दिल पर बड़ी मीठी-मीठी दस्तक देते हैं गुलज़ार के गीत 

गीतकार, कवि और फ़िल्म निर्देशक गुलज़ार के जन्मदिन पर विशेष...

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गीतकार, कवि, पटकथा लेखक, फ़िल्म निर्देशक, नाटककार गुलज़ार (संपूर्ण सिंह कालरा) के गीतों को जरा गौर से पढ़ा करिए, उनमें पिछले मौसम के भी निशान होते हैं। कहते हैं कि उनकी कलम सीधे दिल पर दस्तक देती है। आज (18 अगस्त) गुलज़ार का जन्मदिन है।

गुलजार (फाइल फोटो)
गुलजार (फाइल फोटो)
एक सिख परिवार में जन्मे गुलज़ार शुरुआत से ही रचनाकार बनना चाहते थे। उसी धुन में वह घर वालों की मर्जी की परवाह न करते हुए मुंबई पहुंच गए। एक गैराज में मैकेनिक का काम करने के साथ ही खाली समय में कविताएं लिखने लगे।

गीतकार, कवि, पटकथा लेखक, फ़िल्म निर्देशक, नाटककार गुलज़ार (संपूर्ण सिंह कालरा) की कलम सीधे दिल पर दस्तख़त करती है। आज (18 अगस्त) गुलज़ार का जन्मदिन है। हर दौर के युवाओं के पसंदीदा शायर गुलज़ार का जन्म 18 अगस्त 1934 को हिंदुस्तान बंटने से पहले पंजाब के झेलम जिले के दीना गांव में हुआ था। यह गांव अब पाकिस्तान में है। दिनेश 'दर्द' बताते हैं कि 'जिन दिनो में गुलज़ार का जन्म हुआ था, तब चिनाब, झेलम, सिंधु और रावी का पानी बिना किसी बँटवारे के गुनगुनाता आज़ाद बहता था। तब न कोई हिन्दू था, न कोई मुसलमान। तब लोग सिर्फ़ हिंदुस्तानी हुआ करते थे। तब 'माचिस' की तीलियाँ या तो चराग़ जलाने के लिए सुलगती थीं, या फिर चूल्हे। पहाड़ों और आसमान पर भी तब दूरबीनों के पहरे नहीं थे। बर्फीले पहाड़ों से उतरती बर्फ़ में भी, तब रिश्ते आज की तरह ठंडे नहीं पड़े थे। तेज़ 'आँधियों' के ज़ोर के बावजूद रिश्तों में हरारत रहती थी। तब अज़ान और आरतियों की आवाज़ें भी हर किसी के दिलोदिमाग़ को सुकून की 'ख़ुश्बू' से मुअत्तर कर देती थीं। लोग चाहे किसी भी मज़हब के हों, कानों में आवाज़ पड़ते ही उनके सिर अदब से ख़ुद-ब-ख़ुद झुक जाते थे। उस वक़्त हर 'मौसम' की 'किताब' सिर्फ़ एक ही रिश्ते का 'परिचय' देती थी, जिसके तहत हर किसी को, हर कोई अपना-सा लगता था'-

अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो
कि दास्ताँ आगे और भी है!
अभी तो टूटी है कच्ची मिट्टी,
अभी तो बस जिस्म ही गिरे हैं
अभी तो किरदार ही बुझे हैं
अभी सुलगते हैं रूह के ग़म,
अभी धड़कते हैं दर्द दिल के
अभी तो एहसास जी रहा है
यह लौ बचा लो जो थक के
किरदार की हथेली से गिर पड़ी है
यह लौ बचा लो यहीं से उठेगी
जुस्तजू फिर बगूला बनकर,
यहीं से उठेगा कोई किरदार
फिर इसी रोशनी को लेकर,
कहीं तो अंजाम-ओ-जुस्तजू के सिरे मिलेंगे,
अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो!

