आज के समय का वो कवि जो नहीं मोहताज किसी परिचय का

गीत और नवगीत में नया कुछ नहीं हो रहा: राजेश जोशी

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देश में प्रकाशकों की संख्या बढ़ी है, उनकी पूंजी बढ़ी है, प्रकाशित होने वाली किताबों की संख्या पहले के बनिस्बत कई गुना ज़्यादा हो चुकी है, लेकिन प्रकाशक प्रोफेशनल नहीं हैं। वह पाठकों की संख्या को उजागर नहीं करना चाहते हैं, क्योंकि उन्हें लेखकों को रॉयल्टी देनी पड़ेगी। वह पाठकों तक किताब को पहुँचाने के रास्ते में अड़चन बने हुए हैं। अधिकांश किताबों का पेपरबैक संस्करण नहीं छापा जा रहा है। किताब को सस्ता करने और पाठक की पहुँच में लाने के जो प्रयास प्रकाशक, सरकार और मीडिया को करना चाहिए, वो नहीं हो रहे...

राजेश जोशी: फोटो साभार: सोशल मीडिया
राजेश जोशी: फोटो साभार: सोशल मीडिया
बालश्रम के हालात पर लिखी राजेश जोशी की कविता- 'बच्चे काम पर जा रहे हैं, हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यह...' जब भी, जहां कहीं भी पढ़ी-सुनी जाती है, हमारे समय की विद्रूपता को अंदर तक झकझोर जाती है।

राजेश जोशी की कविताएं सिर्फ हिन्दी में ही प्रकाशित नहीं हुई हैं, बल्कि उनकी कविताओं के अनुवाद अंग्रेजी, रूसी और जर्मन में भी हुए हैं। उनकी रचनाओं मे गहरे सामाजिक सरोकार निहित होते हैं।

साहित्य अकादमी समेत अनेक पुरस्कारों से समादृत हिन्दी के शीर्ष कवि-कथाकार राजेश जोशी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। हमारे देश में बालश्रम के हालात पर लिखी उनकी कविता- 'बच्चे काम पर जा रहे हैं, हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यह', जब भी, जहां कहीं भी पढ़ी-सुनी जाती है, सामने आ उपस्थित हो हमारे समय की विद्रूपता को अंदर तक झकझोर जाती है। कई भारतीय भाषाओं के साथ-साथ अँग्रेजी, रूसी और जर्मन में भी उनकी कविताओं के अनुवाद प्रकाशित हुए हैं। मनुष्यता की हिफाजत उनके शब्दों का प्रथम पक्ष है। उनकी रचनाओं में गहरे सामाजिक सरोकार निहित होते हैं।

हिंदी पाठ्यक्रमों में समकालीन स्तरीय कविताओं की चयन-प्रक्रिया पर वह कहते हैं, कि कई विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में पहली बार हिन्दी की समकालीन कविता को पाठ्यक्रमों में लगाया गया है । एनसीआरटी या केन्द्रीय विद्यालयों के पायक्रम हों, सबमें महत्वपूर्ण समकालीन कवियों की कई बहुत अच्छी कविताओं का चयन किया गया है। कई विश्वविद्यालयों में भी समकालीन कविता का बहुत सही चयन किया गया है। हो सकता है कि अब बन रहे राजनीतिक दबाव में चीजें बदल जायें और उनका बहुत बुरा और विकृत पक्ष हमें देखने को मिले। जहां तक पाठ्यक्रमों में साहित्य का प्रश्न है, यह तय है कि जिन रचनाओं को चुना गया है या चुनी जायेंगी उसके लिये चयन समितियाँ ही जवाबदेह होंगी। फिर वो किस दबाव में काम करती हैं, यह बहुत मायने नहीं रखता। उन तमाम दबावों के प्रति भी वो ही जवाबदेह होंगी।

राजेश जोशी का कहना है, कि स्तरीय कविता के पाठक सिमट रहे हैं, यह भी एक तरह की हाइपोथेटिकल बात हो सकती है। क्या पहले स्तरीय हिंदी कविता का पाठक वर्ग बहुत बड़ा था? क्या स्तरीय कविता के संग्रह पहले ज़्यादा बड़ी तादाद में बिकते थे? अगर ऐसा था तो पहले संग्रह छपना इतना कठिन क्यों था? शमशेर जैसे बड़े कवि का संग्रह लगभग पचास की उम्र में क्यों छपा? कई महत्वपूर्ण कवियों के संग्रह जगत शंखधर जी ने अपने ही खर्च से क्यों प्रकाशित किये? आज बड़े शहरों में भी हिंदी की किताब के लिये कोई उपयुक्त किताब की दुकान नहीं है। अंग्रेजी की पापुलर किताबों के लिये भी बड़ी-बड़ी दुकानें हर शहर में, हर रेलवे स्टेशन और एरोड्रम पर आपको मिल जायेंगी।

समकालीन साहित्य संबंधी एक प्रश्न पर राजेश जोशी का मानना है, कि गीत और नवगीत में नया कुछ नहीं हो रहा है। हमारे समय की विकट सच्चाइयों को कह सकने की क्षमता कम-से-कम समकालीन गीत में नहीं है और अगर है भी तो बहुत कम है। कविता अपने आलोचक अपने साथ लेकर आती है। अगर आलोचना का ध्यान गीत की तरफ नहीं जा रहा है तो आलोचना को कोसने के बजाय गीत और नवगीत के कवियों को अपनी रचना में झांकने की कोशिश करनी चाहिए। यह समय है, जब कविता हो या गीत, हर कवि को आत्मालोचन की ज़रूरत है। प्रस्तुत है राजेश जोशी की कविता आईना-

घर में एक आईना है
आईने में एक आदमी रहता है
जो हू ब हू मेरी तरह दिखता है
सारी हरकतें मेरी तरह करता है
मेरी ही तरह उठता बैठता है चाय पीता है
अखबार पढ़ता है
हरी मिर्च को दाँत से काटता है
और सी सी करता है
यहाँ तक कि वह मेरी ही तरह
कविता भी लिखता है
मेरी तरह तैयार होता है जूते पहनता है
लेकिन जब मैं घर से बाहर जाता हूँ
वह मेरे साथ साथ घर से बाहर नहीं आता
मैं नौकरी बजाने जाता हूँ दिनभर खटता हूँ
सौदा सुलुफ लेने बाजार जाता हूँ
बिजली का, पानी का बिल भरने जाता हूँ
घर में पड़ा पड़ा वह दिनभर क्या करता है
मुझे नहीं पता
लेकिन थकाहारा जैसे ही मैं उसके सामने आता हूँ
वह भी मेरी ही तरह थके हारे होने का
स्वांग करता है ।
मैं कहता हूँ कि कुछ दिन के लिए
मैं तुम हो जाता हूँ
और तुम मैं हो जाओ
पर वह दुष्ट इस इच्छा को भी
मेरी ही तरह दोहराता है
सिर्फ!

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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