व्हील चेयर की मायूसी से रैंप वॉक की खुशी, यही है रुचिका शर्मा की कामयाबी की कहानी का सबसे दिलचस्प पहलु

एक हादसे ने एक झटके में छीन ली थीं सारी खुशियाँ ... चेहरा बिगड़ गया, हड्डियां टूटीं, उम्मीदों ने भी लगभग तोड़ ही दिया था दम ... माँ की ममता और दोस्तों के प्यार ने जगाया था नया उत्साह ... कोशिश जारी रखीं ,मेहनत नहीं रोकी ... आखिरकार जीत ने किया संघर्ष को सलाम ... मुसीबत के बाद पहले तो बिखरीं, लेकिन मेहनत से निखरीं रुचिका शर्मा ... सबसे बड़ी मुसीबत से उभरने के बाद अब दूसरों की ज़िंदगी निखारने में जुटी हैं ये उद्यमी 

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कभी न कभी, कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में कोई न कोई मुसीबत हर एक की ज़िंदगी में आती है। ये इंसान पर निर्भर करता है कि वो मुसीबत को किस तरह देखता और उससे कैसे निपटता है। जो हार मान लेते हैं, वो अक्सर बिखर जाते है और जो मुसीबतों का डटकर मुकाबला करते है, वे जीत जाते हैं। कहावत मशहूर  है - मुसीबत सब पर आती है, कोई बिखर जाता है, तो कोई निखर जाता है। मुसीबत में निखरने का एक बढ़िया उदाहरण है, हैदराबाद की उद्यमी रुचिका शर्मा की कहानी। ज़िंदगी की सबसे बड़ी मुसीबत आने से पहले रुचिका की ज़िंदगी बहुत खूबसूरत थी। हँसते-खेलते, तरक्की करते, छोटे-बड़े सपनों को साकार करते रुचिका आगे बढ़ रही थीं । ज़िंदगी में खुशियां भी बहुत थी। कम उम्र में ही रुचिका ने "शेफ" के रूप में खूब नाम कमा लिया था। उन दिनों हैदराबाद में पुरुष शेफ तो बहुत थे, लेकिन महिला शेफ बहुत ही कम। रुचिका की लोकप्रियता इतनी ज्यादा थी कि साल 2004 में ही वो 9 टीवी चैनलों पर कुकरी शो होस्ट करती थीं । आलम ये था कि उनकी सहेलियां कहतीं - "हर चैनल पर रूचि दिख रही। चैनल बदलो तो भी रूचि।"

सहेलियां प्यार से उन्हें रूचि बुलाती थीं। नए-नए पकवान बनाकर दूसरों का दिल जीतने की चाह रखने वाले लोग रुचिका के कुकरी शो का बेसब्री से इंतज़ार करते थे। एक दिन माँ ने ऐसे ही रुचिका से कह दिया था - तुम बहुत पॉपुलर हो रही हो। थोड़े शोज़ बंद कर दो वरना नज़र लग जाएगी। 

ऐसी खुशनुमा ज़िंदगी एक दिन अचानक बदल गयी। रुचिका शर्मा एक सड़क हादसे का शिकार हो गईं। हादसा इतना भयानक था कि रुचिका का चेहरा बिगड़ गया। हाथ-पाँव में कई जगह हड्डियां टूटीं। शरीर के कई हिस्सों में गहरे घाव हुए। हकीकत तो ये थीं कि वे  बस
अपनी जान बचा पायी  थीं। रुचिका को वो हादसा कैसे हुआ बिलकुल याद नहीं है। उन्हें इतना याद है कि एक शख्स ने ज़ख़्मी हालत में उन्हें अस्पताल पहुँचाया था और वो बच गयीं। इस एक घटना ने रुचिका की ज़िंदगी पूरी तरह बदल थी। खुशी, आशा, उम्मीदें, सुनहरे सपने सब एक झटके में गायब हो गए और ज़िंदगी को उदासी, मायूसी, निराशा, हताशा, दुःख और पीड़ा ने घेर लिया। हँसते-कूदते हर काम करने वालीं रुचिका की हालत इतनी खराब हो गयी कि चार कदम चलना भी उनके लिए पहाड़ चढ़ने जैसा मुश्किल हो गया। जगह-जगह जाकर लोगों को एक से बढ़कर एक रुचिकर पकवान बनाना सिखाने वाली रुचिका की ज़िंदगी बेड और व्हील चेयर तक सिमट गयी। ये हादसा उस समय हुआ था, जब रुचिका इंडियन स्कूल ऑफ़ बिज़नेस से कामयाब उद्यमी बनने के फॉर्मूले सीख रही थीं। उन्हें इस नामचीन शिक्षा संस्थान में गोल्ड़मैन सच्स कोर्स में दाखिल मिल गया था। ये एक स्कॉलरशिप प्रोग्राम था। इस प्रोग्राम में फर्स्ट टर्म के ख़त्म होने पर विद्यार्थियों को मेंटरशिप के लिए बीस दिन का समय दिया गया था। इसी दौरान जब एक दिन रुचिका अपने कुछ रिश्तेदारों को हैदराबाद एयरपोर्ट पर रिसीव कर वापस लौट रही थीं, तब आउटर रिंग रोड पर ये हादसा हुआ था। 