एक सिख परिवार में जन्मे गुलज़ार शुरुआत से ही रचनाकार बनना चाहते थे। उसी धुन में वह घर वालों की मर्जी की परवाह न करते हुए मुंबई पहुंच गए। एक गैराज में मैकेनिक का काम करने के साथ ही खाली समय में कविताएं लिखने लगे। उन्ही दिनो उनकी मुलाकात फिल्म निर्देशक बिमल रॉय, ऋषिकेश मुखर्जी और संगीतकार हेमंत कुमार से हुई। वह पार्ट टाइम उनके साथ काम करने लगे। गुलज़ार के साथ बचपन का एक बड़ा ही दर्द भरा वाकया जुड़ा हुआ है, जो आज भी उनके जहन में पीछा करता रहता है। पिता माखनसिंह ने दीना के ख़ास बाज़ार में मकान ख़रीद लिया था। वहीं पर उन्होंने कपड़े की अपनी एक दुकान भी खोल ली और परिवार के साथ वहीं दिन बसर करने लगे।

गुलज़ार की जिंदगी के खूबसूरत दिन दीना वाले घर में ही गुज़रे। बाद में यह परिवार पुराना डाकखाना चौक के एक मकान में शिफ्ट हो गया। आज वहाँ बने एक मोहल्ले का नाम 'गुलज़ार कालरा ब्लॉक' कर दिया गया है। जब हिंदुस्तान सरहदों में कैद कर दिया गया, गुलज़ार का बचपन पाकिस्तान में छूट गया। उनका वह दर्द आज भी उनके साथ है। एक बार कहीं उन्होंने कहा भी था कि 'आज भी कहीं सांप्रदायिक दंगे देखता हूँ तो मुझे विभाजन की ही याद आती है और उससे तकलीफ़ होती है।' विभाजन के बाद गुलज़ार के परिवार ने अमृतसर में पनाह ली मगर गुलज़ार के बचपन का एक बड़ा हिस्सा दिल्ली में गुज़रा। विभाजन से पीड़ित परिवार के पास उनकी पढ़ाई के लिए पैसे नहीं थे इसलिए उन्हें पेट्रोल पंप पर नौकरी करना पड़ी। इसी दौरान उनका हाथ, उनके दिलो दिमाग़ के इशारे से काग़ज़ पर शायरी/कविताएं उतारने लगा-

रात चुपचाप दबे पाँव चली जाती है
रात ख़ामोश है रोती नहीं हँसती भी नहीं
कांच का नीला सा गुम्बद है, उड़ा जाता है
ख़ाली-ख़ाली कोई बजरा सा बहा जाता है
चाँद की किरणों में वो रोज़ सा रेशम भी नहीं
चाँद की चिकनी डली है कि घुली जाती है
और सन्नाटों की इक धूल सी उड़ी जाती है
काश इक बार कभी नींद से उठकर तुम भी
हिज्र की रातों में ये देखो तो क्या होता है

गुलज़ार ने बिमल रॉय की फिल्म 'बंदिनी' में अपना पहला गाना 'मोरा गोरा अंग' लिखा, जबकि फिल्म निर्देशक के रूप में उन्होंने 1971 में पहली फिल्म बनाई 'मेरे अपने'। शुरुआती फिल्मों में उनकी पसंद संजीव कुमार रहे, जिनके साथ गुलज़ार ने कोशिश, आंधी, मौसम, अंगूर और नमकीन जैसी फिल्में बनाईं। सबसे पहले शैलेन्द्र ने गुलज़ार में छिपे प्रतिभाशाली गीतकार, शायर और कवि को देख लिया था। उन्होंने एसडी बर्मन से गुलज़ार की सिफ़ारिश की। शैलेन्द्र की सिफ़ारिश पर ही गुलज़ार को 'बंदिनी' में एक गीत लिखने का मौका मिला था। संजीव कुमार से मिलकर गुलज़ार की लेखनी को और कामयाबी मिली। दोनों दोस्त हो गए। आज गुलज़ार के लफ़्ज़ों को संगीतकार विशाल भारद्वाज सुरों में ढालते हैं। गुलज़ार कहते रहते हैं कि वह तो मिर्ज़ा ग़ालिब की कमाई खा रहे हैं। ग़ालिब के बाद अहमद नदीम क़ासमी गुलज़ार के पसंदीदा थे। जब वर्ष 2012 में दीना की गलियां छोड़ आने वाले गुलज़ार पाकिस्तान गए तो उनकी क़ब्र पर फूल रख आए थे-

आँखों में जल रहा है क्यूँ बुझता नहीं धुआँ
उठता तो है घटा-सा बरसता नहीं धुआँ
चूल्हे नहीं जलाये या बस्ती ही जल गई
कुछ रोज़ हो गये हैं अब उठता नहीं धुआँ
आँखों के पोंछने से लगा आँच का पता
यूँ चेहरा फेर लेने से छुपता नहीं धुआँ
आँखों से आँसुओं के मरासिम पुराने हैं
मेहमाँ ये घर में आयें तो चुभता नहीं धुआँ

