इसरो ने रचा कीर्तिमान, 100वें सैटेलाइट मिशन से छोड़े 31 उपग्रह

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 इस सैटलाइट को श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस रिसर्च सेंटर से सुबह साढ़े नौ बजे प्रक्षेपित किया गया। कार्टोसैट-2 सीरीज के इस मिशन के सफल होने के बाद धरती की अच्छी गुणवत्ता वाली तस्वीरें मिलेंगी।

सहयात्री उपग्रहों में भारत की तरफ से एक माइक्रोसैटेलाइट और एक नैनोसैटेलाइट है। इसके अलावा बाकी 6 देशों से 25 नैनोसैटेलाइट भेजे गाए हैं। 

इस साल 2018 के प्रारंभ में भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी दो चंद्र अभियान शुरू करेगी। चंद्रयान-2 इससे पहले के चंद्रयान-1 का परिष्‍कृत संस्‍करण होगा। इसके अंतर्गत स्‍वदेशी क्षमता से निर्मित आर्बिटर, लैंडर और रोवर का निर्माण किया जाएगा।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान एजेंसी इसरो ने शुक्रवार को PSLV-C40 सीरीज सैटेलाइट मिशन के तहत अपना 100वां सैटेलाइट, कार्टोसैट-2 को भेजकर एक नया कीर्तिमान स्थापित कर लिया है। इसमें कनाडा, फ्रांस, अमेरिका और ब्रिटेन के 28 और भारत के भी तीन सैटेलाइट शामिल हैं। इस सैटलाइट को श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस रिसर्च सेंटर से सुबह साढ़े नौ बजे प्रक्षेपित किया गया। कार्टोसैट-2 सीरीज के इस मिशन के सफल होने के बाद धरती की अच्छी गुणवत्ता वाली तस्वीरें मिलेंगी। इन तस्वीरों का इस्तेमाल सड़क नेटवर्क की निगरानी, अर्बन ऐंड रूरल प्लानिंग के लिए किया जा सकेगा।

भारत के पोलर सैटेलाइट लॉन्च वीकल (PSLV) ने अपनी 42वें अभियान के तहत (PSLV-C40) से 710 किलो का कार्टोसैट सीरीज का सैटेलाइट लॉन्च किया है। इसके साथ ही र्टोसेट-2 श्रृंखला के उपग्रह और 30 सह-यात्रियों को भी भेजा गया है जिनका कुल वजन करीब 613 किलोग्राम है। सहयात्री उपग्रहों में भारत की तरफ से एक माइक्रोसैटेलाइट और एक नैनोसैटेलाइट है। इसके अलावा बाकी 6 देशों से 25 नैनोसैटेलाइट भेजे गाए हैं। इनमें कनाडा, फिनलैंड, फ्रांस, कोरिया, ब्रिटेन और अमेरिका शामिल हैं। PSLV-C40 पर सभी 31 सैटेलाइट्स का वजन लगभग 1323 किलोग्राम है।

भारत ने बीते साल 5 जून को अपने सबसे शक्तिशाली, स्‍वदेश निर्मित और अब तक के सबसे भारी संचार उपग्रह जीसैट-19 को भू स्थिर अंतरिक्ष प्रक्षेपण वाहन मार्क-III (जीएसएलवी एमके- III डी 1) के जरिए प्रक्षेपित कर अंतरिक्ष टेक्‍नोलाजी के क्षेत्र में दुनिया के गिने-चुने अग्रणी देशों की जमात में अपनी जगह बनायी। 3,136 किग्रा वजन के इस उपग्रह ने चार टन तक के उपग्रहों को प्रक्षेपित करने की इसरो की क्षमता को साबित कर दिया। इससे स्‍वदेशी क्षमता से क्रायोजेनिक इंजन बनाने की हमारी क्षमता का भी परीक्षण हुआ और भविष्‍य में मनुष्‍य को धरती के वायुमंडल से दूर अंतरिक्ष में भेजने का मार्ग प्रशस्‍त हो गया। अब भारत अपने संचार उपग्रहों को खुद ही अंतरिक्ष में भेज सकता है। अब तक सिर्फ अमेरिका, रूस, यूरोप, चीन और जापान ने 4 हजार किग्रा या इससे अधिक वजन के उपग्रहअंतरिक्ष में प्रक्षेपित किये थे।

इससे पहले बीते साल 5 मई को भारत ने पहला दक्षिण एशिया उपग्रह (एसएएस) अंतरिक्ष में छोड़ कर अपने छह पड़ोसी देशों अफगानिस्‍तान, बंगलादेश, भूटान, मालदीव, नेपाल और श्रीलंका के बीच संचार को बढ़ावा देने और आपात संपर्क मजबूत करने में कामयाबी हासिल की थी। इसरो निर्मित और पूरी तरह भारत द्वारा वित्‍त पोषित 2,230 किग्रा वजन के जीसैट-9 उपग्रह के जीएसएलवी-एफ09 राकेट से प्रक्षेपण के बाद प्रधानमंत्री ने कहा था कि इस अभूतपूर्व घटनाक्रम से दुनिया को यह संदेश गया है कि अगर क्षेत्रीय सहयोग का सवाल है तो आसमान भी इसकी सीमा नहीं बन सकता।