जीवन के उस सबसे कठोर और चुनौती भरे दिनों के बारे में बताते हुए रुचिका शर्मा ने कहा,"मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मेरे साथ ऐसा भी हो सकता है। उस हादसे ने मुझे पूरी तरह से हिलाकर रख दिया था। मुझे लगा कि मैं कभी भी इससे उभर नहीं पाऊँगी।" उस सड़क हादसे का रुचिका के मन-मस्तिष्क पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा था कि वे डिप्रेशन में चली गयी थीं। उनका मूड मिनट-मिनट पर बदलता। उनके मूड स्विंग की समस्या से घरवाले और सभी दोस्त परेशान रहने लगे थे।

रुचिका ने बताया कि वह हिम्मत हार चूँकि थीं, लेकिन उनकी माँ ने हिम्मत नहीं हारी। माँ ने अपनी कोशिश जारी रखी। माँ रुचिका को प्रेरणा देने वाली कहानियाँ सुनाती। उम्मीद और उत्साह जगाने वाली बातें कहती। माँ ने रुचिका को मैडिटेशन की किताबें भी लाकर दीं ताकि उन्हें पढ़कर वे अपना ध्यान सिर्फ और सिर्फ स्वास्थ-लाभ पर लगा सकें। माँ ने रुचिका को आध्यात्म से भी जोड़ा। धीरे-धीरे ही सही माँ और रुचिका के दूसरे शुभ-चिंतकों की कोशिशें कामयाब होने लगी। सड़क हादसे से हुए ज़ख्मों से उबरने के लिए रुचिका को कई सारे ऑपेरशन करवाने पड़े। रुचिका के पाँव में पांच इंच का स्क्रू भी इम्प्लांट करना पड़ा। चूँकि हादसे में चेहरा भी काफी बिगड़ गया था, रुचिका ने वही पुराना साफ़-सुथरा और सुन्दर चेहरा पाने ने लिए फैशियल योगा का सहारा लिया। योगा से रुचिका को खूब मदद मिली। गहरे ज़ख्मों, गन्दी खरोशों से दागदार हुए चहरे पर योगा की वजह से रौनक और ताज़गी फिर से लौट आयी। मेहनत रंग लाई। माँ, दूसरे परिवारवालों, शुभचिंतकों, दोस्तों और खुद की मेहनत रंग लाई थी। आखिर रुचिका ने कामयाबी हासिल कर ही ली। व्हील चेयर से मुक्ति मिली। ज़ख्म सूख गए। दर्द दूर हुआ। रंग-रूप बदला। चेहरा निखरा और ज़िन्दगी ने फिर से करवट ली और फिर से नयी उम्मीदें जगी। सुनहरे सपने संजोए जाने लगे। 

हादसे से तन-मन को हुए नुकसान से उभरने के बाद रुचिका ने फिर से तरक्की की राह पकड़ी। सपनों को साकार करने में जी-जान लगा दी। खास बात तो ये भी कि रुचिका ने उन बड़े सपनों को भी साकार किया, जिन्हें पूरा करने से उनके घरवालों ने ही उन्हें कभी रोका था। रुचिका अपने पढ़ाई के दिनों से ही मॉडल बनना चाहती थीं। उनका सपना सौंदर्य प्रतियोगियताओं में हिस्सा लेना और अपने हुनर से उन्हें जीतना था। चूँकि परिवार में पहले कभी भी ऐसा कुछ नहीं हुआ था और परिवार परम्परावादी था। रुचिका का सपना पूरा नहीं हो पाया था लेकिन , हादसे से उभरने के बाद रुचिका ने मन बना लिया था कि वे सौंदर्य प्रतियोगिता में हिस्सा लेंगी। और, वो दिन आ भी गया जब उनका सपना पूरा हुआ। रुचिका शर्मा एक दिन इंटरनेट ब्राउज कर रही थीं तब उन्होंने "मिसेस इंडिया" प्रतियोगिता के बारे में पढ़ा। फ़ौरन उन्होंने अपना नाम और आवदेन भेज दिया। वे सेलेक्ट भी हो गयीं। रुचिका ने प्रतियोगिता में हिस्सा लिया। वे प्रतियोगिता का सबसे बड़ा खिताब तो जीत नहीं पाईं, लेकिन उन्हें उनके हुनर और उनकी ख़ूबसूरती के लिए मिसेस इंडिया -पॉपुलर के खिताब से नवाज़ा गया। ये खिताब उनके जीवन में नयी खुशियां और उम्मीदें लेकर आया। उन्होंने इसके बाद भी कुछ सौंदर्य प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया और सभी को खूब प्रभावित किया। रुचिका मिसेस इंडिया हैदराबाद इंटरनेशनल और मिसेस साउथ एशिया का खिताब भी अपने नाम कर चुकी हैं।

