अपने रूप-रंग की बजाय अपनी प्रतिभा पर भरोसा करें: ईरा दुबे

अपने प्रति ईमानदार बनें और वो काम करें जो करने की इच्छा हो

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ईरा दुबे आज देश की सबसे प्रतिभाशाली एवं मेधावी युवा कलाकारों में से एक है. “येल स्कूल ऑफ़ ड्रामा” में अपनी पढाई करने के बाद उन्होंने कई फिल्में की हैं जैसे कि "द प्रेजिडेंट इस कमिंग" और "आइशा". वह एक स्थापित थियेटर कलाकार और टेलीविजन प्रस्तोता है. उन्हें ‘9 पार्ट्स ऑफ़ डिजायर’ में उनके यादगार अभिनय के लिए जाना जाता है, जिसमें उन्होंने संगर्षरत इराक की 9 भिन्न महिला का अभिनय किया था. उनके इस अभिनय को बहुत प्रशंसा मिली थी.

ईरा ने भारतीय थियेटर उद्योग पर और इस उद्योग में औरत होने का क्या मायने है, इस पर बात की.

ईरा बताती है कि मैं हमेशा माँ के पीछे पीछे रहती और एक तरह से मैं अपनी माँ की "पूंछ" बनी रहती थी. जब मैं ६-७ साल की थी तभी से मैं मंच के पीछे टिकी रहती और सहायता करती. मैं आज जो भी हूँ वो थियेटर की वजह से हूँ. मेरी माँ और मेरी दोनों चाची थियेटर से जुडी हुयी थी. और लोग हमारा मजाक बनाया करते थे कि हम एक "नौटंकी" परिवार हैं. तो थियेटर और अभिनय मेरे व्यक्तित्व में कूट कूट कर भरा है.

मैं समझती हूँ कि यह एक प्रक्रिया है. बहुत से युवा थियेटर में रूचि रखते हैं. और कला के प्रति उनका समर्पण देखने लायक है.

मै समझती हूँ सामान्यतः दर्शक थियेटर का सहयोग करने लगें है. एक दर्शक, जो कि आप से जुड़ता है और पूरे इस अनुभव के दौरान आपके साथ रहत है, के इस जुड़ाव से बढ़ कर कुछ भी नहीं है, क्योंकि थियेटर का मतलब, शब्द, कलाकार और दर्शक होता है. बिना दर्शक के नाटक और कलाकार का कोई मायने नहीं है. और यह देख कर ख़ुशी होती है कि थियेटर में बहुत से मौलिक कार्य हो रहे हैं, बहुत ताजगी और जीवन है आज के थियेटर में. और अतुल कुमार और आकाश खुराना जैसे कलाकारों का समर्पण इसे नयी ऊंचाई तक पहुंचा रहा है.

ईरा दुबे
ईरा दुबे

इस में मैं अगर कोई कमी देखती हूँ तो वो है, अध्यापन. इस के पर्याप्त विद्यालय नहीं है. मैं जेहन मानेकशॉ की प्रशंसा करती हूँ कि उन्होंने एक अभिनय विद्यालय "थियेटर प्रोफेसनल्स" की शुरुआत की है. और इसके लिए स्थान का न होना भी एक समस्या है. मुंबई में एक अच्छे स्थान का न होना एक गंभीर समस्या है.

आज अभिनेताओं के लिए अनेक अवसर है. बस बाहर निकल कर उन्हें हासिल करने का हुनर आना चाहिए.

अभिनय का एक अर्थशास्त्र भी है. थियेटर के एक कलाकार के रूप में हम जानते है कि केवल थियेटर पर आश्रित होकर नहीं रहा जा सकता है. एक कलाकार के नाते हमें अपने पसंद के और व्यावसायिक सफलता के नाटकों के बीच संतुलन बनाना होता है. आप को यह समझना होता है कि आप इसे क्यों और किन दर्शकों के लिए कर रहे है.

