क्यों थी आखिरी बादशाह ज़फ़र को हिंदुस्तान से मोहब्बत

हिंदुस्तान के लिए बहादुर शाह जफर की मोहब्बत

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बहादुरशाह ज़फ़र ने न सिर्फ गालिब, दाग, मोमिन और जौक जैसे उर्दू के बड़े शायरों को तमाम तरह से प्रोत्साहन दिया, बल्कि वह स्वयं एक अच्छे शायर थे। वह न सिर्फ अच्छे शायर थे बल्कि मिजाज से भी बादशाह कम, शायर ज्यादा थे।

बहादुर शाह जफर
बहादुर शाह जफर
उन्होंने बहुत सी मशहूर उर्दू कविताएं लिखीं, जिनमें से काफी अंग्रेजों के खिलाफ बगावत के समय मची उथल-पुथल के दौरान खो गई या नष्ट हो गई। देश से बाहर रंगून में भी उनकी ग़ज़लों का जलवा रहा। 

ज़फर मुगल सल्तनत का उजड़ा हुआ नूर थे। वह सल्तनत जिसने पूरे हिंदुस्तान में अपना परचम लहराया था- जिसने हिंदुस्तान को एक नए रंग में ढाल दिया था– अब देश तो दूर, दिल्ली में भी बस नाम भर की थी।

मुगल साम्राज्य के आखिरी बादशाह, कट्टर वतनपरस्त और मकबूल शायर बहादुरशाह ज़फ़र का जिक्र किए बिना भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की कोई कहानी पूरी नहीं होती है। उनको अपने हिंदुस्तान से बेइंतहा प्यार था। आज (24 अक्तूबर) उनकी जयंती है। उन्होंने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में हिंदुस्तानी सिपाहियों का नेतृत्व किया। युद्ध में हार के बाद अंग्रेजों ने उन्हें बर्मा (अब म्यांमार) भेज दिया। मृत्यु के बाद उन्हें वहीं दफन कर दिया गया। उन्होंने बहुत सी मशहूर उर्दू कविताएं लिखीं, जिनमें से काफी अंग्रेजों के खिलाफ बगावत के समय मची उथल-पुथल के दौरान खो गई या नष्ट हो गई। देश से बाहर रंगून में भी उनकी ग़ज़लों का जलवा रहा। उनकी शायरी भावुक कवि की बजाय देशभक्ति के जोश से भरी रहती थी और यही कारण था कि उन्होंने अंग्रेज शासकों को तख्ते-लंदन तक हिन्दुस्तान की शमशीर (तलवार) चलने की चेतावनी दी थी। ऐसे अफसोसनाक आखिरी दिनो में उन्होंने लिखा।

कितना है बदनसीब 'ज़फर' दफ्न के लिए, दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में।

बहादुरशाह ज़फ़र ने न सिर्फ गालिब, दाग, मोमिन और जौक जैसे उर्दू के बड़े शायरों को तमाम तरह से प्रोत्साहन दिया, बल्कि वह स्वयं एक अच्छे शायर थे। वह न सिर्फ अच्छे शायर थे बल्कि मिजाज से भी बादशाह कम, शायर ज्यादा थे। ऐसे शायर के दिल पर क्या गुज़री होगी, जो बादशाह रहा हो और जिसका सब कुछ ख़त्म हो गया हो। उनकी शायरी में एक अजीब तरह का दर्द छिपा हुआ है. विद्रोह और फिर उनके रंगून में निर्वासित होने के बाद ये ग़म और भी स्पष्ट तौर पर उनकी शायरी में नज़र आता है।

वह लिखते हैं- 'मुझे बहुत बड़ा हाकिम बनाया होता या फिर मुझे सूफ़ी बनाया होता, अपना दीवाना बनाया होता लेकिन बुद्धिजीवी न बनाया होता- या मुझे अफ़सरे-शाहाना बनाया होता, या मेरा ताज गदायाना बनाया होता, अपना दीवाना बनाया मुझे होता तूने, क्यों ख़िरदमंद बनाया न बनाया होता।' अंग्रेजों की कैद में दिल्ली से विदा होते वक्त ज़फ़र ने अपना दर्द कुछ इस तरह बयान किया -

जलाया यार ने ऐसा कि हम वतन से चले।
बतौर शमा के रोते इस अंजुमन से चले।
न बाग़बां ने इजाज़त दी सैर करने की,
शी से आए थे रोते हुए चमन से चले।

कम ही शासक होते हैं जो अपने देश को महबूबा की तरह मोहब्बत करते हैं और कू-ए-यार में जगह न मिल पाने की कसक के साथ परदेस में दम तोड़ देते हैं। यही बुनियादी फ़र्क़ था मूलभूत हिंदुस्तानी विचारधारा के साथ, जो अपने देश को अपनी माँ मानते है। अपनी बर्बादी के साथ-साथ बहादुर शाह ज़फ़र ने दिल्ली के उजड़ने को भी बयान किया है। वह एक ऐसी बड़ी हस्ती थे, जिनका बादशाह के तौर पर ही नहीं एक धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति के रूप में भी सभी सम्मान करते थे। ऐसे में स्वाभाविक था कि मेरठ से विद्रोह कर जो सैनिक दिल्ली पहुंचे, उन्होंने सबसे पहले बहादुर शाह जफर को अपना बादशाह बनाया। अपनी एक ग़ज़ल में उन्होंने उर्दू शायरी के मिज़ाज में ढली हुई अपनी बर्बादी की दास्तान कुछ इस तरह बयान की है -