ये पूछे जाने पर कि परम्परावादी परिवार होने के बाद भी वे कैसे अपने परिजनों से सौंदर्य प्रतियोगिता में हिस्सा लेने की अनुमति ले पाई थीं , इस सवाल के जवाब में रुचिका ने एक दिलचस्प किस्सा सुनाया,

" जब मैं हादसे का शिकार हुई तब मैं बहुत दुखी थी। निराश और हताश। मेरी माँ मुझे हौसला देने की कोशिश करती। मैं माँ की बातें नहीं मानती थी। अपनी बातें मनवाने के लिए मॉं ने मुझे इक भरोसा दिया था। उन्होंने कहा था कि अगर मैं उनकी बात मान कर जल्दी ठीक हो जाती हूँ तो वे मुझे कोई भी काम करने से नहीं रोकेंगी। मैंने माँ से वादा लिया था कि ठीक होने के बाद मैं जो चाहूँ वही करूंगी।"

इसके बाद क्या था, जब रुचिका ने फैसला किया कि वे सौंदर्य प्रतियोगिता में हिस्सा लेंगी, तब उन्होंने अपनी माँ को उनका वो वचन याद दिलाया। माँ ने फिर रुचिका को कभी कोई काम करने से नहीं रोका, लेकिन रुकावटें कहीं और से दस्तक दे रही थीं।  जिस डाक्टर ने रुचिका की टूटी हड्डियों को ठीक करने के लिए ऑपरेशन किये थे, उन्होंने ने भी सख्त हिदायत दी थी कि रुचिका को हाई हील की सैंडल और चप्पलें नहीं पहननी चाहिए। चूंकि सौंदर्य प्रतियोगिता के लिए, ख़ास तौर पर रैंप वॉक के समय इन्हें पहनना ज़रूरी था , रुचिका ने जोखिम उठाकर हाई हील की सैंडल और चप्पलें पहनीं। 

हादसे से उबरने के बाद रुचिका ने अपने जीवन में कई नए रंग भरे। जीवन को ख़ूबसूरती से निखारा। वो सामजिक कार्यकर्ता बनी। उद्यमी का रूप धारण दिया। महिलाओं के उत्थान के लिए "बीइंग वुमन" नाम की एक गैर सरकारी संस्था खोली। इस संस्था के ज़रिये वे गरीब और ज़रूरतमंद महिलाओं की आर्थिक और सामाजिक स्थिति सुधारने और महिलाओं और आत्म-निर्भर बनाने की कोशिशों में जुटी हुई हैं।

ये पूछे जाने पर कि संस्था शुरू करने और समाजिक कार्यकर्त्ता बनने का विचार उनके मन में कब आया, रुचिका ने बताया कि जब वो लड़कियों और महिलाओं को पकवान बनाना सिखा रही थीं, तब उन्होंने कई दिल दहला देने वाले किस्से सुने। कई महिलाओं को उनके पति ने ये कहकर तलाक दे दिया था कि उन्हें खाना बनाना सही तरह से नहीं आता था। कुछ पति इस वजह से अपनी पत्नी से नाराज़ रहते थे कि वे सिर्फ घर-परिवार का काम कर सकती हैं और दौलत कमाने में उनकी मदद नहीं कर सकतीं। रुचिका के मुताबिक, उन्हें जल्द ही इस बात का अहसास हो गया कि कई महिलाएं आत्म-निर्भर नहीं हैं। इतना ही नहीं फाइनेंसियल फ्रीडम न होने की वजह से महिलाएं अपने फैसले नहीं ले पा रही हैं। कई मायनों में वे दूसरों के हाथों बंधी हुई हैं। उन्हें आज़ादी से काम करने की छूट नहीं है।

इन्हीं हालत को देख-समझ कर रुचिका ने फैसला किया कि वे महिलाओं को आत्म-निर्भर बनाने के लिए खूब काम करेंगी। रुचिका अपनी संस्था के ज़रिये अब गृहणी महिलाओं को घर में रहते हुए ही घरेलू-उद्योग चलाना सिखा रही हैं। रुचिका महिलाओं को केक, चॉकलेट, बिस्कुट, कैंडल जैसी चीज़ें बनाना सिखा रही हैं। रुचिका एक कुकिंग स्कूल भी चला रही हैं। जहाँ वे लड़कियों और महिलाओं को तरह तरह से लज़ीज़ पकवान बनना सिखा रही हैं। इस स्कूल से सीख कर कई लडकियां और महिलाएं "शेफ" भी बन रही हैं। रुचिका की गिनती अब हैदराबाद ही नहीं बल्कि भारत के मशहूर शेफों, सामजिक कार्यकर्ताओं और उद्यमियों में होती है।