मेरे एकल अभिनय वाले नाटक "9 पार्ट्स ऑफ़ डिजायर" का मंचन मैंने सितम्बर में दक्षिणी अफ्रीका में करने वाली हूँ. यह 9 मुस्लिम महिलाओं के विषय पर है. प्रभावशाली होने के साथ ही यह बहुत अत्यंत गतिमान भी है. और वास्तव में यह मेरा एक बहुत ही महत्वपूर्ण अभिनय है. इसकी पटकथा भी काफी नाटकीय है और बहुत सधे ढंग से लिखी गयी है.

ईरा दुबे
ईरा दुबे

इसके लिए मुझे बहुत अच्छी समीक्षा मिली है.और मेरे हर मंचन के लिए दर्शकों ने खड़े होकर मेरा अभिनंदन किया है. व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए यह सबसे चुनौतीपूर्ण कार्य रहा है. वास्तव में यह सबसे सशक्त और संतुष्ट करने वाला अनुभव था. मेरे लिए यह महत्वपूर्ण था कि मैं इन सभी महिलाओं और इराक के विषय में अच्छे से जान सकूँ. वहां की संस्कृति एकदम भिन्न होने के साथ ही इराक मेरे लिए एकदम अजनबी देश था. मुझे वहां के सामाजिक और राजनैतिक इतिहास को समझना था. इसके लिए मैंने बहुत शोध किये जिस से की मुझे इन चरित्रों को जी पाने में बहुत मदद मिली.

मुझे इस में इसकी लेखक हीथर का बहुत सहयोग मिला. मैंने उन से पत्र लिख कर कई सवाल पूछे. मैं जब इसकी पटकथा पढ़ रही थी तो मेरे आवाज़ में कई रोचक चींजें हुयी. मेरी आवाज और शरीर से ये चरित्र जिन्दा हो रहे थे. निरंतर और गहन अभ्यास ने भी इसमें मेरी मदद की. उदहारण के लिए, अमल एक जीवंत मोटी औरत है जिसकी मासूमियत आकर्षक और हास्यास्पद है. तो जैसे जैसे मुझे इन चरित्रों के "सुर" मिलते गए, अभिनय मेरे लिए आसान होता गया.मेरे पास इन पात्रों के संदर्भ के लिए बहुत कुछ है.

ईरा दुबे
ईरा दुबे

और आखिर में भारतीय दर्शक इन पात्रों से जुड़ सके क्योंकि वो वास्तविक हैं, वो हँसते है, वो सांस लेते है, उनका भी दिल टूटता है और वो भी पीड़ा से गुजरते है. और मेरा मानना है कि सब कुछ के बाद अच्छा काम सार्वभौमिक होना चाहिए और दर्शक को बांधे रखने में सक्षम होना चाहिए

लेकिन गड़बड़ कहाँ हो रही है? मैं समझती हूँ अनुभव के साथ आप इसे छिपा पाने में कामयाब हो जाते हो. कही प्रवेश में गड़बड़ी, कभी संवाद की किसी पंक्ति को टटोलना आप इन सब को अपने अभिनय का हिस्सा बना देते हैं.उदहारण के लिए आपको जुकाम है या आप नर्वस है तो आप अपने अनुभव से इनका उपयोग अपने अभिनय में कर सकतें है. निश्चय ही मेरे साथ ऐसा कभी नहीं हुआ लेकिन मुझे याद है कि एक बार एक नाटक के दौरान कोई पात्र अपने संवाद की कोई पंक्ति भूल गया और वहां एक पल के लिए मौन की एक भयानक ख़ामोशी छा गयी और जब ऐसा हुआ तो जाहिर है कि दर्शकों को इस बारे में पता है. लेकिन आश्चर्यजनक रूप से दर्शकों की हमदर्दी आपके साथ है.