न किसी की आँख का नूर हूँ, न किसी के दिल का क़रार हूँ
जो किसी के काम न आ सके, मैं वो एक मुश्ते ग़ुबार हूं
मेरा रंग-रूप बिगड़ गया, मेरा यार मुझसे बिछड़ गया
जो चमन ख़िज़ां से उजड़ गया, मैं उसी की फ़स्ले-बहार हूं
पए फ़ातिहा कोई आए क्यों, कोई चार फूल चढ़ाए क्यों
कोई आके शमा जलाए क्यों, मैं वो बेकसी का मज़ार हूं
मैं नहीं हूं नग़्म-ए-जांफ़ज़ा, मुझे सुन के कोई करेगा क्या
मैं बड़े बिरोग की हूं सदा, मैं बड़े दुखी की पुकार हूं,

सुपरिचित लेखक रूपसिंह चन्देल लिखते हैं- 'बहुत पुरानी बात नहीं है। सिर्फ डेढ़ सौ साल पहले भारत के इतिहास ने एक अप्रत्याशित करवट ली थी। अंग्रेजी राज के खिलाफ एक बड़ी बगावत पूरे उत्तर भारत में वेगवती आंधी बन उठी थी। अंग्रेजी सेना के भारतीय सिपाहियों ने विद्रोह कर दिया था। यह विद्रोह गांवों के किसानों और गढ़ियों के सामंतों तक फैल गया। बादशाह बहादुरशाह ज़फर को विद्रोहियों ने अपना नेतृत्व दिया। ज़फर बूढ़े थे, बीमार और कमजोर भी। पर उनकी कुछ खासियतें भी थीं। औरंगजेब ने धार्मिक कट्टरता की जो गांठ इस देश पर लगा दी थी, उसकी कुछ गिरहें ज़फर ने खोली थीं।

वे अकबर की परम्परा और सूफी मिजाज के शख्स थे। अपनी सीमित शक्तियों और मजबूरियों के बावजूद उन्होंने अपने कार्यकाल में जो भी करने की कोशिश की, उससे पता चलता है कि वे इस देश से सचमुच प्यार करते थे और नितांत प्रतिकूल समय में भी वे उस परम्परा के वाहक थे, जो हिन्दुस्तान की माटी से उपजी और विकसित हुइ थी। ज़फर मुगल सल्तनत का उजड़ा हुआ नूर थे। वह सल्तनत जिसने पूरे हिंदुस्तान में अपना परचम लहराया था- जिसने हिंदुस्तान को एक नए रंग में ढाल दिया था– अब देश तो दूर, दिल्ली में भी बस नाम भर की थी।

हकीकत तो यह है कि वह लाल किले तक महदूद थी। वह 7 अक्टूबर, 1858 की सुबह थी। 6 अक्टूबर की रात बिस्तर पर जाते समय बादशाह ने कल्पना भी न की थी कि उन्हें भोर से पहले ही जगा दिया जाएगा और तैयार होकर प्रस्थान करने के लिए कहा जाएगा….कहां के लिए, यह पूछने का अधिकार भी अब उस पराजित बादशाह को नहीं था। वही नहीं, उनके साथ चल रहे काफिले के 31 सदस्यों में से किसी को भी यह भान नहीं था। अंग्रेजों ने सब कुछ अत्यंत गोपनीय रखा था। लेफ्टीनेंट ओमनी को बादशाह की सुरक्षित यात्रा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। उसने ठीक 3 बजे बादशाह और अन्य लोगों को जगाकर एक घण्टे में तैयार हो जाने का फरमान सुनाया था। बाहर बल्लम-बरदार घुड़सवार सैनिक तैनात थे। बादशाह बहादुरशाह ज़फर को दिल्ली छोड़नी थी। जाना कहां था यह उन्हें नहीं बताया गया था। वे एक हारे हुए बादशाह थे। गनीमत यह थी कि उन्हें मौत के घाट नहीं उतार दिया गया था। सिर्फ देश-निकाला मिला था।

वे वह जंग हार गए थे जिसका उन्होंने न एलान किया था, न आगाज। न रणभूमि में उतरे थे, न कमान संभाली थी। जिस तरह वे मुगलों की सिमटी हुई सल्तनत के प्रतीकात्मक बादशाह थे उसी तरह 1857 के विद्रोही सिपाहियों ने उन्हें अपना प्रतीकात्मक नेतृत्व दे रखा था।' जाते-जाते भी वह अपने वतन की मोहब्बत को कितना लाजवाब, सुफ़ियाना और देसी रंग में डूबा हुआ संदेश दे गए -

कौन नगर में आए हम कौन नगर में बासे हैं
जाएंगे अब कौन नगर को मन में अब हरासे हैं
देस नया है भेस नया है, रंग नया है ढ़ंग नया है
कौन आनंद करे है वां और रहते कौन उदासे हैं
क्या क्या पहलू देखे हमने गुलशन की फुलवारी में
अब जो फूले उसमें फूल, कुछ और ही उसमें बासे हैं
दुनिया है ये रैन बिसारा, बहुत गई रह गई थोड़ी सी
उनसे कह दो सो नहीं जावें नींद में जो नंदासे हैं

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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