अपनी ड्यूटी से वक्त निकालकर क्यों बच्चों के स्कूल पहुंच जाते हैं ये दो IAS-IPS अफसर

एक ही नाम के दो सरकारी अधिकारी, दोनों कर रहे हैं एक ही जैसा प्रशंसनीय काम...

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यह भी क्या खूब संयोग है कि उत्तर प्रदेश के आईपीएस अधिकारी हैं संतोष कुमार मिश्रा और छत्तीसगढ़ के आईएएस अधिकारी भी संतोष कुमार मिश्रा। दोनो ही का एक नाम, एक अभिरुचि, दो तरह के शासकीय दायित्व लेकिन उससे समय बचाकर दोनो ही अधिकारी स्कूलों में कुछ वक्त बच्चों के बीच जरूर बिताते हैं। हमारे देश के प्रशासक अगर इस राह चल पड़ें तो अशिक्षा का अंधेरा छांटने से भला कौन रोक सकता है।

किसी की जिंदगी बनाने के लिए आपका एक प्रयास कइयों के लिए मिसाल बन सकता है। समाज को सही दिशा दिखाने की यह काम उनके लिए उतना ही जरूरी है, जितना कि घर और ऑफिस के बाकी काम। ऐसे ही छत्तीसगढ़ में तमिलनाडु कैडर के एक आईएएस अधिकारी हैं संतोष कुमार मिश्रा। 

अत्यंत असहनीय स्थितियों, असुविधाओं में पढ़ाई-लिखाई कर रहे नौनिहालों के बारे में अगर हमारे देश का प्रशासक वर्ग आईपीएस संतोष कुमार मिश्रा की राह चल पड़े तो सुरक्षा और शिक्षा दोनो में सुधार होने से कोई रोक नहीं सकता है। पटना (बिहार) के रहने वाले और उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर जिले में तैनात मिश्रा 2012 बैच के ऐसे आईपीएस अफसर हैं, जिनकी अब मिसालें दी जाने लगी हैं। वह वर्ष 2004 से 2011 तक अमेरिका में 50 लाख के पैकेज पर सॉफ्टवेयर इंजीनियर की नौकरी करते रहे। सातवें साल 2011 में एक दिन मन में कुछ बड़ा कर गुजरने की ऐसी धुन समाई नौकरी छोड़ अपने वतन लौट पड़े। सिविल सर्विस की तैयारी में जुट गए और फर्स्ट अटेंप्ट में ही आईपीएस सेलेक्ट हो गए।

वह बताते हैं कि पटना जिले में मेरे पिता लक्ष्मण मिश्रा आर्मी से रिटायर्ड हो चुके हैं। मां हाउस वाइफ हैं। तीन बहनें हैं। मैंने दसवीं और बारहवीं की परीक्षा अपने गृह प्रदेश से उत्तीरण की। उसके बाद 2004 में पुणे यूनिवर्सिटी से मकैनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की। अप्लाई किया, यूरोप की एक कंपनी में इंजीनियर की नौकरी मिल गई। चार साल तक वहां जॉब किया। उसके न्यूयार्क (अमेरिका) चला गया। दूसरी नौकरी ज्वॉइन कर ली। वहां सात वर्षों तक रहे। अचानक सब छोड़छाड़ कर भारत आ गए। और वर्ष 2012 में आईपीएस बन गए।

आईपीएस मिश्रा के जीवन में कुछ ऐसी अप्रिय स्थितियां भी हैं, जब कलंक का टीका मिटाने के लिए उन्हें क्षुब्ध मन से शख्त रुख अख्तियार करना पड़ा। जब वह सन् 2015 में प्रशिक्षु आईपीएस के रूप में सहारनपुर (उ.प्र.) में तैनात थे, एक युवती ने उनके खिलाफ दावा पेश कर दिया। उसका आरोप था कि वह मिश्रा से शादी रचा चुकी है। अब संतोष कुमार मिश्रा से उसकी जान को खतरा है। प्रशिक्षु मिश्रा उससे एक माह पहले ही बिजनौर से स्थानांतरित होकर सहारनपुर डीएसपी प्रथम के पद पर पहुंचे थे। दिल्ली आईआईटी में संविदा पर काम करने वाली युवती का दावा था कि मिश्रा से उसकी पहली मुलाकात 27 अप्रैल 2014 को एक परीक्षा के दौरान इलाहाबाद में हुई थी। तीन माह बाद 26 जुलाई 2014 को दोनों ने आर्य समाज मंदिर में शादी कर ली थी।

