कहानी फिल्मफेयर अवॉर्ड पाने वाले पहले मेल सिंगर की

'कहता है जोकर सारा जमाना, मजहब है अपना हंसना-हंसाना', जितने जादुई शब्द उतनी ही जादुई आवाज में ये गाना गाया गया है। एक ऐसी आवाज, जिसे सुनकर लगता है कि ऐसा तो हम भी गा सकते हैं और गायक कोई और नहीं मुकेश हैं।

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साल 1959 में ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म 'अनाड़ी' ने राज कपूर को पहला फिल्मफेयर अवॉर्ड दिलाया। लेकिन कम ही लोगों को पता है कि राज कपूर के सबसे जिगरी दोस्त को भी अनाड़ी फिल्म के एक गाने के लिए बेस्ट प्लेबैक सिंगर का फिल्मफेयर अवार्ड मिला था। आईये जानें उस प्लेबैक सिंगर के बारे में जो हिन्दी सिनेमा जगत में फिल्मफेयर पुरस्कार पाने वाले पहले पुरुष गायक थे।

प्लेबैक सिंगर मुकेश चंद्र माथुर, जो पहले पुरुष गायक थे जिन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार मिला
प्लेबैक सिंगर मुकेश चंद्र माथुर, जो पहले पुरुष गायक थे जिन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार मिला
मुकेश ने 40 साल के लंबे करियर में लगभग 200 से अधिक फिल्मों के लिए गीत गाए। मुकेश हर सुपरस्टार की आवाज बने। उनके गाए गीतों को लोग आज भी गुनगुनाते हैं। उनके गीत हमारी रोजमर्रा की जिंदगी से कहीं न कहीं जुड़ते हैं और यही नहीं, उनके गाए नगमें आज के नए गीतों को टक्कर देते हैं, जिनका रीमिक्स भी बनता है।

'कहता है जोकर सारा जमाना, मजहब है अपना हंसना-हंसाना', जितने जादुई शब्द उतनी ही जादुई आवाज में ये गाना गाया गया है। एक ऐसी आवाज, जिसे सुनकर लगता है कि ऐसा तो हम भी गा सकते हैं। इस गायक का नाम है मुकेश चंद्र माथुर। मुकेश ने अपने 40 साल के लंबे करियर में लगभग 200 से अधिक फिल्मों के लिए गीत गाए। मुकेश हर सुपरस्टार की आवाज बने। उनके गाए गीतों को लोग आज भी गुनगुनाते हैं। उनके गीत हमारी रोजमर्रा की जिंदगी से कहीं न कहीं जुड़ते हैं और यही नहीं, उनके गाए नगमें आज के नए गीतों को टक्कर देते हैं और रीमिक्स के रूप में भी सुनने को मिलते हैं।

एक गीत है, 'झूमती चली हवा, याद आ गया कोई' शास्त्रीय संगीत पर आधारित इस गाने की भी खासियत है सहजता। दिल को छू लेने का अपना अंदाज। यही खासियत थी मुकेश की, जिस कान में सुनाई पड़े वहां मिश्री की तरह घुल कर अनंतजीवी हो उठे।

मुकेश ने हर तरीके के गाने गाए लेकिन उन्हें दर्द भरे गीतों से अधिक पहचान मिली, क्योंकि दिल से गाए हुए गीत लोगों के जेहन में ऐसे उतरे कि लोग उन्हें आज भी याद करते हैं। 'दर्द का बादशाह' कहे जाने वाले मुकेश ने 'अगर जिंदा हूं मैं इस तरह से', 'ये मेरा दीवानापन है', 'ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना', 'दोस्त दोस्त ना रहा' जैसे कई गीतों को अपनी आवाज दी।

जब मायानगरी को मिली गानों की हिट-मशीन

22 जुलाई 1923 को दिल्ली में जन्मे मुकेश अपने दौर के ऐसे गायक थे, जिन्हें शास्त्रीय संगीत के लिए नहीं जाना जाता था, लेकिन औसत के लिहाज से देखें, तो मुकेश के हिट गाने सबसे आगे दिखाई देंगे। मुकेश के पिता जोरावर चंद माथुर इंजीनियर थे। दस बच्चों में मुकेश छठे नंबर पर थे। मुकेश की बहन सुंदर प्यारी को संगीत सिखाने एक शिक्षक आते थे। मुकेश साथ के कमरे से सुनते और सीखते थे। दसवीं के बाद उन्होंने स्कूल छोड़ दिया और कुछ समय पीडब्ल्यूडी में काम किया। उन्हें मोतीलाल ने अपनी बहन की शादी में गाते सुना, जो उनके दूर के रिश्तेदार थे।

