की शिक्षा पर होता है। इसके अलावा स्वास्थ्य के प्रति भी ये लोग बच्चों को जागरूक करते हैं। जिस भी स्कूल में ‘विज्ञानवाहिनी’ की टीम जाती है वो वहां पर करीब 5 से 6 घंटे बच्चों के बीच रहकर काम करती है। विज्ञानवाहिनी की बस को खास तरह से तैयार किया गया है। इसमें ड्रॉइवर के अलावा केवल 5 सीट और हैं। जबकि शेष बस में केबिनेट बने हुए हैं। जहां साइंस से जुड़े उपकरण रखे जाते हैं। इसके अलावा 8 टेबल और एक जनरेटर भी बस के अंदर होता है ताकि जिन गांव में बिजली की दिक्कत हो वहां जनरेटर के जरिये बच्चे साइंस के तजुर्बे कर सकें। बच्चे साइंस से जुड़े सभी तजुर्बे ‘विज्ञानवाहिनी’ की टीम के देखरेख में खुद ही करते हैं। इसके अलावा बस में ऑडियो वीडियो सिस्टम भी है। जिसको देखने के लिए एकसाथ 35 बच्चों के बैठने की व्यवस्था है।


‘विज्ञानवाहिनी’ की मोबाइल बस एक साल में 150 से 160 स्कूलों का दौरा करती हैं। मोबाइल बस के अलावा जरूरत पड़ने पर ‘विज्ञानवाहिनी’ की टीम कार के जरिये भी दूर दराज के स्कूल में पहुंचने की कोशिश करती है। ‘विज्ञानवाहिनी’ के काम को देखते हुए अब कई दूसरे संगठन भी इस तरह की मोबाइल बस सेवा पर काम कर रहे हैं। इनमें गुलबर्गा, चेन्नई, हैदराबाद जैसे शहर शामिल हैं। जहां पर दूसरे संगठन ऐसी ही मोबाइल साइंस लेबोरेट्री चला रहे हैं। जबकि मेघालय की सरकार ने ‘विज्ञानवाहिनी’ की मदद से साइंस बस को तैयार करने का फैसला लिया है जो अलग अलग गांव में जाएगी और स्कूलों में पढ़ाने वाले टीचर बच्चों को साइंस के प्रैक्टिकल करके दिखाएंगे।


‘विज्ञानवाहिनी’ के सदस्यों की कोशिश रहती है कि वो बच्चों को विज्ञान सरल तरीके से समझा सकें। भविष्य की योजनाओं के बारे में शरद गोडसे का कहना है कि ‘विज्ञानवाहिनी’ इस साल जून से पुणे के आसपास एक खास प्रोजेक्ट पर काम करेगी। इसके तहत एक खास इलाके के कुछ स्कूलों को आपस में जोड़ा जाएगा। उसके बाद इनमें से एक स्कूल को विज्ञान से जुड़े उपकरण दिये जाएंगे और वहां के टीचरों को ट्रेनिंग दी जाएगी। इस तरह एक स्कूल साइंस के इन उपकरणों को कुछ वक्त अपने पास रखने के बाद दूसरे स्कूल को दे देगा। फिलहाल ‘विज्ञानवाहिनी’ को इस प्रोजेक्ट के तलाश है प्रायोजक की।

वेबसाइट : www.vidnyanvahini.org

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I would like to quote myself as ‘a writer by chance’, as fate wants me to write. Now, writing has become my passion, my child, my engagement, and my contentment. Worked as a freelance writer in gathering social and youth oriented real stories.

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