इसके बाद गोवा हनीमून के लिए गए। दोनों पुलिस अकादमी हैदराबाद में पति-पत्नी के रूप में रहे। मिश्रा इन सारी बातों को सिरे से नकारते हैं। उनका मानना है कि जब किसी महत्वपूर्ण पद को संभालिए तो इस तरह घटनाएं भी स्वाभाविक होती हैं। वह अपने जीवन के एक सुखद प्रसंग पर रोशनी डालते हुए एक दूसरे तरह की घटना सविस्तार बताते हैं। दरअसल, मिश्रा को अपनी सरकारी ड्यूटी से बचे समय में बच्चों को पढ़ाने का शौक है। यह संस्कार उन्हें अपने माता-पिता से मिला है। वहां जहां भी रहते हैं, कुछ न कुछ समय निकालकर साधनहीन बच्चों के बीच जरूर गुजार लेते हैं। वह प्रायः स्कूलों में जाकर उनकी कक्षाएं लेने लगते हैं।

वह बताते हैं कि अंबेडकर नगर से पूर्व जब वह अमरोहा में तैनात थे, एक दिन पांचवीं क्लास के एक बच्चे ने आकर उनसे शिकायत की कि उसका एक दोस्त 15 दिनों से स्कूल नहीं आ रहा है। उस मासूम की शिकायत जैसी बात उनके मन में उतर गई। पता लगाते हुए वह उसके दोस्त के घर पहुंच गए। वहां पता चला कि वह तो अपनी मिठाई की दुकान पर काम कर रहा है। इसके बाद वह दुकान पर पहुंच गए। उसके पिता से मिले। उनके कहने पर वह बच्चा दोबारा स्कूल जाने लगा। इस तरह मासूम दो दोस्तों की मुलकात कराकर उन्हें जो आत्मिक शांति मिली, वह शायद और किसी काम में न मिले। मिश्रा बताते हैं कि वह खाली समय में बच्चों को पढ़ाते हैं।

वह बताते हैं कि जब से अंबेडकर नगर में उनकी पोस्टिंग हुई है, यहां बी समय निकालकर सरकारी स्कूल के बच्चों के बीच जरूर चले जाते हैं। इसी दौरान एक दिन वह एक प्राइमरी स्कूल पहुंचे तो वहां के चौथी कक्षा के बच्चों ने कहा कि हमे जलेबी खिला दीजिए। उन्होंने जलेबी मंगाकर बच्चों को खिलाई। कुछ बच्चों को बैग दिया। इसके बाद उन्होंने बच्चों को गणित पढ़ाया। मिश्रा कहते हैं कि कानून व्यवस्था संभालना तो उनका पहला कर्तव्य है लेकिन बच्चों के बीच जाकर वह अपना सामाजिक दायित्व निभाते हैं। वह कहते हैं कि समाज के लिए अगर कुछ करने की आपकी सच्ची चाह हो तो कोई आपको रोक नहीं सकता है। जरूरत है तो बस पहल करने की।

किसी की जिंदगी बनाने के लिए आपका एक प्रयास कइयों के लिए मिसाल बन सकता है। समाज को सही दिशा दिखाने की यह काम उनके लिए उतना ही जरूरी है, जितना कि घर और ऑफिस के बाकी काम। ऐसे ही छत्तीसगढ़ में तमिलनाडु कैडर के एक आईएएस अधिकारी हैं संतोष कुमार मिश्रा। उनकी पत्नी सोनल मिश्रा भी तमिलनाडु कैडर की आईपीएस अफसर हैं। संतोष मिश्रा कहते हैं कि मेहनत से आईएएस बना, अच्छा ओहदा पाया लेकिन अध्यापन करने की जो धुन मन में कभी समा गई थी, वह आज भी बनी रहती है। इसी धुन में वह एक दिन रायपुर के एक शासकीय स्कूल में 11वीं, 12वीं के छात्रों को भौतिकी और गणित पढ़ाने लगे। बात वर्षों पुरानी है।

वह प्रत्येक रविवार को सुबह-सुबह स्कूल पहुंच जाते। वहां पहले से 11वीं, 12वीं के छात्र उनका इंतजार कर रहे होते। उसके बाद वह दो घंटे बच्चों को पढ़ाते। आईएएस मिश्रा कानपुर (उ.प्र.) के रहने वाले हैं। कानपुर से ही उन्होंने 12वीं तक की पढ़ाई की। 1993में आईआईटी कानपुर में उनका चयन हो गया। उन्होंने वहां से बीटेक (इलेक्ट्रिकल इंजीनिरिंग) की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उन्हें अमेरिका से स्कॉलरशिप मिल गई। अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ मिनेसोटा से इलेक्ट्रिकल में एमएस किया। तीन साल तक नौकरी करने के बाद वे 2000 में भारत आ गए और इसी साल आईएएस और आईपीएस दोनो तरह की प्रशासकीय परीक्षाएं पास कर लीं। बाद में आईएएस के रूप में ज्वॉइन किया।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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