80 साल की सरोजिनी पिछले 3 दशक से अनाथ बच्चियों को दे रही हैं मां का प्यार

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डॉ. सरोजिनी अग्रवाल को इस साल प्रतिष्ठित नीरजा भनोट अवार्ड से भी सम्मानित किया गया। शहीद नीरजा भनोट की याद में यह पुरस्कार का 26वां संस्करण था जो इसके गठन से लेकर आज पहली बार स्वयं नीरजा भनोट के जन्मदिन अवसर 7 सितंबर पर दिया गया।

साभार : सोशल मीडिया
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सरोजनी अग्रवाल कहती हैं कि मै एक मां हूं और मां होने का धर्म निभा रही हूं। इससे मुझे आत्मशांति मिलती है और उन बच्चियों को खुश देखकर प्रसन्न होती हूं, जिनके जीवन में प्रकाश के लिए मनीषा मंदिर कुछ न कुछ कर रहा है। अब तक 800 से अधिक बच्चे उनके आंगन में पड़े पालने में झूल चुके हैं। 

सरोजनी उन नवजात बच्चों को भी गोद लेती थीं, जिनको उनके माता-पिता पैदा होते ही छोड़ देते थे। इसके लिए उन्होने अपने आश्रम में ‘संजीवनी पालना’ रखा था, जहां पर कोई भी आकर अपना नवजात बच्चा छोड़ सकता था। इन बच्चों को डॉक्टर सरोजनी ऐसे लोगों को गोद दे देती थीं जिनके बच्चे नहीं थे।

यूपी की राजधानी लखनऊ में एक अनोखी मां का पालना कभी खाली नहीं होता। या यूं कह लें कि सरोजनी की ममता बच्चों के प्रति कम ही नहीं होती। 800 बच्चों को अपने आंचल का प्यार बांट चुंकी एक मां के दिल में अपने बच्चों के प्रति कूट-कूट कर प्यार भरा है, जो 80 साल की उम्र में भी कम होने का नाम नहीं ले रहा है। सरोजनी अग्रवाल कहती हैं कि मै एक मां हूं और मां होने का धर्म निभा रही हूं। इससे मुझे आत्मशांति मिलती है और उन बच्चियों को खुश देखकर प्रसन्न होती हूं, जिनके जीवन में प्रकाश के लिए मनीषा मंदिर कुछ न कुछ कर रहा है। अब तक 800 से अधिक बच्चे उनके आंगन में पड़े पालने में झूल चुके हैं। जाने कितने ही लोग अपनी बच्चियों को बोझ समझ इस पालने में डाल गए और इस मां ने हर बच्ची को पाला। सरोजिनी की जिन्दगी का यही मकसद है कि कोई अनाथ बच्ची ठोकरे न खाए।

सरोजिनी एक लेखिका के तौर पर काम करती रहीं और बाकी समय अपने परिवार को देती रहीं। उनके तीन बेटे हैं। जब उनका बड़ा बेटा इंजीनियर बना तो सबसे पहले उन्होंने उससे लड़कियों के लिए अनाथालय बनाने का विचार शेयर किया।इसके बाद उन्होंने अपने पति वी.सी. अग्रवाल के साथ मिल कर ये काम शुरू किया। 'मनीषा मंदिर' नाम का ये अनाथालय 1984 में शुरू हुआ। उस वक्त इसमें केवल तीन कमरे थे। इस अनाथालय में अनाथ बच्चियां पली। इसके अलावा ऐसी बच्चियां भी रहीं, जिनके मां-बाप होते हुए भी वो अनाथ थीं। यही नहीं ऐसी लड़कियां भी इस आश्रम में पलीं जो वेश्यालयों से लायी गयीं थीं। सरोजिनी मानती हैं कि मां बनने के लिए आपको बच्चे को जन्म देना जरूरी नहीं। वह कहती हैं कि सबसे सुखद होता है इन बेसहारा बच्चियों को 'मां' कहते सुनना।

 साभार : सोशल मीडिया
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एक हादसे के बाद बदल गई जिंदगी-

