बचपन को हिंसा का पाठ पढ़ा रहे हैं वीडियो गेम

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खतरनाक वीडियो गेम मासूमों को हिंसा का पाठ पढ़ा रहे हैं। बच्चे नेट पर खुद को मारने के तरीके सर्च कर रहे हैं। जब से घर-घर में स्मार्ट फोन आ गए हैं, ऐसे बच्चों का काम और आसान हो गया है। बच्चों को मारधाड़, सुपरहीरो वाले वीडियो गेम्‍स खूब पसंद आ रहे हैं। एक्शन जॉनर वीडियो गेम बच्चों का नशा बन चुके हैं।

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
छोटे बच्चों का मन कोरे कागज जैसा होता है। वह जो भी देखते हैं, वैसी ही नकल करने लगते हैं। ज्यादातर वीडियो गेम्स हिंसा से भरपूर हैं। उनमें सिर्फ मारधाड़ देखकर बच्चों में हिंसा की प्रवृत्ति बढ़ रही है। 

स्मार्ट फोन की पहुंच में आ चुके आर्थिक दृष्टि से अतिसामान्य परिवारों के बच्चे भी अब वीडियो पर मौत का खेल खेलने लगे हैं। ये खतरनाक वीडियो गेम पूरी दुनिया भर में मासूमों को हिंसा का पाठ पढ़ा रहे हैं। बच्चों के अत्यंत कोमल मन पर खूनी खेलों का बीजारोपण भविष्य के सामाजिक जीवन को हिंसा की आग में झोकने का एक विश्वव्यापी षडयंत्र है, जिसकी कीमत हमारी आने वाली पीढ़ियां चुकाएंगी। ऑस्ट्रेलिया के नाउरू अप्रवासन केंद्र में रह रहे दस से चौदह साल के बच्चे गूगल पर खुद को मारने के तरीके सर्च कर रहे हैं। ऐसे अधिकतर बच्चे सोचने लगते हैं कि कैसे मरा जा सकता है। ऐसे ही एक बच्चे ने खुद पर पेट्रोल छिड़क कर जान देने की कोशिश की तो दूसरे ने खुद को नुकसान पहुंचाने के लिए किसी नुकीली धातु को निगल लिया।

विशेषज्ञों को बच्चों में गंभीर आघात के संकेत मिल रहे हैं। बताया जा रहा है कि ऐसे बच्चों में सब कुछ छोड़ने की प्रवृत्ति तेजी से घर कर रही है। यह सिंड्रोम उनको बेहोशी की हालत तक ले जा रहा है। यद्यपि अपुष्ट तौर पर गूगल तेरह साल से कम उम्र के बच्चों को भी अपनी सेवाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से लॉग इन करने की अनुमति देने पर काम कर रहा है। वह अपनी सेवाओं में बड़े फेरबदल की तैयारी में है। एक अनुसंधान में पता चला है कि तेरह वर्ष से कम आयु के बच्चे भी बड़ी संख्या में ऑनलाइन रहने लगे हैं। तमाम परिवारों के तो खुद अभिभावक ही वक्त से पहले ज्ञानी बना देने की मूर्खता वश अपने बच्चों को इंटरनेट पर उछल-कूद करना सिखा रहे हैं। जब से स्मार्ट फोन आ गए हैं, ऐसे बच्चों का काम और आसान हो गया है।

एग्जाम के सीजन में तो अपने रिजल्ट से मायूस ऐसे बच्चे नेट पर मरने के तरीके ढूंढने लगे हैं। यद्यपि इसमें गूगल सकारात्मक जिम्मेदारी निभा रहा है। जब वह गूगल से मरने का आसान तरीका पूछते हैं, गूगल जवाब देने के बजाय घर पर पुलिस भेज देता है। इंटरनेट पर ब्लू व्हेल गेम तमाम बच्चों की जान लेकर इंटरनेट पर डर का माहौल बना चुका है। आजकल उसी तरह का एक और गेम 'मोमो चैलेंज' आ गया है, जिसमें बारह साल की बच्ची की मौत दिखाई जा रही है। भले ही सरकारों ने इंटरनेट पर मौजूद इस तरह के गेम के सभी लिंक हटाने के आदेश दे दिए हों, ज्यादातर टीन एज बच्चे तेजी से इसकी गिरफ्त में आ रहे हैं। इंटरनेट पर ब्लू व्हेल चैलेंज से भी खतरनाक कई गेम बच्चों को हिंसा का पाठ पढ़ा रहे हैं, जैसे 'एयरोसोल चैलेंज' देखने वाले कई बच्चे खुद को घायल कर चुके हैं। 'पास-आउट चैलेंज' बच्चों को आग से जलाने, सीने पर चढ़ कर सांस रोकने या गरम पानी खुद पार डाल लेने की शिक्षा दे रहा है।

