बुलंदियों पर गुदड़ी के लाल

कहते हैं न कि आंधियों में भी दिवा का दीप जलना जिंदगी है, पत्थरों को तोड़ निर्झर का निकलना जिंदगी है, सोचते हैं वे, किसी छाया तले विश्राम कर लें, किंतु कोई कह रहा, दिन-रात चलना जिंदगी है। उम्मुल खेर के विश्राम का समय आता है तब, जबकि वह इसी महीने जून 2017 में सिविल सर्विसेज एग्जाम में 420वीं रैंक हासिल कर लेती हैं। फिर भी जिंदगी चलती रहती है। जन्म से ही बोन डिसऑर्डर से पीड़ित उम्मुल का सफर जारी है।

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"जरा गौर से इन होनहारों को तो देखिए कि किस तरह पहाड़ जैसी मुसीबतें पार करती उनकी मेहनत एक दिन अजब रंग लाती है, वक्त की सारी चुनौतियां उनके हौसलों के आगे बौनी होकर जाती हैं। ये गुदड़ी के लाल अपनी मशक्कत से नामुमकिन-सी उम्मीदें परवान चढ़ते देख लाखों, करोड़ों दिलों पर पल भर में छा जाते हैं। अपनी ही पंक्तियां दुहराते हुए कहूं तो... वक्त से हारे हुए ये लोग, और दुत्कारे हुए ये लोग, लिख रहे वक्त का इतिहास, वक्त के मारे हुए ये लोग..."

आंधियों में भी दिवा का दीप जलना जिंदगी है, पत्थरों को तोड़ निर्झर का निकलना जिंदगी है, सोचते हैं वे, किसी छाया तले विश्राम कर लें, किंतु कोई कह रहा, दिन-रात चलना जिंदगी है। उम्मुल खेर के विश्राम का समय आता है तब, जबकि वह इसी महीने जून 2017 में सिविल सर्विसेज एग्जाम में 420वीं रैंक हासिल कर लेती हैं। फिर भी जिंदगी चलती रहती है। जन्म से ही बोन डिसऑर्डर से पीड़ित उम्मुल का सफर जारी है।

जब कड़ी मारें पड़ीं, दिल हिल उठा, लेकिन हिम्मत हो, जुनून भी तो क्या कुछ नहीं हो सकता है। हमारे वतन की झुग्गियों में भी विवेक और हौसले आसमान छूते हैं। वहां भी अक्सर संकल्प दुहराए जाते हैं- हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा। ये गुदड़ी के लाल अपनी मशक्कत से उम्मीदें परवान चढ़ते देख लाखों, करोड़ों दिलों पर पल भर में छा जाते हैं। जोधपुर रेलवे स्टेशन के कुली जुगताराम का बेटा खेमराज ऑल इंडिया प्री-मेडिकल टेस्ट की चुनौती पार कर अभावों की मार दुबली कर देता है। चंडीगढ़ में चाय बेचने वाले रामस्वरूप का बेटा विनोद हरियाणा सिविल सर्विसेज जुडिशल एग्जाम पास करता है तो घर-परिवार के दिहाड़ी मजदूरी के दिन संवर जाते हैं।

संघ लोक सेवा आयोग की कठिन परीक्षा फांदने वाले कई टॉपर घर की फटेहाली से लड़ते हुए सपनों की ऊंची उड़ान भरते हैं। मऊ (म.प्र.) के दर्जी वीरेंद्र राजपूत के बेटे निरीष को आईएएस की परीक्षा में 370वीं रैंक हासिल हो जाती है। शादी के पंद्रह दिन बाद ही गुजरात की कोमल गनात्रा को छोड़कर पति हमेशा के लिए विदेश चला जाता है और चुनौती से दो-दो हाथ करती कोमल आईएएस बन जाती हैं। ऐसे ही संघर्षों से गुजरते हुए हरियाणा की अनुराधा पाल पहले तो तीन साल तक एक इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाकर पैसे एकत्र करती हैं, फिर दिल्ली जाकर उनका सिविल सेवा में सेलेक्शन हो जाता है। ऐसे ही नामों में शुमार हैं कुपवाड़ा की रुवैदा सलाम, जोधपु‌र के एक छोटे से गांव की स्तुति चरण।

लेकिन अभी हम बात करते हैं राजस्थान की अपंग उम्मुल खेर की, जिनका बचपन दिल्ली में हजरत निजामुद्दीन की झुग्गियों में बीता है। एक दिन अचानक झुग्गी भी छीन ली जाती है। पूरा परिवार बेघर हो जाता है। उस वक्त कक्षा सात में पढ़ रही नन्ही उम्मुल अपनी पढ़ाई के साथ परिवार के भरण-पोषण का भी जिम्मा ढोती हुई नन्हे गरीब नौनिहालों को ट्यूशन पढ़ाने लगती है। अपनी चुनौतियों से जूझती उम्मुल एक दिन सोचती है, जीते जी सिर्फ पढ़ना है वरना मर जाना है। सुबह से शाम तक स्कूल, रात में ट्यूशन, बस यही दो काम। और कठिन राह नापती हुई वह एक दिन दिल्ली यूनिवर्सिटी से साइकॉलजी में बीए और जेएनयू से इंटरनेशनल रिलेशन्स में एमए कर लेती है। इतना ही नहीं, वह विश्वमंच पर दस्तक देती हुई जापान पहुंच जाती है। दुनिया के सामने विकलांग समुदाय का नेतृत्व करती है, उसकी मेहनत रंग लाती है और वक्त की सारी चुनौतियां उसके हौसलों के आगे बौनी हो जाती हैं।

कहते हैं, न कि आंधियों में भी दिवा का दीप जलना जिंदगी है, पत्थरों को तोड़ निर्झर का निकलना जिंदगी है, सोचते हैं वे, किसी छाया तले विश्राम कर लें, किंतु कोई कह रहा, दिन-रात चलना जिंदगी हैउम्मुल खेर के विश्राम का समय आता है तब, जबकि वह इसी महीने जून 2017 में सिविल सर्विसेज एग्जाम में 420वीं रैंक हासिल कर लेती हैं। फिर भी जिंदगी चलती रहती है। जन्म से ही बोन डिसऑर्डर से पीड़ित उम्मुल का सफर जारी है।

कामयाबियों के ऐसे ही कई मंजर खेल-खिलाड़ियों की दुनिया में नजर आते हैं। याद करिए कि फरवरी 2017 में जब आईपीएल की नीलामी में करोड़ो की कीमत पर खिलाड़ी खरीदे जा रहे थे, उनमें कई एक ‘गुदड़ी के लाल’ निकले। वह अपनी अभावों की जिंदगी पीछे बहुत दूर छोड़ आए थे। तीन करोड़ में चयनित होकर रातोरात स्टार बनने वालो में ऐसे ही एक खिलाड़ी हैं तमिलनाडु के तेज गेंदबाज थंगारासू नटराजन। उनके पिता कुली रहे हैं। उन्हीं की तरह हैदराबाद के तेज गेंदबाज मोहम्मद सिराज के पिता ऑटो चालक हैं। जूनियर हॉकी वर्ल्ड कप में बेल्जियम को 2-1 से हराकर विश्व चैंपियन बनने वाली टीम इंडिया के कैप्टन हरजीत सिंह तुली के पिता ट्रक ड्राइवर हैं।

इन गुदड़ी के लालों की उड़ाने देख अल्लामा इक़बाल का एक शेर याद आता है - "ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले, ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे, बता तेरी रज़ा क्या है।"

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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