कपड़ों के बाजार में युवाओं की धमक, कमाई के साथ कर रहे हैं बुनकरों की मदद

अहमदाबाद से चल रहा है Maku Textiles का कारोबार ...फेसबुक के सहारे फैला रहे हैं कारोबार...हर महीने एक लाख रुपये की आय...

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इंटरनेट की आंधी से कई तरह के परिवर्तन देखने को मिले हैं। लोग जहां एक दूसरे के करीब आ गए हैं वहीं इसने रोजगार के नये दरवाजे भी खोले हैं। इंटरनेट ही वो वजह है कि कई युवा अब खुद ही कोई उद्यम शुरू करने के बारे मे सोचने लगे हैं। ताकि वो अपना बेहतर भविष्य बना सकें। इतना ही नहीं ऑफलाइन कारोबार को दरकिनार कर लोग ऑनलाइन कारोबार को तव्वजो दे रहे हैं। ऐसा ही एक उदाहरण है Maku Textiles। जो हाथ से बुने हुए कपड़ों को बढ़ावा देने का काम करता है।

शांतनु दास और चिराग गांधी
शांतनु दास और चिराग गांधी

हथकरघा ऐसी कला है जो धीरे धीरे दम तोड़ रही है और सरकार इसको बढ़ावा देने के लिए कई तरह के प्रोजेक्ट भी चला रही है लेकिन उसका ज्यादा जमीनी असर नहीं दिखा है। शांतनु दास जो एनआईडी, अहमदाबाद से डिजाइनिंग का कोर्स कर चुके हैं वो इस बात को अच्छी तरह जानते थे इसलिए वो इस क्षेत्र में कुछ करना चाहते थे। ताकि बुनकरों की सीधे मदद की जा सके। तो दूसरी ओर चिराग गांधी ने निरमा विश्वविद्यालय से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद शांतनु के साथ Maku Textiles में सहयोग करने लगे।

Maku Textiles के तहत ये दोनों लोग किसी चीज की डिजाइन करने के बाद उससे बुनने के लिए बुनकर को देते हैं। ये लोग मुख्य रुप से पश्चिम बंगाल और कच्छ, गुजरात के बुनकरों से अपना काम करवाते हैं। दरअसल कपड़ा उद्योग में काफी पैसा लगा हुआ है और इसमें काफी लोग काम करते हैं लेकिन उन पर नियंत्रण कुछ ही लोगों का है। इस उद्योग से अगर कोई सबसे ज्यादा फायदा उठा रहा है तो वो हैं बिचौलिये। जो कपड़ा कंपनियों और बुनकरों के बीच की भूमिका निभाते हैं और ये कंपनियां बुनकरों के उत्पाद को प्रदर्शनियों में या बुटीक को बेचती हैं। जो इसे ऊंचे दामों पर बेचती हैं। जिनमें से बुनकरों को सिर्फ 5 प्रतिशत हिस्सा ही मिल पाता है।

Maku Textiles की कोशिश बेहतर ईकोसिस्टम को तैयार करने की है ताकि बुनकरों का ज्यादा से ज्यादा काम बाजार तक पहुंचे। साथ ही बुनकर, बिचौलिये और ग्राहक तीनों के पास बराबर के मौके हों। शांतनु और चिराग ने इस काम की जब शुरूआत की थी तो वो मानते थे कि ये फैशन के मुताबिक नहीं है और ऐसे कपड़ों को फैशन शो में दिखाना मुश्किल है और वो इस काम को बुनकरों के हित में दिखाना चाहते थे लेकिन अब ये मॉडल बदल रहा है। इन लोगों ने अपनी बचत के साथ परिवार से आर्थिक मदद लेकर अपना काम शुरू किया जिसका परिणाम है कि ये हर महिने 1 लाख रुपये तक की आमदनी पा रहे हैं। इनके ब्रांड के कपड़ों की ज्यादा बिक्री देश के विभिन्न हिस्सों में लगने वाली प्रदर्शनियों, विभिन्न स्टोर और फेसबुक के माध्यम से होती है।

इन लोगों का काम दिनों दिन तेजी से बढ़ रहा है यही कारण है कि अब तक अहमदाबाद से अपना कारोबार चला रहे ये लोग अब कोलकाता से इसे शुरू करने पर गंभीरता से सोच रहे हैं। साथ ही कारोबार में और तेजी लाई जाए इसलिए इन लोगों को तलाश है इस क्षेत्र से जुड़े लोगों की। इन लोगों की योजना निवेश के लिए बैंक से कर्ज लेकर अपने कारोबार को बढ़ाने की है।