मोतीलाल उन्हें मुंबई ले आये, जहां पंडित जगन्नाथ प्रसाद से मुकेश ने सीखना शुरू किया। मुकेश ने अपना फिल्मी सफर 1941 में शुरू किया। फिल्म 'निर्दोष' में मुकेश ने अदाकारी करने के साथ-साथ गाने भी खुद गाए। इसके अलावा, उन्होंने 'माशूका', 'आह', 'अनुराग' और 'दुल्हन' में भी बतौर अभिनेता काम किया।

फिल्‍म फेयर पुरस्‍कार पाने वाले पहले पुरुष गायक

साल 1959 में ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म 'अनाड़ी' ने राज कपूर को पहला फिल्मफेयर अवॉर्ड दिलाया। लेकिन कम ही लोगों को पता है कि राज कपूर के जिगरी दोस्त मुकेश को भी अनाड़ी फिल्म के 'सब कुछ सीखा हमने न सीखी होशियारी' गाने के लिए बेस्ट प्लेबैक सिंगर का फिल्मफेयर अवार्ड मिला था। मुकेश फिल्मफेयर पुरस्कार पाने वाले पहले पुरुष गायक थे। उन्हें फिल्म 'अनाड़ी' से 'सब कुछ सीखा हमने', 1970 में फिल्म 'पहचान' से 'सबसे बड़ा नादान वही है', 1972 में 'बेइमान' से 'जय बोलो बेईमान की जय बोलो' के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार से नवाजा गया। फिल्म 1974 में 'रजनीगंधा' से 'कई बार यूं भी देखा है' के लिए नेशनल पुरस्कार, 1976 में 'कभी कभी' से 'कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है' के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया है।

जब गाने की खातिर कॉन्फिडेंस लाने के लिए मुकेश ने पी ली थी शराब

सन 1944 में अनिल विश्वास ने फिल्म 'पहली नजर' के लिए धुनें तैयार कीं तो उन्हें मुकेश याद आ गए। उन्होंने मुकेश को बुलाया और एक गीत दिल 'जलता है तो जलने दे, आंसू न बहा फरियाद न कर' की रिहर्सल कराई। रिहर्सल के बाद उन्होंने मुकेश को अगले दिन एचएमवी स्टूडियो में रिकार्डिंग के लिए आने को कहा।

मुकेश के लिए अनिल विश्वास के संगीत निर्देशन में गाना एक बड़ा अवसर था। वे ये मौका पाकर खुश तो थे लेकिन साथ में नर्वस भी थे क्योंकि पहले एक बार अनिल विश्वास ने उन्हें सुनने के बाद मौका देने से मना कर दिया था। मुकेश ने आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए थोड़ी शराब पीने का मन बना लिया और एक जगह बैठ गये। उनके पीने का सिलसिला धीरे-धीरे लंबा होता गया। वे एक के बाद एक कई पैग पी गये। अनिल विश्वास ने स्टूडियो में रिकॉर्डिंग की तैयारी कर रखी थी। कई घंटे के इंतजार के बाद भी जब मुकेश नहीं आये तो उन्होंने उनके बारे में पता किया। इसके बाद अनिल विश्वास उस स्थान पर जा पहुंचे जहां मुकेश पीने में मशगूल थे। उन्होंने मुकेश को पकड़ा और साथ में स्टूडियो ले आए। मुकेश ने कहा कि वे नहीं गा सकते, बहुत पी ली है। इस पर अनिल विश्वास ने उनके सिर पर पानी उड़ेल दिया और कहा कि तुम्हें तो आज ही गाना पड़ेगा और रिकार्डिंग करानी पड़ेगी।

इसके बाद गाने की रिकार्डिंग हुई। 'दिल जलता है तो जलने दे' ये गाना फिल्म में जब आया तो श्रोता और दर्शक ये मानने के लिए तैयार नहीं थे कि ये गीत केएल सहगल ने नहीं बल्कि मुकेश ने गाया है। गीत सुपर हिट हुआ और इसके साथ मुकेश फिल्म संगीत के रसिकों के चहेते बन गये। 'पहली नजर' का उनका ये गीत आज भी सुना-गुनगुनाया जा रहा है। क्या कोई सोच सकता है कि ये एक नर्वस गायक ने शराब के सुरूर में गाया था?
जब केएल सहगल ने मुकेश का गाया ये गीत सुना, तो कहा कि 'ताज्जुब है, मुझे याद नहीं आ रहा कि मैंने ये गाना कब गाया।'

'जग में रह जाएंगे प्यारे तेरे बोल'

मुकेश का निधन 27 अगस्त, 1976 को अमेरिका में एक स्टेज शो के दौरान दिल का दौरा पड़ने से हुआ। उस समय वे गा रहे थे- 'एक दिन बिक जाएगा माटी के मोल, जग में रह जाएंगे प्यारे तेरे बोल'। सचमुच, दुनिया से ओझल हो चुके मुकेश के गाए बोल जग में आज भी गूंज रहे हैं और हमेशा गूंजते रहेंगे।

-मन्शेष

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