IIT कानपुर ने डेवलप की कंडक्टिव इंक, तकनीक को मिलेगा बढ़ावा

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अभी आप अपने फोन या टैबलेट जैसी डिवाइस को चार्ज करने के लिए कोई बड़ा चार्जर अपने साथ रखते होंगे। कई बार तो इसे साथ में लाने और ले जाने में भी समस्या आती है। लेकिन आईआईटी कानपुर के कुछ होनहार ऐसी तकनीक पर शोध कर रहे हैं जिससे इको फ्रैंडली चार्जर तैयार किया जा सकता है।

साभार: ट्विटर
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इस चार्जर को न केवल मोड़कर अपनी जेब में रखा जा सकेगा बल्कि खराब होने के बाद ये पर्यावरण को नुकसान भी नहीं पहुंचाएंगे। मेक इन इंडिया इनिशिएटिव के तहत ये रिसर्च चल रही है।

आईआईटी, कानपुर के नेशनल सेंटर फॉर फ्लेक्सिबल इलेक्ट्रॉनिक्स के इंजिनियर ऐसे प्रॉजेक्ट पर काम कर रहे हैं जिससे कंडक्टर इंक तकनीक के जरिए किसी भी स्क्रीन प्रिंटर की मदद से कागज या प्लास्टिक के टुकड़े पर इलेक्ट्रॉनिक सर्किट प्रिंट किए जा सकेंगे। इंक में चांदी की जगह तांबे के नैनोपार्टिकल्स होंगे।

अभी आप अपने फोन या टैबलेट जैसी डिवाइस को चार्ज करने के लिए कोई बड़ा चार्जर अपने साथ रखते होंगे। कई बार तो इसे साथ में लाने और ले जाने में भी समस्या आती है। लेकिन आईआईटी कानपुर के कुछ होनहार ऐसी तकनीक पर शोध कर रहे हैं जिससे इको फ्रैंडली चार्जर तैयार किया जा सकता है। इस चार्जर को न केवल मोड़कर अपनी जेब में रखा जा सकेगा बल्कि खराब होने के बाद ये पर्यावरण को नुकसान भी नहीं पहुंचाएंगे। मेक इन इंडिया इनिशिएटिव के तहत ये रिसर्च चल रहा है।

आईआईटी, कानपुर के नैशनल सेंटर फॉर फ्लेक्सिबल इलेक्ट्रॉनिक्स के इंजिनियर ऐसे प्रॉजेक्ट पर काम कर रहे हैं जिससे कंडक्टर इंक तकनीक के जरिए किसी भी स्क्रीन प्रिंटर की मदद से कागज या प्लास्टिक के टुकड़े पर इलेक्ट्रॉनिक सर्किट प्रिंट किए जा सकेंगे। इंक में चांदी की जगह तांबे के नैनोपार्टिकल्स होंगे। अभी तक ऐसी सर्किट बनाने के लिए हैवी मशीनें और अधिक संसाधनों की आवश्यकता पड़ती है। हर एक इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसों में इलेक्ट्रॉनिक सर्किट का इस्तेमाल किया जाता है। जिसमें सिलिकॉन की चिप लगी होती है।

इन चिपों का एक नुकसान ये है कि इन्हें बड़े डिस्प्ले स्क्रीन के लिए इस्तेमाल नहीं किया सकता। लेकिन इंडक्टर इंक से ये समस्या आसानी से हल की जा सकेगी। कंडक्टिव इंक का प्रचलन दुनियाभर के इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में हो रहा है। एचटीएफ मार्केट रिलीज रिपोर्ट के मुताबिक 2017-2020 के दौरान यह तकनीक 3 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। 2023 तक इसके 4.3 बिलियन डॉलर हो जाने की उम्मीद है। कंडक्टिव इंक का इस्तेमाल ऑटोमेटिव इंडस्ट्री और स्मार्ट पैकेजिंग ऐप्लिकेशन में हो रहा है।

फूड और मेडिसिन प्रॉडक्ट की पैकेजिंग के लिए यह सबसे आसान और सस्ता विकल्प है। इसे एफएमसीजी उत्पाद के अंदर देखा जा रहा है। इस इंक में कॉर्बन या ग्रेफीम बेस के जरिए फ्लेक्सिबल प्रिंटिंग की जा सकती है। ज्यादा बेहतर सुचालकता के लिए कार्बन की जगह कंडक्टिव सिल्वर इंक का प्रयोग किया जाता है। हालांकि सिल्वर के मंहगे और सीमित होने के कारण कार्बन को ही प्राथमिकता देते हैं। इसके जरिए बायोसेंसर, डिस्प्ले, फोटोवोल्टैइक, मेंब्रेन स्विच, रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडिफिकेशन और कई अन्य उत्पादों पर प्रिंटिंग हो सकेगी।

ये सारे प्रॉडक्ट कंडक्टिव इंक की वजह से लचीले हो सकेंगे और फिर लचीले उत्पादों की परिकल्पना पूरी तरह इसी पर आधारित है। टाइम्स ऑफ इंडिया से बात करते हुए प्रफेसर वाईएन मोहपात्रा ने बताया कि कागज या प्लास्टिक के टुकड़े पर साधारण प्रिंटर की मदद से इलेक्ट्रॉनिक सर्किट प्रिंट किए जा सकेंगे। फ्लेक्स-ई सेंटर के सीनियर रिसर्च इंजिनियर डॉ आशीष के मुताबिक, मेक-इन-इंडिया के तहत इस स्याही से गली-गली होने वाली स्क्रीन प्रिंटिंग से भी सर्किट तैयार हो सकेंगे। इनमें सुचालकता होगी। अभी इलेक्ट्रॉनिक सर्किट की स्याही में चांदी का प्रयोग होता है। इसकी लागत ज्यादा होती है, लेकिन नई प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी से भविष्य में सस्ते इलेक्ट्रॉनिक्स तैयार होंगे। 

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