गुलज़ार ने लगभग सभी बड़े पुरस्कार जीते हैं। वर्ष 2004 में उनको भारत सरकार ने 'पद्म भूषण' से सम्मानित किया। 'स्लमडॉग मिलेनियर' के गाने 'जय हो' के लिए गुलजार और रहमान को संयुक्त रूप से 'बेस्ट ओरिजनल स्कोर' अवॉर्ड मिला। इस बेमिसाल शायर की शादीशुदा जिंदगी बेहतर नहीं रही। राखी से बेटी मेघना का जन्म हुआ। वह भी आज फिल्म डायरेक्टर हैं। बेटी के पैदा होने के एक साल बाद 1974 में दोनों अलग हो गए हालांकि गुलजार और राखी के बीच तलाक नहीं हुआ। गुलज़ार की जिंदगी से एक और दुखद वाकया चिपका रहता है। वर्ष 1961 जब वह बिमल रॉय के साथ रहकर काम सीख रहे थे, उनके पिता माखन सिंह का निधन हो गया। उनको अभी नया-नया काम मिला था, इसलिए उन्हें परेशान न करने की ग़रज़ से किसी ने उन्हें पिता के गुजर जाने की इत्तिला नहीं दी।

कुछ दिनों बाद दिल्ली में रहने वाले उनके एक पड़ोसी से उन्हें यह ख़बर मिली, वह फ्रंटियर मेल से अपने घर, दिल्ली पहुंच गए। उन दिनों वही एक ट्रेन सबसे कम समय में मुंबई से दिल्ली पहुँचती थी। गुलज़ार 24 घंटे में घर पहुँचे, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। पिता के क्रिया-कर्म की सारी रस्में निभाई जा चुकी थीं। उस दिन गुलज़ार बड़े बोझिल मन से दिल्ली से मुंबई लौटे। तब से उनके एक-एक लफ़्ज सालती यादों की तासीर में और ज्यादा घुल-घुलकर पन्नों पर उतरने लगे। बचपन की किलकारी, हंसी और जवानी के ठहाके, उदास लम्‍हे, कुछ ख्‍वाब, कुछ ख्‍याल, कुछ उम्‍मीद, मौत में भी जिंदगी ढूंढने वाले पल, सब कुछ उनके शब्‍दों से बरसे लगा -

देखो, आहिस्ता चलो, और भी आहिस्ता ज़रा।
देखना, सोच-सँभल कर ज़रा पाँव रखना,
ज़ोर से बज न उठे पैरों की आवाज़ कहीं.
काँच के ख़्वाब हैं बिखरे हुए तन्हाई में,
ख़्वाब टूटे न कोई, जाग न जाये देखो,
जाग जायेगा कोई ख़्वाब तो मर जाएगा।

पिता की तरह ही उन्हे बिमल रॉय से स्नेह मिला। एक दिन उन्होंने भी बिस्तर पकड़ लिया। कैंसर के शिकंजे में कस गए। गुलज़ार उन्हे तड़पते देख बर्दाश्त नहीं कर पाते थे। बस उनके साथ बेटे का फ़र्ज़ निभाते रहे। रात-रात भर उनके पास बैठे रहते। बिमल राय को उनकी पसंदीदा किताब 'अमृत कुंभ' पढ़ कर सुनाते रहते। आख़िर एक दिन उनकी भी जिंदगी की डोर कट गई। पिता से आखिरी वक्त में न मिल सके गुलज़ार ने ही मानस-पितृ बिमल राय का तर्पण किया। इससे पिता के चुपचाप चले जाने के दिल का बोझ कुछ हल्का हुआ। वे ख़ामोशियां एक-से-एक खूबसूरत लफ़्ज़ों से तर होने लगीं, आज तक -

बर्फ़ पिघलेगी जब पहाड़ों से -
और वादी से कोहरा सिमटेगा,
बीज अंगड़ाई लेके जागेंगे,
अपनी अलसाई आँखें खोलेंगे
सब्ज़ा बह निकलेगा ढलानों पर,
गौर से देखना बहारों में,
पिछले मौसम के भी निशाँ होंगे,
कोंपलों की उदास आँखों में
आँसुओं की नमी बची होगी।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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