स्टेम सेल्स थेरेपी की मदद से हो सकता हैं लाइलाज बीमारियों का इलाज, जानें कैसे

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आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने स्टेम सेल नामक जिस थैरेपी को इजाद किया है वह एक ऐसी थैरेपी है, जिससे अब बहुत से लाइलाज रोगों से ग्रस्त मरीजों का इलाज संभव हो गया है।

डॉ. गीता सर्राफ
डॉ. गीता सर्राफ
ह्यूमन एंब्रियोनिक स्टेम सेल्स यानी एच ई एस सी को अलग करने के लिए कृत्रिम परिवेश में अंडे और शुक्राणु का निषेचन यानी इनविट्रोफर्टिलाइजेशन(आईवीएफ) करवाया जाता है। इस प्रकार अनेक भू्रण यानी एंब्रिया जेनरेट हो जाते हैं।

मेडिकल साइंस जिंदगी और मौत के बीच इंसान को बचाने के लिए लगातार संघर्ष कर रहा है। चिकित्सा विज्ञान न सिर्फ उन बीमारियों की खोज में लगा हुआ है जिन से वह अब तक अनजान रहा है, बल्कि मौत को पराजित करने के प्रयासों पर भी कार्य कर रहा है। आधुनिक चिकित्साविज्ञान ने स्टेम सेल नामक जिस थैरेपी का जो इजाद किया है वह एक ऐसा ही थैरेपी है जिससे अब बहुत से लाइलाज रोगों से ग्रस्त मरीजों का भी इलाज संभव हो गया है। दिल्ली स्थित न्यूटेकमैडीवल्र्ड की डायरेक्टर डॉ. गीता सर्राफ बता रही हैं स्टेम सेल थेरेपी की बारीकियां।

आखिर यह स्टेम सेल हैं क्या? तो वास्तव में स्टेम सेल का रिश्ता जीवन से है और जब तक यह बनता रहता है तब तक ही जीवन कायम रहता है। शरीर की रोगग्रस्त एवं क्षतिग्रस्त कोशिकाओं का स्थान लेकर ये स्टेमसेल उनमें नए जीवन का संचार करते हैं। दरअसल अब इस सेल थैरेपी को नई तकनीकों का समूह भी कहा जा सकता है। वास्तव में स्टेम सेल तीन प्रकार के होते हैं। भ्रूण स्टेम सेल (एंब्रियोनिक स्टेम सेल्स), वयस्क स्टेम सेल (एडल्ट स्टेम सेल) व कार्ड स्टेम सेल। भ्रूण स्टेम सेल यानी (एचइएचसी) ह्यूमन एंब्रियोनिक स्टेम सेल्स जिसमे डीएनए को भी शामिल कर लिया जाता है। फिर लैब में स्टेम सेल लाइन तकनीक से इंजेक्शन तैयार कर लिए जाते हैं। इसे बीमारी के अनुसार या रेडी टू यूज भी तैयार किया जा सकता है। इसे मरीज के जरूरतों के अनुसार बनाया जा सकता है। इसमे मरीज के डीएनए से क्रांसमैचिंग नहीं करनी पड़ती और सबसे बड़ी बात है कि इसका कोई साइडइफैक्ट भी अभी तक नहीं देख गया है।

क्या है ह्यूमन एंब्रियोनिक स्टेम सेल

एंब्रियोनिक स्टेम सेल्स, यह बेहद क्षमता वाले जनन कोशिका(स्टेम सेल) होते हैं। मानव शरीर में से स्टेम सेल्स में प्लासेंटा सेल्स को छोड कर बाकि सभी कोशिकाओं के रूप में विकसित करने की क्षमता रखते हैं। इनका आकार लगभग 14 माइक्रोन होता है। ह्यूमन एंब्रियो यानी मानव भ्रूरण निषेचन यानी फर्टिलाइजेशन के 4-5 पांच दिन के बाद ब्लास्टोसिस्ट अवस्था में पहुंचती है। इस अवस्था में भू्रण में केवल 50 से 150 कोशिकाएं होती हैं। भ्रूण के इसी अवस्था में उससे इनर सेल मास को अलग किया जाता है और लैब में इससे स्टेम सेल तैयार किये जाते है। लेकिन अब नई तकनिक के द्धारा एंब्रियो के इतना विकसित होने से पहले भी स्टेम से लाइंस बनाई जा सकती हैं।