लगभग तीस साल पहले सरोजिनी जी के साथ कुछ ऐसा हुआ कि उन्होंने अपना जीवन इन बेसहारा बच्चियों के नाम करने का फैसला ले लिया। 1978 में उनकी आठ साल की बेटी एक सड़क दुर्घटना में उन्हें हमेशा के लिए छोड़ कर चली गयी। मनीषा 4 बच्चों में सरोजनी अग्रवाल की अकेली बेटी थी। साल 1969 में मनीषा ने अपने जुड़वा भाई के साथ जन्म लिया था, लेकिन मनीषा की अकस्मात मृत्यु ने डॉक्टर सरोजनी अग्रवाल को झकझोर कर रख दिया। बड़े अरमानों के बाद उनके घर बिटिया पैदा हुई थी, बेटी की हर छोटी बड़ी ख्वाहिश वो मां बड़े अरमानों से पूरा करती थी, लेकिन एक सड़क हादसे में उस मां ने अपने आठ साल के जिगर के टुकड़े को खो दिया था। 

डॉक्टर सरोजनी अग्रवाल के मुताबिक, जिस समय ये हादसा हुआ उस वक्त मैं और मेरी बेटी एक साथ थे। उस हादसे में मेरी जान तो बच गई लेकिन मनीषा नहीं बच पाई। जिस समय मनीषा की मृत्यु हुई उस वक्त मैं रोड पर घायल पड़ी थी। तभी मैंने फैसला ले लिया था कि अब मैं जीवन भर अनाथ लड़कियों के लिए ही काम करूंगी। करीब दो वर्षों तक मैं पूरे परिवार से कट कर रह गई। एक बार सड़क पर कुछ लड़कियों को भीख मांगते हुए देखा और वहीं से मुझे एक नया रास्ता मिल गया। मैंने एक मंदिर बनाने का निर्णय लिया लेकिन उस मंदिर में किसी भगवान को बिठाने के बजाए मैंने बेसहारा लड़कियों को रखना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे मैंने काम शुरू किया। 24 सितंबर 1984 को मेरा लक्ष्य पूरा हुआ और मनीषा मंदिर की शुरुआत हुई। मेरे इस काम में सभी का बहुत सहयोग मिला। 

सरोजिनी की गोद में सुकून से लेटी एक बच्ची, साभार : सोशल मीडिया
सरोजिनी की गोद में सुकून से लेटी एक बच्ची, साभार : सोशल मीडिया

वह मंदिर कोई अनाथालय नहीं है बल्कि उन लड़कियों का घर है। जब मैंने मंदिर को शुरू किया तो मेरे मन में एक सकून था कि यह सब मेरी बेटियां हैं। भगवान ने अगर एक बेटी छीन ली तो कई बेटियां दे दी। उन्हें अपने पास रखने के बाद उनकी शादी तक मैं कराती हूं। उसके बाद साल 1992 में उन्होने गोमती नगर में 30 हजार वर्ग फीट जगह लेकर अपने आश्रम को वहां से चलाना शुरू किया। शुरूआत में वो इस आश्रम में केवल उन्हीं लड़कियों के आसरा देती थीं जिनके माता पिता नहीं थे, लेकिन कुछ वक्त बाद उन्होने उन लड़कियों के भी आश्रय देना शुरू किया जिनके पिता या तो अपाहिज थे या किन्ही वजहों से जेल में थे और उनकी मां बच्चों की परवरिश करने में असमर्थ होती थी। डॉक्टर सरोजनी उन नवजात बच्चों को भी गोद लेती थीं, जिनको उनके माता-पिता पैदा होते ही छोड़ देते थे। इसके लिए उन्होने अपने आश्रम में ‘संजीवनी पालना’ रखा था, जहां पर कोई भी आकर अपना नवजात बच्चा छोड़ सकता था। इन बच्चों को डॉक्टर सरोजनी ऐसे लोगों को गोद दे देती थीं जिनके बच्चे नहीं थे।

स्नेह की छांव और ममता की देहरी

इन सब कामों के अलावा डॉक्टर सरोजनी एक लेखिका और कवयित्री भी हैं। उनके कई उपन्यास और कविताएं प्रकाशित हो चुके हैं। ‘मनीषा मंदिर’ की स्थापना से पूर्व वो देश भर के कवि सम्मेलनों में कविता पाठ किया करती थीं। लेकिन उसके बाद समय की कमी के कारण उनका ये शौक भी छूट गया है। उन्होने पूरी तरह से अपने को इस काम में लगा लिया है। पिछले 33 सालों के दौरान मनीषा मंदिर में करीब 800 लड़कियों को छत दे चुकी हैं। इसमें से कई लड़कियां तो ऐसी हैं जिनकी शादी हो चुकी है तो कुछ देश के अलग-अलग हिस्सों में नौकरी कर रही हैं। इस समय उनके आश्रम में 26 लड़कियां हैं, जिनकी उम्र 5 साल से लेकर 18 साल के बीच है। मनीषा मंदिर में रहने वाली सभी लड़कियां स्कूल जाती हैं। इनमें से कुछ लड़कियां प्राइवेट स्कूलों में पढ़ती हैं तो कुछ सरकारी स्कूल में। मनीषा मंदिर में रहने वाली कई लड़कियों की पढ़ाई का खर्च कुछ डोनर उठाते हैं।