इसके बाद से कई बच्चे अपने भाई-बहनों को भी बुरी तरह जला चुके हैं। 'नेक्नोमिनेट' गेम के ड्रिंकिंग चैलेंज की वजह से कई बच्चों की जानें जा चुकी हैं। यह खेल बच्चों को पिसे हुए चूहे और कीड़ो का कॉकटेल बना कर पीना, गोल्डफिश को निगलना, अंडे, बैटरी का लिक्विड, यूरीन और 3 गोल्डफिश को एक साथ मिलाकर जूस पीना, टॉयलेट क्लीनर, वोडका और मिर्च पाउडर का शेक पीने जैसा पाठ पढ़ा रहा है। 'रेपले' गेम चैलेंज महिला विरोधी अपराधों के लिए बच्चों को उकसाता है। 'फायर चैलेंज' गेम प्लेयर चाइल्ड को खुद को पूरी तरह जलाने का चैलेंज देता है। बच्चों को मारधाड़ और सुपरहीरो वाले वीडियो गेम्‍स काफी पसंद आ रहे हैं। एक्शन जॉनर वीडियो गेम बच्चों का नशा बनता जा रहा है।

छोटे बच्चों का मन कोरे कागज जैसा होता है। वह जो भी देखते हैं, वैसी ही नकल करने लगते हैं। ज्यादातर वीडियो गेम्स हिंसा से भरपूर हैं। उनमें सिर्फ मारधाड़ देखकर बच्चों में हिंसा की प्रवृत्ति बढ़ रही है। वह अनजाने में ही हिंसा और अपराध को सामान्य बात मानने लगे हैं। वह ड्राई आई के शिकार हो रहे हैं। उनकी गर्दन और पीठ में दर्द, मोटापे आदि की शिकायतें अब आम हो चली हैं। मिडिलसेक्स यूनिवर्सिटी में एनएसपीसीसी द्वारा 11 से 16 साल के 1001 बच्चों पर केंद्रित एक अध्ययन में पाया गया है कि अब बच्चे किशोर होने से पहले ही पोर्न देखने लगे हैं। इससे उनके असंवेदशील और मानसिक रूप से भ्रष्ट हो जाने का खतरा बढ़ गया है। स्मार्टफोन्स के माध्यम से ऑनलाइन पोर्न सामग्री बेरोकटोक उम्र से पहले ही बड़े हो रहे मासूमों की जिंदगी में विषवमन कर रही है।

अध्ययन में पता चला है कि 11 से 16 साल के 53 प्रतिशत बच्चे ऑनलाइन अश्लील सामग्री देख रहे हैं। इनमें से 94 प्रतिशत बच्चे 14 साल की उम्र से पोर्न देखने लगे हैं। 15 से 16 साल के 65 प्रतिशत बच्चे और 11 से 12 साल के 28 प्रतिशत बच्चे ऑनलाइन पोर्न देख रहे हैं। लगभग 28 फीसदी बच्चों तक पोर्न सामग्री अचानक पॉपअप विज्ञापनों के माध्यम से पहुंच रही है। अध्ययन के दौरान बच्चों ने बताया कि वे जो कुछ तस्वीरों में देखते हैं, उसकी नकल करना चाहते हैं। उनमें से लगभग 14 प्रतिशत बच्चों ने खुद की नग्न और अर्धनग्न तस्वीरें भी खींचकर उन्हें आपस में शेयर भी किया। ऐसे 38 प्रतिशत बच्चे लैपटॉप पर और 33 प्रतिशत मोबाइल पर पोर्न देख रहे हैं। इससे लाखों, करोड़ों बच्चों के मन पर घरेलू और सामाजिक रिश्तों की गलत छवि स्थापित हो रही है। पैरेंट्स समझते हैं कि बच्चा तो मोबाइल पर गेम खेल रहा है, तब उन्हें ये पता नहीं होता कि उसी दौरान खेल के बीच-बीच में बच्चों के सामने अश्लील विज्ञापन भी परोस दिए जाते हैं।

ढाई सौ से अधिक बच्चों पर हुए एक अन्य शोध से पता चला है कि वीडियो गेम्स बच्चों को आक्रामक बना रहे हैं। उनका नैतिक आचरण नष्ट किया जा रहा है। वे गेम्स के किरदारों की नकल को मॉडर्न स्टाइल मानकर उसे अपने जीवन में प्रयोग करने लगे हैं। उनकी भाषा भी अभद्र होती जा रही है। भारत के चार महानगरों दिल्ली, मुंबई, बेंगलूर और चेन्नई में एसोचैम (एसोसिएटेड चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया) के सर्वेक्षण में पता चला है कि इंटरनेट बच्चों की लत बन गया है। बारह से पंद्रह साल तक के लगभग 58 फीसदी बच्चों का हर वक्त ऑनलाइन रहने का मन करता है। वे कम से कम पांच घंटे रोजाना वे नेट-मोबाइल सर्चिंग, चैटिंग, वीडियो गेम खेलने आदि में बिता रहे हैं। सर्वेक्षण में ऐसे बच्चों की संख्या बहुत कम पाई गई, जो स्कूल के काम के लिए नेट की मदद लेते हैं। लंदन के समरसेट टानटन स्कूल के प्रमुख जॉन न्यूटन ने एक अध्ययन के बाद बताया है कि फेसबुक, ट्विटर और बेबो जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स बच्चों के नैतिक विकास में आज सबसे बड़ा खतरा हैं। ये बच्चों को झूठ बोलना, फूहड़ बातें करना, दूसरों को अपमानित करना, बेहूदी हरकतें करना सिखा रही हैं।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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