ऐसे अलग किए जाते हैं ह्यूमन एंब्रियोनिक स्टेम सेल्स

ह्यूमन एंब्रियोनिक स्टेम सेल्स यानी एच ई एस सी को अलग करने के लिए कृत्रिम परिवेश में अंडे और शुक्राणु का निषेचन यानी इनविट्रोफर्टिलाइजेशन(आईवीएफ) करवाया जाता है। इस प्रकार अनेक भू्रण यानी एंब्रिया जेनरेट हो जाते हैं। आवश्यकता से ज्यादा जेनरेट करवाए गए इन एंब्रियो का कोई चिकित्सकीय उपयोग नहीं होता अक्सर इन्हें प्रयोगशाला में बेकार फेंक दिया जाता है। लेकिन इस थैरेपी के आ जाने से अब इसे स्टेम सेल में बदल कर कई लाइलाज बीमारियों का इलाज किया जा सकता है। इसके अलावा ट्रोफेक्टोडर्म, विशिष्ट प्रकार के सेल्स होते हैं, जिनसे अतिरिक्त एंब्रियोनिक टिश्यू को अलग किया जा सकता है। इस इनर सेलमास यानी आई सी एम को मेकेनिकल डिसेक्शन, लेजर डिसेक्शन या इम्युनोसर्जरी के माध्यम से अलग किया जाता है।आई सी एम को अलग करने के बाद इन सेल्स को एक सुरक्षित माध्यम में कल्चर किया जाता है। इसके पश्चात ही इसे रोगी के शरीर में ट्रांसप्लांट या इंजेक्ट किया जाता है।

किन-किन बीमारियों में है लाभदायक

अपनी प्लास्टिसिटी और स्वयं से पुननिर्माण यानी सेल्स रीन्यूअल की असीमित क्षमता होने के कारण ही एंब्रियोनिक स्टेम सेल्स का इस्तेमाल कई लाइलाज बीमारियों के लिए किया जाता है। इस थैरेपी का इस्तेमाल चोट लगने के बाद और असाध्य बीमारियों के उपचार के लिए रिजेनरेटिवमेडिसिन और टिश्सू रिप्लेसमेंट के लिए किया जाता है। आज इन स्टेम सेल लाइंस का इस्तेमाल स्पाइनल काॅर्ड इंजुरी, सेरेब्रल पाल्सी, पर्किंसंस डिजीज, मल्टीपल स्कलेरोसिस, विजुअल इंपेयरमेंट(आखों की बिमारी), डचनेमस्कुलरडिसट्राॅफी, ब्रेनइंजरी, डायबीटिज, हेपेटाइटिस, डीएनए डैमेज रिपेयर सहित कई असाध्य बीमारियों को दूर करने के लिए किया जाता है। इसके लिए इन सेल लाइंस को रोगी के षरीर में प्रत्यारोपित या इंजेक्ट किया जाता है।

हमारे देश में पिछले कई वर्षों से उपरोक्त विकारों को दूर करने के लिए इन स्टेम सेल लाइंस का इस्तेमाल किया जा रहा है। हमारे देश में पहली बार 31 मार्च 2002 को कॉर्टिकाबेसलडिजेनरेशन के मरीज को एच ई एस सी इंजेक्ट किया गया था। उसके बाद से गंभीर बीमारियों से जूझ रहे कई मरीज अब तक इस थैरेपी का लाभ ले चुके हैं। इस थैरेपी को लेने के बाद बिना किसी खास परेशानी के रोगी में असाधारण सुधार देखने को मिलते हैं।

इतिहास

स्वतंत्र रूप से पहली बार 1981 में चूहे के एंब्रियो से इंब्रियोनिक स्टेम सेल्स को अलग किया दिया गया था। इस काम को दो ग्रुप ने अंजाम दिया था। इसके लिए सबसे पहले कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के जेनेटिक्स डिपार्टमेंट के मार्टिन एवांस व मैथ्यूकउफमैन ने एक नई तकनीक के द्वारा यूट्रस में चूहे के एंब्रियो को कल्चर किया था ताकि सेल्स की संख्या बढ़ सके और इन एंब्रियो से स्टेम सेल्स को अलग किया जा सके। यह रिसर्च जुलाई 1981 में पहली बार प्रकाशित हुआ था। इस के बार कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के एनाटॉमी डिपार्टमेंट की गेल आरमार्टिन ने 1981 के दिसंबर में एंब्रियोनिक स्टेम सेल नाम से अपना पेपर प्रकाशित किया।इस प्रकार पहली एंब्रियोनिक स्टेम सेल टर्म चलन में आया। यह सही है कि अब स्टेम सेल थैरेपी से लाइलाज बीमारियों का इलाज संभव हो गया है।

केवल एक भ्रूण से निकाले गये स्टेम सेल से पूरे विश्व के लोगों का उपचार किया जा सकता है। लकवा, मधुमेह, नर्वस सिस्टम डिसॉर्डर, कार्डियाक मरीज अब स्टेम सेल के रेडी-टू-यूज इंजेक्शनों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसमें कोई क्रास मैचिंग नहीं करनी पड़ती।

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