शुरुआत में जब डॉक्टर सरोजनी अग्रवाल ने अनाथ लड़कियों को आसरा देने का काम शुरू किया, तो उनके आसपास रहने वाले कुछ लोग उनको शक की निगाह से देखते थे और अपना शक दूर करने के लिये कई बार रात 9 बजे आकर देखते कि वो लड़कियों को खाना खिला रही हैं कि नहीं। धीरे-धीरे उनके निस्वार्थ काम को देखकर लोग खुद ही उनकी मदद को आगे आने लगे। बढ़ती उम्र के कारण डॉक्टर सरोजनी अग्रवाल को इन बच्चों की देखभाल करने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि पैसे देकर की कोई महिला इन लड़कियों को मां जैसा प्यार नहीं दे सकती।

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लड़कियों को बनाती हैं आत्मनिर्भर

डॉक्टर सरोजनी अग्रवाल ने करीब 2 साल पहले अपनी बेटी के नाम से ‘मनीषा उच्च शिक्षा स्कॉलरशिप योजना’ की शुरूआत की है। इसके जरिये वो उच्च शिक्षा और तकनीकी शिक्षा हासिल करने वाली लड़कियों को स्कॉलरशिप देती हैं। इस योजना के लिये 27 सितम्बर 2015 को गृहमंत्री राजनाथ सिंह के हाथों 17 लड़कियों को स्कॉलरशिप दे चुकी है। इस दौरान हर लड़की को 40 हजार रुपये से लेकर 70 हजार रुपये तक की स्कॉलरशिप दी गई। पिछले साल भी उन्होने राज्यपाल राम नाइक के हाथों 13 लड़कियों को स्कॉलरशिप दी। इस साल भी उनकी योजना ऐसी 25 लड़कियों को स्कॉलरशिप देने की है। डॉक्टर सरोजनी इन बच्चों को केवल रहने, खाने और पढ़ने की सुविधा ही नहीं दे रहीं हैं, बल्कि समय-समय पर इन लड़कियों को मंसूरी, हरिद्वार, ऋषिकेष जैसी कई पर्यटक जगहों पर घूमाने के लिए ले जातीं हैं। 

आज मनीषा मंदिर में लाइब्रेरी से लेकर कम्प्यूटर लैब तक है। सभी सुविधाएं देने के साथ ही वो ये भी सुनिश्चित करती हैं कि इन बच्चियों को अच्छी शिक्षा मिल पाए। उनका मानना है कि बच्चियों को अच्छा जीवन देने के लिए उन्हें शिक्षित करना बेहद ज़रूरी है। इस अनाथालय की कई लड़कियां आज पढ़-लिख कर अच्छी नौकरियां कर रही हैं। मनीषा मंदिर में लड़कियों को 17-18 साल तक की उम्र तक रखा जाता है और सभी सुविधाएं दी जाती हैं। इसके बाद वो आत्मनिर्भर हो कर नौकरी करने योग्य हो जाती हैं। अब तक आठ सौ लड़कियां यहां रहा चुकी हैं. आज यहां से निकली कोई लड़की प्रिंसिपल बन चुकी है, तो कोई बैंक मैनेजर, कुछ की शादी हो गयी और कुछ को लीगल एडॉप्शन के ज़रिये अच्छे परिवारों को दे दिया गया। अपने इस नेक काम के लिए सरोजिनी जी को कई सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। आज भी वो बिना थके बेसहारा बच्चियों को अच्छी परवरिश देने के लिए लगातार काम कर रही हैं।

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डा. सरोजिनी अग्रवाल को इस साल प्रतिष्ठित नीरजा भनोट अवार्ड से भी सम्मानित किया गया। शहीद नीरजा भनोट की याद में यह पुरस्कार का 26वां संस्करण था जो इसके गठन से लेकर आज पहली बार स्वयं नीरजा भनोट के जन्मदिन अवसर 7 सितंबर पर दिया गया। हम सरोजिनी जी के जज़्बे को सलाम करते हैं, उन्होंने साबित किया है कि अगर इरादे पक्के हों, तो आप जरूर किसी की जिन्दगी बदल सकते हैं।

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