बच्चों के लिए नाटक की नई दुनिया बसाने वाले गिल्लो थिएटर के शैली सथ्यू और अतुल तिवारी

नाटक उपकरण या प्रौद्योगिकी से नहीं कलाकार के अभिनय से होता है ... बच्चों को मूर्ख समझने वाले खुद होते हैं मूर्ख... यह विचार रखने वाली शैली सथ्यू और लेखक अतुल तिवारी ने बच्चों के लिए अनगिनत नाटक लिखे और देश भर के मंचों पर प्रस्तुत किये हैं, उनका उद्देश्य बच्चों के  लिए नाटकों का नया ऐसा महौल बनाना है, जिससे नयी पीढ़ी में रचनात्मकता का नया संचार  हो। 

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बच्चों के थिएटर के लिए काम कर रही मुंबई का गिल्लो की दो अहम शैली सथ्यू और अतुल तिवारी भी से मुलाकात में नाटक और बच्चों पर खुलकर बातचीत हुई। बात जब बच्चों की होने लगी तो अतुल तिवारी ने कहा,

बच्चे तुतलाकर बात करते हैं, क्योंकि उनकी भाषा के विकास की प्रक्रिया जारी रहती है, लेकिन बड़े भी उनकी नकल करते रहते हैं, यह ग़लत है। बच्चों का तुतलाकर बात करना ग़लत नहीं है, न ही उन्हें इसके लिए डांटना डपटना चाहिए, लेकिन हमें उनके जवाब में अच्छी बातचीत करनी चाहिए ताकि उनकी सीखने की प्रक्रिया तेज़ हो सके।

नाटककार सोचते हैं कि बच्चे बहुत ज्यादा बातें करते रहते हैं। बहुत सारी बातें करते रहते हैं, इन्हीं बातों से उनके नाटक के कई विषय निकलते हैं। उन्हें दुनिया के हित से कोई मतलब नहीं होता।

तिवारी कहते हैं,

बच्चों के लिए नाटक करना काफी मुश्किल काम है। क्योंकि जब बच्चे कोई नाटक देख रहे होते हैं, तो वह उसी समय उसकी सराहना करते हैं, जब उन्हें वह अच्छा लगे। वरना उनके लिए कई तरह के काम होते हैं। नाटक समझ में नहीं आता तो वे आपस में बातें करने लगेंगे। उन्हें ज़बरदस्ती तालियाँ बजाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं होता है कि नाटक का टिकट कितने रुपये देकर ख़रीदा गया है या फिर किसी का दिल रखने के लिए ही सही ताली बजानी पड़ेगी। यही कारण है कि बच्चों का नाटक दूसरी उम्र के लोगों के लिए नाटक करने से जरा मुश्किल है।

आधुनिक युग के साथ थिएटर में भी कई चीजें बदलने लगी हैं। नाटक में भी कई तरह के नए अनुभव कर रहा है, लेकिन तिवारी साहब मानते हैं, नाटक शेक्सपियर से लेकर अब तक वही है, हाँ सामग्री कुछ बदल गया है, जो नए युग के लिए ज़रूर है, लेकिन नाटक अभी भी उपकरण या तकनीक नहीं है, वह आज भी कलाकार का काम ही है।

अतुल तिवारी ने कई फिल्मों में काम किया है, लेकिन उनकी आत्मा में निर्देशन, रचनात्मक साहित्य और थिएटर बसा हुआ है। श्याम बेनेगल के डिस्कवरी ऑफ इंडिया से लेकर कमल हसन के विश्वरूप तक कई कृतियाँ उनके लेखन में शामिल रही हैं। उत्तर प्रदेश की राजधानी और नवाबों के शहर लखनऊ में अपने प्रारंभिक जीवन जीने वाले अतुल तिवारी ने अपने शौक की दुनिया बसाने के लिए मुंबई का रुख किया, लेकिन देश के छोटे शहरों और गाँवों में उन्होंने खूब नाटक किए हैं। कर्नाटक के गांव में जहां वह के वी सुब्बन्ना से काफी प्रभावित रहे हैं, जिन्होंने गांव में नाटक जिंदा रखा। वे बताते हैं कि सुब्बन्ना ने नाटक को जीवित रखने में अपना सारा जीवन समर्पित कर दिया। उन्होंने लोगों को बताया कि नाटक कैसे नये जीवन से जुड़ सकता है।

दरअसल तिवारी साहब के परिवार में ज्यादातर डॉक्टर हैं और उन्हें भी वह डॉक्टर ही बनाना चाहते थे, लेकिन वह निर्देशक बनना चाहते थे और ऐसे दौर में जब नाटक के निदेशक से पूछा जाता था ... वह तो ठीक है पर आप काम करते हैं? इसके लिए उन्होंने भारत में जहां नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में प्रशिक्षित वहीं जर्मन नेशनल थिएटर के साथ काम करने का अनुभव भी उन्हें रहा।