हादसे के बाद रुचिका की बड़ी कामयाबियों में एक ये भी है कि वे अपना नाम गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज़ करवा पाईं। रुचिका ने फैशियल योगा में ये कारनामा हासिल किया। रुचिका शर्मा ने फैशियल योगा की सबसे बड़ी क्लास का आयोजन कर नया रिकार्ड अपने नाम किया। इस क्लास में 1961 लोगों ने हिस्सा लिया था और इन सब ने मिलकर रुचिका के नेतृत्व में थाईलैंड के लोगों का रिकार्ड तोड़ा।

 

इस कामयाबी को हासिल करने के पीछे की कहानी बताते हुए रुचिका ने कहा,

" मुझे फैशियल योगा से बहुत फायदा मिला था। मेरा बिगड़ा चेहरा योगा की वजह से सुधरा था। इसके बाद मैंने फैशियल योगा पर खूब रिसर्च की। मैंने  फैशियल योगा के सबसे बड़े गुरु डेनियल कॉलिंस से भी सीखा। जब मैं योगा के बारे में जानकारियां हासिल कर रही थी, तब मुझे पता चला कि योगा का जन्म भारत में हुआ है , लेकिन जितने रिकार्ड गिनीज़ बुक में दर्ज़ हैं वे दूसरे देशों के लोगों के नाम पर हैं। कोई रिकार्ड जापान ने नाम है तो कोई चीन , तो कोई और थाईलैंड या फिर कोई और देश। मैंने ठान ली कि योगा में एक रिकार्ड भारत के नाम होना चाहिए। और, मैंने ऐसा करने में कामयाबी हासिल कर ली। लेकिन, ये रिकार्ड सिर्फ मेरा अकेले का नहीं है बल्कि उन सबका है जिन्होंने उस क्लास में हिस्सा लिया था।

इन्हीं बड़ी कामयाबियों, अपने बुलंद हौसलों, नेक विचारों और उद्यमिता की वजह से रुचिका शर्मा आज हज़ारों लोगों के लिए आदर्श महिला हैं,  प्रेरणा की बड़ी स्रोत हैं।

महिलाओं को सलाह देते हुए वे कहती हैं," मन को कभी छोटा नहीं करना चाहिए। सब एक जैसे ही हैं। सब लोग एक जैसा काम कर सकते हैं। हमेशा पॉजिटिव रहना चाहिए। आसपास बहुत सारी नेगेटिव चीज़ें होती हैं। नेगेटिव चीज़ों से बचना चाहिए और सिर्फ पॉजिटिव चीज़ों को अपना लेना चाहिए। नेवर गिव अप - यही कहूंगी सभी से।

एक सवाल के जवाब में रुचिका ने बताया कि जब हादसे का शिकार होने के बाद वे घर लौटी थीं , तब उनका लड़का भी उन्हें देखकर डर गया था। जब कभी रुचिका घर लौटती थीं तब उनका लड़का उनके गले लग जाता था लेकिन,इस बार वो गले नहीं लगा। ये देखकर रुचिका को बड़ा सदमा पहुंचा। चूँकि वे व्हील चेयर पर भी थीं वे खुद भी जाकर अपने बेटे को गले नहीं लगा सकती थीं। हादसे ने उन्हें उनके बेटे से भी दूर कर दिया था। इस घटना से कुछ इस तरह रुचिका हिल गयीं कि उन्होंने ठान ली कि अपने बच्चे को वापिस पाने और उसके साथ हँसते-खेलते बाकी जीवन बिताने के लिए ही वे ठीक होंगी। इसके बाद उन्होंने ऑपरेशन के दर्द सहे, पीड़ा झेली, पसीना बहाया, मेहनत की, बहुत कुछ त्याग किया और आखिरकार जीवन निखार कर अपने बेटे और कामयाबी को अपना बना लिया। 

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Dr Arvind Yadav is Managing Editor (Indian Languages) in YourStory. He is a prolific writer and television editor. He is an avid traveler and also a crusader for freedom of press. In last 20 years he has travelled across India and covered important political and social activities. From 1999 to 2014 he has covered all assembly and Parliamentary elections in South India. Apart from double Masters Degree he did his doctorate in Modern Hindi criticism. He is also armed with PG Diploma in Media Laws and Psychological Counseling . Dr Yadav has work experience from AajTak/Headlines Today, IBN 7 to TV9 news network. He was instrumental in establishing India’s first end to end HD news channel – Sakshi TV.

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