एक कलाकार के रूप में मेरा ध्यान हमेशा से सच ढूँढने या सच्चा होने पर रहा है. यह बहत सरल लगता है लेकिन वास्तव में यह बहुत कठिन है. आपका अनुभव जैसे जैसे बढ़ता जाता है वैसे वैसे आप अधिक यन्त्रीय होते जाते हैं, और मैं इस तरह की कलाकार कभी नहीं बनाना चाहूंगी. आपकी संवाद अभिव्यक्ति, मंच पर अभिनय, अनुभव आदि है लईकिन यदि आप यन्त्रीय हो जाते हैं तो यह ठीक नहीं है. मैं समझती हूँ इन्ही अवसरों पर मेरे प्रशिक्षण ने मेरी मदद की.

मै किसी विशेष विद्यालय या अभिनय में विश्वास नहीं करती हूँ. मैं मंच पर अभिनय करती हुयी बड़ी हुयी हूँ. लेकिन मेरी माँ अभिनय के पाठ्यक्रम से प्रभावित थी और वह चाहती थी कि मैं किसी प्रतिष्ठित संस्थान से अभिनय का प्रशिक्षण लूँ. मैं बहुत आश्वस्त नहीं थी कि मुझे किसी नाट्य विद्यालय जाना चाहिए. और सोच रही थी कि भारत लौटने पर मुझे इस से क्या फायदा मिलेगा. यदि मैं बाहर विदेश में ही रहने का निश्चय करती तो शायद मुझे इस से जरूर मदद मिलती लेकिन इसको लेकर मैं बहुत निश्चित नहीं थी.

लेकिन फिर मैं विदेश गयी. और जानबूझ कर स्नातक स्तर पर अभिनय की पढाई करने का चुनाव किया. और वहां पर मैं ने विभिन्न विचारधाराएं सीखीं- चेखव से लेकर स्टेला एडलर या ली स्टार्सबर्ग को मैंने पढ़ा. लेकिन मुझे इस बात का एहसास हुआ कि वो सभी अपने अपने तरीकों के माहिर हैं और अपनी अपनी पद्धति के उत्तरोत्तर सुधार का प्रयास करते रहें थे. और यही बात किसी कलाकार को अद्वितीय बनाती है.मैं सदैव ही मेरील स्ट्रीप की प्रशंसक रही हूँ, क्योंकि अपनी पेशेवर जीवन के ज्यादातर समय वो पूर्ण प्रवीणता के साथ अभिनय करती रही.

यह एक अत्यंत पुरुष केंद्रित क्षेत्र है. लेकिन अब यह बदल रहा है. विद्या बालन जैसी अभिनेत्रियां अब इसमें बदलाव लाने का प्रयास कर रही है. मेरी माँ भी इस क्षेत्र की एक सफल अभिनेत्री का उदहारण हैं. मेरी इस क्षेत्र में आने वाली महिलाओं को सलाह है कि आप लगे रहिये. हमारे पास भी इस में देने के लिए पुरुषों के बराबर ही प्रतिभा है. मुझे लगता है कि फिल्म जगत को भी रूप-रंग की जगह प्रतिभा को महत्व देना चाहिए. एक बात की मैं सराहना करती हूं कि बहुत से कलाकार ऐसे हैं जो देखने में तो बहुत अच्छे नहीं हैं लेकिन वो विलक्षण अभिनेता या अभिनेत्री है. हमें यहाँ इस चीज को प्रोत्साहित करना चाहिए.

मुझे लगता है युवा महिलाओं को अपनी कला को गंभीरता से लेना चाहिए और कोई समझौता नहीं करना चाहिए. सुपर स्टार बनने के लिए अपना ध्यान केंद्रित करने के बजाय वो अपने स्वयं के प्रति ईमानदार बने और वो काम करें जो उन्हें करने की इच्छा हो. कम से कम मेरे लिए तो यही महत्वपूर्ण है.

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