सदी के महानायक ने पेश किया सदी का सबसे महान उदाहरण

लाखों-करोड़ों दिलों पर राज करने वाले अमिताभ बच्चन ने अपनी वसीयत में लिंग समानता का अनूठा उदाहरण पेश करते हुए भारतीय समाज से बेटा और बेटी के फर्क को मिटाने की एक बेहतरीन पहल की है। इसी तरह पिछले साल भी अपनी फिल्म पिंक के रिलीज़ होने से पहले अमिताभ ने अपनी पोती और नातिन के लिए एक ख़त लिखा था, जिसमें उन्होंने उनके ज़रिये देश की हर बेटी को अपनी राह खुद चुनने को कहा था।

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"भारतीय समाज पूरी तरह से फिल्मी है और वो सबकुछ अपनाता है, जो कि स्टार्स यानि की फिल्मी सितारे करते हैं और अमिताभ बच्चन तो आम जनता के बीच ईश्वर की तरह पूजे जाते हैं, ऐसे में उनका अपनी बेटी और बेटे में जायदाद को बराबर बांटने की बात कहना उन लाखों करोड़ों पिताओं को ये कहने के लिए प्रेरित करता है, कि यदि अमिताभ बच्चन ऐसा कर सकते हैं, तो "मैं" क्यों नहीं!" 

"पापा की परी हूं मैं"
"पापा की परी हूं मैं"
यदि फोर्ब्स की 2016 की रिपोर्ट पर जायें, तो अमिताभ बच्चन के पास 2400 करोड़ रूपये की संपत्ति है। इनके मुंबई स्थित जुहू में तीन बड़े बंगले प्रतीक्षा, जलसा और जनक हैं, जिनकी कीमत 300 करोड़ (अंदाज़न) के आसपास है।

"सुबह-सुबह पप्पू दादा का फोन आया और फोन करते ही बोले, अरे मालूम है हमारे अमिताभ बच्चन ने अपनी जायदात को अपने बेटे और बेटी में बराबर बांटने का खुलासा किया है। सोच रहा हूं मैं भी लगे हाथ अपनी बेटी और दोनों बेटों में जायदात को बारबर बांट दूं। अपने बच्चन साहब ऐसा कर सकते हैं, तो मैं क्यों नहीं।"

दरअसल, पप्पू दादा मेरी मौसी की ननद के बेटे हैं। बचपन के दिनों में हम जब नानी के घर जाते थे, तो पप्पू दादा भी मौसी के साथ गांव आये होते थे। वे अपनी मामी यानि कि मेरी मौसी से बहुत घुले मिले थे और उन्हीं के पास रहते थे। पप्पू दादा बचपन से ही बड़े मज़ेदार थे। मैं बहुत छोटी हुआ करती थी, तब शायद 7-8 साल की और पप्पू दादा 22-23 साल के। पप्पू दादा अमिताभ बच्चन के बड़े वाले फैन थे, उन्हीं की तरह चलते, उन्हीं की तरह बोलते, उन्हीं के गानों पर नाचते और जबकि वो राईटहैंड थे, लेकिन बाद में अमिताभ की नकल करने के चक्कर में लैफ्टी भी हो गये। हम लोग उनको पप्पू दादा कम अमिताभ बच्चन ज्यादा बोलते थे। पप्पू दादा यदि कहीं नहीं मिलते, तो बरदऊल (जहां कि बैल बांधे जाते हैं) में शीशे के सामने खड़े होके अमिताभ बच्चन के किसी डायलोग को दोहरा रहे होते थे। उनका बड़ा दिल करता था, कि मुंबई जा कर अमिताभ बच्चन को देख आयें। कुछ दिनों बाद पप्पू दादा की बैंक में नौकरी लग गई, उसके बाद शादी और बच्चे। पप्पू दादा अपनी घर गृहस्थी में उलझ गए, लेकिन अमिताभ बच्चन बनने का सपना उनसे कभी दूर नहीं हुआ। फोन पर जब भी बात करते अमिताभ की किसी फिल्म के बारे में बात करते या फिर ऐसी कोई भी बात जो बच्चन साहब से जुड़ी हुई हो।

और पप्पू दादा इस दुनिया में एक ही नहीं है, बल्कि कई पप्पू, गुड्डू, पिंटू, रिंकू दादा शीशे के सामने खड़े होकर अमिताभ बच्चन बनने की कोशिश सालों से कर रहे हैं। ऐसे में अमिताभ बच्चन का सोशल मीडिया पर लिंग समानता को लेकर इतना बड़ा बयान, हर किसी को एक बार फिर अमिताभ बच्चन बनने की प्रेरणा देता है।

"मेरी मृत्यु के बाद जायदात में बेटा और बेटी बराबर के हिस्सेदार होंगे: अमिताभ बच्चन"

"अमिताभ बच्चन ने ट्विटर पर #WeAreEqual और #genderEquality को हैशटैग करके लिखा, कि मेरी मृत्यु के बाद जो भी संपत्ति मैं छोड़कर जाऊंगा वह मेरे बेटे अभिषेक बच्चन और बेटी श्वेता नंदा में बराबर बांट दी जाये।"

