जनता के टैक्स से चलने वाली अमेरिका की पब्लिक लाइब्रेरी

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न्यूयार्क से सवा घंटे की दूरी पर यह लाइब्रेरी दिखी। मॉनमाउथ काउंटी लाइब्रेरी। गूगल सर्च से पता चलता है कि 1922 से ही कस्बों में यह लाइब्रेरी सिस्टम है। जनता के टैक्स से चलती है। बहरहाल जब इस लाइब्रेरी में गया तो इसका विस्तार देखकर यकीन नहीं हुआ। लगा कि सारा शहर दफ्तर जाने से पहले लाइब्रेरी जाता है।

मॉनमाउथ काउंटी लाइब्रेरी
मॉनमाउथ काउंटी लाइब्रेरी
यह लाइब्रेरी न्यू जर्सी के इलाके में हैं जहां भारतीयों की संख्या ज़्यादा बताई जाती है। सारी किताबों की सूची नहीं दे रहा हूं मगर इससे पता चलता है कि वहां रह रहे भारतीयों में या तो पुस्तकों की कम जानकारी है या फिर कुछ प्रचलित पुस्तकों को ही पढ़ना समझ लेते हैं।

कहीं जाता हूं तो उस शहर की लाइब्रेरी ज़रूर देखता हूं। भारत में पब्लिक लाइब्रेरी बहुत कम बची हैं। ऐसी लाइब्रेरी जहां कोई भी आ जा सकता हो। रिसर्चर के लिए तो फिर भी कुछ लाइब्रेरी हैं। कुछ नए प्राइवेट कालेज की लाइब्रेरी भी देखी है। बहुत प्रभावित नहीं हुआ। हाल फिलहाल में सरकारी खर्चे से कोई नई लाइब्रेरी बनी हो, इसकी जानकारी नहीं है। जबकि इसी वक्त दुनिया के कई देशों में शानदार वास्तुकला का उदाहरण पेश करते हुए कई सारी लाइब्रेरी बनी हैं।

न्यूयार्क से सवा घंटे की दूरी पर यह लाइब्रेरी दिखी। मॉनमाउथ काउंटी लाइब्रेरी। गूगल सर्च से पता चलता है कि 1922 से ही कस्बों में यह लाइब्रेरी सिस्टम है। जनता के टैक्स से चलती है। बहरहाल जब इस लाइब्रेरी में गया तो इसका विस्तार देखकर यकीन नहीं हुआ। लगा कि सारा शहर दफ्तर जाने से पहले लाइब्रेरी जाता है। काउंटर पर लोगों की भीड़ थी। बच्चों के लिए अलग से एक बड़ा सेक्शन था। लाखों किताबें रैक पर रखी थीं। कई भाषाओं की। हिब्रू की किताबों की रैक भी दिखी। हिन्दी की भी। हिन्दी की बहुत कम।

हिन्दी की किताबें देखने लगा। ये वो किताबें हैं जो लोगों ने मंगाई हैं। यहां की लाइब्रेरी में आमतौर पर व्यवस्था होती है कि आप किसी पुस्तक की मांग करे, यह काम लाइब्रेरी का है वह कहीं से भी उसे लाकर आपके लिए उपलब्ध कराए। तो आप समझ सकते हैं कि किसी न किसी ने इस लाइब्रेरी से यह किताब मांगी होगी। हमारे साथ चल रहे अजीत ठाकुर ने कहा कि कुछ भारतीयों की फितरत होती है। वे सिस्टम को चेक करने के लिए या फिर अपने टैक्स का हिस्सा सधाने के लिए नाम दे देते हैं और यहां किताबें आ जाती हैं। हिन्दी भाषी किताबों की संख्या बताती है कि उनकी लाइब्रेरी में दिलचस्पी नहीं है। वे लाइब्रेरी का इस्तमाल नहीं करते हैं।

कृष्णा सोबती की समय सरगम, चंद्रकिरण की आधा कमरा, विमल मित्र की साहब बीबी और गुलाम, माणिकलाल की तपस्विनी,अमृत लाल नागर की बिखरे तिनके,मृदुला सिन्हा की अतिशय,उड़ि जहाज़ के पंछी और अहल्या उवाच, अवध नारायण श्रीवास्तव की लाडली बेटी, शेर सिंह की शहर की शराफत, माधवी श्री की आह ये औरतें, ज्योति साहनी की तनीषा, फांसी, एक बहुजन की आत्मकथा, मिर्ज़ा हादी रुसवा की उमराव जान, शिवप्रसाद सिंह की नीला चांद, खुशवन्त सिंह की औरतें, सनसेट क्लब और भगवान बिकाऊ नहीं है, श्रीलाल शुक्ल की राग दरबारी, अज्ञातवाश, राजेंद्र श्रीवास्तव की बार बालाएं और कोई तकलीफ नहीं, गांधारी की आत्मकथा।

अटल बिहारी वाजपेयी की शक्ति से शान्ति, लेफ्टिनेंट जनरल के के नंदा की कश्मीर, राजेंद्र प्रताप की 1000 महाभारत प्रश्नोत्तरी और 1000 रामायण प्रश्नोत्तरी,नरेंद्र मोहन की भारतीय संस्कृति, ओंकार नाथ की द्वादश ज्योतिर्लिंग, सरल गुरु ग्रंथ साहिब। प्रहलाद तिवारी की क्रांतिदर्शी सावरकर है और मुश्ताक की कहानी शाहरूख़ की। इसके अलावा व्याकरण और हिन्दी-उर्दू के शब्दकोश भी हैं।

यह लाइब्रेरी न्यू जर्सी के इलाके में हैं जहां भारतीयों की संख्या ज़्यादा बताई जाती है। सारी किताबों की सूची नहीं दे रहा हूं मगर इससे पता चलता है कि वहां रह रहे भारतीयों में या तो पुस्तकों की कम जानकारी है या फिर कुछ प्रचलित पुस्तकों को ही पढ़ना समझ लेते हैं। लेकिन यहां अंग्रेज़ी भाषा में नाना प्रकार की किताबें हैं। हर तरह की। डीवीडी की अलग से रैक है। यहां पर कैरियर काउंसलिंग भी की जाती है।

(एनडीटीवी के पत्रकार रवीश कुमार की फेसबुक वॉल से साभार)

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