कौन खोले बिल्लों के गले की घंटी!

भारतीय राजनीति पर प्रकाश डालती दृष्टि...

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आज की सियासत किस नाजुक मोड़ पर पहुंच गई है, आम आदमी के लिए, समाज के लिए क्यों इतनी अविश्वसनीय हो चुकी है, नेता वेश में अपराधियों के निर्वाचित हो जाने और उनमें से एक अदद के कारनामे से पूरा रहस्य समझ में आ जाता है। मेरे इलाके का एक ऐसा ही जरायम शख्स मंत्री की कुर्सी तक जा पहुंचा, वह कैबिनेट मंत्री!

फोटो साभार: सोशल मीडिया
फोटो साभार: सोशल मीडिया

मधुमेह का मारा मैं एक सुबह मॉर्निंग वॉक की कठदौड़ से लौटा तो घर में अखबार की एक फोटो पर आंख ठहर गई। ठहर क्या चिपक-सी गई। टकटकी लगाए रहा देर तक। खामख्वाह। बात क्या थी कि यहां कुछ लिखा नहीं जा रहा लेकिन इस हवाई दोस्त मंडली में उस सच को साझा कर लेने को जी बहुत जोर मार रहा है। जैसे गले में कुछ अटक गया हो या कलेजे का पत्थर हल्का कर लेने की बेताबी। फोटो के पीछे क्या है? जितना फूहड़ और विद्रूप, उससे हजारगुना ज्यादा डरावना स्मृतियों का एक असहनीय झोंका। फोटो एक कैबिनेट मंत्री की। वह मंत्री केंद्र का या किसी प्रदेश का, भेद खोलना ठीक नहीं। बस इतना जान लीजिए कि उसके चेहरे और वस्त्र की शालीनता-सुघरता देख कर रोंगटे खड़े हो गए।

फोटो को बड़े गौर से घूरा। बार-बार चित्र के नीचे लिखा परिचय पढ़ा। उसी झटके में वह पूरी खबर पढ़ गया। स्कूल के दिनो में हमारे घर गांव क्या, पूरे जिले में तीन बड़े डाकुओं का आतंक हुआ करता था। उनमें एक डाकू मेरी मौसी के गांव शिवरामपुर का निवासी था। दीना नाम था उसका। पूरे गांव की महिलाएं सोने-चांदी से लदी-फदी उसकी बीवी के पांव छुआ करती थीं। मौसी ने बताया था कि ये दीना डाकू की मेहरारू (बीवी) है। दीना डाकू के प्रशंसकों में मेरी मौसी का परिवार भी शामिल था। प्रशंसा इसलिए कि दीना शिवरामपुर समेत आसपास के गांवों में चोरी-डकैती नहीं पड़ने देता था। पुलिस भी किसी परेशान नहीं करती थी। बस, अपने गांव-जवार पर यही दीना की बहुत बड़ी नियामत थी।

दीना शरीर से जितना हट्टा-कट्टा, लंब-तड़ंग, उतना खूबसूरत। बोलचाल में मिठबोलवा। किसी से अकड़ के, ऊल-जुलूल नहीं बोलता था। गांव के हर बड़े बुजुर्ग के पांव छूता था। आज के राजनेताओं की तरह यह सब करना दीना की रणनीति का एक हिस्सा था क्योंकि लोगों का विश्वास जीत कर वह बड़े आराम से अपने घर-गांव में छिपा रहता था। पुलिस लाख कोशिश कर भी बगल के घर में छिपे दीना के बारे में भनक नहीं ले पाती थी। उन्हीं तीन खूंख्वार डकैतों में से एक के वंशज की ये फोटो अखबार में छपी देखी। लंबे समय तक जेल में गुजारे इसने भी। मैंने इसे कभी देखा नहीं था।

फोटो ने चिंतित कर दिया। क्या दिन आ गये हमारे मुल्क की राजनीति के। किसी जमाने में खूंख्वार अपराधी रहे राजनेतानुमा वह कैबिनेट मंत्री फोटो, और आला अफसर उसके पीछे-पीछे पूरी विनम्रता से फाइलें लिए दौड़े जा रहे थे। वह किसी संत की तरह गंभीर मुद्रा में अपनी वैसी ही छद्म सौम्यता से अफसरों को कृतकृत्य कर रहा था, जैसे मौसी के गांव को दीना....। 

वंशावली खोलो तो कइयों की ऐसी ही पता चलेगी। कौन खोले बिल्लों के गले की घंटी।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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