तिवारी कहते हैं, 'मैं जब नाटक करना शुरू किया तो शेक्सपियर के कई अनुवाद पहले से मौजूद थे, लेकिन मुझे लगा कि उनमें से ज्यादातर फीके हैं। इसलिए मैंने फिर से उनके कई नाटकों का हिंदी में अनुवाद किया।'

अतुल तिवारी काफी दिनों से गिल्लो थिएटर के साथ काम कर रहे हैं। वह गिल्लो की निदेशक शैली सथ्यू के बारे में बोलने लगते हैं, - शैली सथ्यू ने बच्चों के नाटकों पर बहुत काम किया है। वह पूरी तरह इसके लिए सक्रिय हैं। आपने देखा होगा कि बच्चों के खिलौनों की दुकान पर कई प्रकार के खिलौने उनकी उम्र के हिसाब से होते हैं। जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं, इन खिलौनों का आकार भी बदलता है। शैली सथ्यू के नाटकों को इसी पृष्ठभूमि में देखा जा सकता है। उनके इसी काम को देखकर संगीत नाटक अकादमी ने उन्हें युवा नाटककार के रूप में बिस्मिल्लाह खान अवार्ड से सम्मानित किया है। शैली ने बच्चों के थिएटर को एक नया रूप दिया है। कभी शेक्सपियर के पास एक साल में 50 नाटकों हुआ करते थे, उसी तर्ज पर शैली ने बच्चों के लिए 8 नाटक तैयार किए हैं। यह एक बड़ा काम है।

शैली सथ्यू गिल्लो की संस्थापक हैं। वह कहती हैं कि बच्चों को सुनना बहुत ज़रूरी है। उनकी बातें सुनते रहना चाहिए। तब समझ में आ जाएगा कि वे क्या कहना चाहते हैं। वह बताती हैं,

- मैं टीचर रही हूँ। शिक्षक प्रशिक्षण का काम भी करती हूँ। बच्चों को जानने समझने के कई अवसर मिले हैं। बच्चे बहुत निडर होते हैं। अगर उन्हें कोई मूर्ख समझता है तो वह खुद मूर्ख होता है।

शैली सथ्यू शुरू में आर्किटेक्ट बनना चाहती थी, इसलिए उन्होंने कॉलेज में प्रवेश भी ले लिया था, लेकिन बाद में फिर उन्हें अपने परिवार की विरासत ने याद किया। जहाँ नाटक और फिल्म दो बड़े काम थे, शैली ने बच्चों के लिए नाटक लिखने की शुरुआत की और आज वह नाटक की कई पुस्तकों के लेखक के तौर पर अपनी नई पहचान बना चुकी हैं। खासकर हिंदी नाटक लिखने की परंपरा को उन्होंने नया मोड दिया है। उनके नाटकों में हिंदी उर्दू की विशेष चाशनी होती है। यह कला उन्हें अपने पिता एमएस सथ्यू से विरासत में मिली है।

शैली का मानना है कि बच्चों के लिए नाटक लिखना और उसे पेश करना एक बड़ी चुनौती ज़रूर है, लेकिन यह भी समझना होगा कि वयस्कों और बच्चों की दुनिया बहुत अलग नहीं है। बस उन तक नाटक पहुंचाने के लिए ऐसी भाषा का प्रयोग हो जो उनकी समझ में आए। उन्होंने बच्चों की भाषा को समझने के लिए घंटों उनके साथ बिताए, देर-देर तक पार्क में बैठी रहती। बाज़ार में, दुकानों में घरों में उनकी बातचीत की शैली और अस्थिरता को पढ़ती रहती। आज उनके पास बच्चों के लिए बहुत सारे विषय हैं। वह मानती हैं कि आज बच्चों के पास नई तकनीक के बुरे प्रभाव के रूप में उनकी सामाजिक संबंधों में कुछ कमी आई है, लेकिन उनकी दूसरी क्षमताओं में वृद्धि हुई है। साथ ही वह यह भी मानती हैं '' 'नाटक नाटक हो, उसे कोई संदेश देने के उद्देश्य से नहीं खेला जाना चाहिए। नाटक एक सोच और कहानी है, जिसे उन तक पहुंचाया जाना चाहिए। ''

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कहानियाँ मुझे विरासत में मिली हैं। माँ, बाप, चाचा, चाची, मासी, बुआ, नानी दादी, सब की अलग अलग कहानियाँ थीं। उसी विरासत को पास पड़ोस, दोस्त रिश्तेदार, नुक्कड, गली, मुहल्ला, शहर, देश और विदेश के चेहरों में छुपी कहानियों के साथ मिलाकर पेश कर रहा हूँ।

Stories by F M SALEEM