अमिताभ बच्चन संयुक्त राष्ट्र में बच्चियों के ब्रांड अंबेसडर हैं। वे सिर्फ फिल्मी परदे पर ही नहीं गाते, "कहता है बाबुल, सुन मेरी बिटिया... तू तो है मेरे, जिगरे की चिट्ठिया..." बल्कि असल ज़िंदगी में भी बेटी को वही दर्जा देते हैं, जो एक पिता को अपनी बेटी को देना चाहिए। वे जितने बेहतरीन एक्टर हैं उतने ही बेहतरीन इंसान भी और ऐसा समय-समय पर आने वाली उनके ट्विट्स और उनके कामों को देखकर पढ़कर यकीन होता रहता है। बच्चन साहब का उनका अपनी बेटी से लगाव, प्रेम और सम्मान देश की हर बेटी को उसके बेटी होने पर कहीं न कहीं गर्व से भर देता है और ऐसे में हर बेटी अपने लिए भी अमिताभ बच्चन जैसी पिता की कल्पना करती है।

"पिता यदि अमिताभ बच्चन जैसा हो, तो दुनिया की कोई भी बेटी अकेली नहीं होगी, कोई बेटी पराई नहीं होगी और न ही पिता का घर उसके लिए सिर्फ गर्मियों की छुट्टियां मनाने का बहाना भर होगा।"

वैसे तो दुनिया का कोई पिता अपनी बेटी के लिए कभी गलत नहीं सोचता, लेकिन हमारे समाज में बात जब रूपये-पैसे की आती है, तो हर आदमी स्वार्थी हो जाता है। हर पिता अपनी पूरी जायदात अपने बेटे को दे देना चाहता है, क्योंकि समाजिक तौर पर लड़की अपने पति की जायदात में भी बराबर की हिस्सेदार है, ऐसे में यदि वो पिता की जायदात में से भी हिस्सा लेने लगे तो समाज उसे लालची और हिस्सा खाने वाली कहने लगता है। पिता के पास चाहे जितना पैसा हो, लेकिन अधिकतर पिता मरने से पहले अपनी जायदात बेटे के नाम करते हैं। बेटियों को पराया मानने वाली परंपरा भी धन-दौलत के लालच से ही पनपी होगी। कितनी अजीब बात है, न कि जो बेटी बचपन से लेकर जवान होने तक अपनी ज़िंदगी का एक-एक पल पिता के आंगन में पिता के लिए जीती है, वो पिता एक दिन दहेज के सामान के साथ अपनी बेटी को भी विदा करके सभी ज़िम्मेदारियों से मुक्त हो जाता है, लेकिन बेटी दूर रह कर भी अपना हर पल उसी आंगन में जीती है, जहां नंगे पांव दौड़ते हुए वो बड़ी हुई थी... जहां मां के आंचल में मुंह पोंछते हुए उसने सारी थकान कहीं उतार कर फेंकी थी... जहां मां के गुस्से को पीता की पीठ पर चढ़ कर भूल गई थी... जहां बात-बात पर पैर पटकते हुए वो अपने कमरे में चली जाती थी, उस कमरे में जिसमें वो पिता के सिवा किसी और को नहीं आने देती और उसी कमरे में जो उसके बाद गेस्टरूम या स्टोर रूम में बदल जाता है। 

लड़की जिस घर में जाती है उस घर की कभी नहीं हो पाती और जिस घर से आती है उस घर में शुरू से ही पराई होती है। फिर ऐसे में ये सवाल सबसे बड़ा हो जाता है, कि एक लड़की का असली घर है कहां? कोई लड़की चाहे कितनी भी पढ़ी-लिखी हो, कितनी भी समझदार हो, कितनी भी बहादुर, हो लेकिन पिता की प्रॉपर्टी को लेकर वो अक्सर मां-पिता-या भाई द्वारा इमोशनल अत्याचार या फिर कहूं तो छलि जाती है और यदि ऐसा नहीं भी होता है, तो वो समाज के डर से (कि लोग क्या कहेंगे बेटी भाई की जायदात में हिस्सा बंटाने आ गई) जायदात में हिस्सा नहीं लेती। लड़की स्वच्छ जल की तरह होती है, जिस बर्तन में जाती है उसका आकार ले लेती है, जिसकी जबान से छुलती है उसकी प्यास बुझा देती है।

"अमिताभ बच्चन की लाड़ली बिटिया श्वेता बच्चन नंदा उद्योगपति व एस्कॉर्ट लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर निखिल नंदा की पत्नी हैं। निखिल की कुल संपत्ति 3400 करोड़ रूपये है, जो कि अमिताभ बच्चन की संपत्ति से ज्यादा है। लेकिन फिर भी अमिताभ ने अपनी बेटी और बेटे में अपनी संपत्ति को बराबर बांटने का साहस दिखाया है, जबकि श्वेता नंदा आर्थिक तौर पर काफी मजबूत स्थिति में है।"

दिल के रिश्तों की गहराई रूपये पैसे से नहीं, बल्कि दिल में पनपने वाली ईमानदारी से आंकी जाती है और अमिताभ बच्चन ने अपने इस खुलासे से आम जनता को यह संदेश दिया है, कि बेटा-बेटी बराबर हैं, इसलिए ज्यादा कम वाला हिसाब ही नहीं होना चाहिए। सबसे बड़ी बात तो ये है, कि जिस समाज में बेटियों के पैदा होने पर उनका गला घोंट कर या फिर तंबाकू सूंघा कर मार दिया जाता हो और कई बार तो कोख में ही... उसी समाज में लिंग समानता को लेकर बच्चन साहब का यह कदम कई पिताओं की सोच को बदलने काम करेगा, ठीक वैसे ही जैसे पप्पू दादा बदल गए।

"हर पल में एक कहानी है और हर कहानी में अनगिनत पल... चलो उन अनगिनत पलों को एक साथ जोड़कर कोई कहानी गढ़ते हैं..."

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