सैटेलाइट/कार्टोसैट-42 के तहत छोड़े जाने वाले सैटेलाइट
सैटेलाइट/कार्टोसैट-42 के तहत छोड़े जाने वाले सैटेलाइट

भारत ने पहली बार केरल में एक मछुआरों के अनजाने से गांव थुंबा से अमेरिका में बने दो चरणों वाले 'नाइक-अपाचे' साउंडिंग राकेट को छोड़ कर अंतरिक्ष में पहली बार अपनी उपस्थिति दर्ज की थी। यह भारत का पहला राकेट था। उस समय तिरुअनंतपुरम के बाहरी इलाके में स्थित थुंबा के भूमध्‍यरेखीय रॉकेट प्रक्षेपण स्‍टेशन (टीईआरएलएस) में इमारत नाम की कोई चीज नहीं थी। वहां के सेंट मैरी मैगदालेने गिरजाघर के बिशप का घर ही प्रॉजेक्ट डायरेक्टर का ऑफिस बन गया था और चर्च की इमारत में नियंत्रण कक्ष खोल दिया गया था।

21 नवंबर, 1963 को यहीं से राकेट के प्रक्षेपण के बाद धुंए की लकीर के सहारे नंगी आंखों से रॉकेट की ट्रैकिंग की जा रही थी। रॉकेट के हिस्‍सों और प्‍लेलोड को बैलगाडि़यों और साइकिलों पर लाद कर लाउंच पैड तक पहुंचाया गया। 12 साल बाद 1975 में भारत ने पहली बार अपना परीक्षण उपग्रह आर्यभट्ट एक रूसी रॉकेट से आसमान में छोड़ा। बुनियादी ढांचे के न होने से भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन बेंगलुरू के वैज्ञानिकों ने उस समय एक टॉयलट को आंकड़े प्राप्‍त करने के केन्‍द्र में तब्‍दील कर दिया था।

थुंबा में शिशु के पहले कदम की तरह शुरुआत करने के बाद भारत ने अपने अंतरिक्ष के सफर में कई मील के पत्‍थर पार कर लिये हैं। इसरो उपग्रहों का निर्माण और प्रक्षेपण करने वाले दुनिया के प्रमुख संगठन के रूप में उभर कर सामने आया है। दुनिया ने खोजी चंद्र यान प्रक्षेपित करने की भारत की क्षमता को मान्‍यता दी है। आज हमारा देश अपने लिए और दूसरे देशों के लिए उपग्रहों का निर्माण करने के साथ-साथ उनक प्रक्षेपण भी कर रहा है। इतना ही नहीं हमने मंगल ग्रह तक पहुंचने में भी कामयाबी हासिल की है।

भारत को दुनिया में कम लागत पर अंतरिक्ष संबंधी सेवा प्रदाता देश के रूप में प्रचारित-प्रसारित करने की प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी की परिकल्‍पना को बढ़ावा देते हुए इसरो ने 23 जून 2017 को पीएसएलवी सी-38 का प्रक्षेपण किया। इसके जरिए पृथ्‍वी के प्रेक्षण के लिए 712 कि.ग्रा. वजन के कार्टोसेट-2 के साथ-साथ छोटे-छोटे 30 अन्‍य उपग्रह भी आकाश में भेजे गये जिनमें से कई यूरोप के देशों के थे। पीएसएलवी का यह एक के बाद दूसरी लगातार सफलता प्राप्‍त करने वाला 39 वां मिशन था।

इन महान उपलब्धियों ने इसरो को अंतरिक्ष की दौड़ में बड़ी मजबूत स्थिति में ला दिया है। अंतरिक्ष अनुसंधान और इसरो को लेकर प्रधानमंत्री कितने संवेदनशील हैं इसका पता इस साल के बजट आबंटन में अंतरिक्ष विभाग के खर्च में 23 प्रतिशत की जोरदार बढ़ोतरी से स्‍पष्‍ट रूप से लगाया सकता है। इस साल 2018 के प्रारंभ में भारतीय अंतरिक्षएजेंसी दो चंद्र अभियान शुरू करेगी। चंद्रयान-2 इससे पहले के चंद्रयान-1 का परिष्‍कृत संस्‍करण होगा। इसके अंतर्गत स्‍वदेशी क्षमता से निर्मित आर्बिटर, लैंडर और रोवर का निर्माण किया जाएगा। इस अभियान के जरिए चंद्रमा की सतह पर खनिज विज्ञान और तत्‍व संबंधी अध्‍ययन किये जाएंगे। दूसरा अभियान टीम इंडस नाम के अंतरिक्ष में दिलचस्‍पी रखने वाले ग्रुप के सहयोग से चलाया जाएगा।

मंगल मिशन
मंगल मिशन

अगली बड़ी परियोजना सूर्य से संबंधित वैज्ञानिक मिशन की है जिसमें कोरोनाग्राफ नाम की एक दूरबीन से सूर्य की तीन प्रमुख बाहरी पर्तों कोरोना, फोटोस्‍फीयर और क्रोमोस्‍फीयर के साथ ही सौर पवन का अध्‍ययन किया जाएगा। इसके अंतर्गत पीएसएलवी XL के जरिए 2020 में आदित्‍य-एल1 का प्रक्षेपण किया जाएगा। यह उपग्रह इस बात का पता लगाएगा कि सौर ज्‍वालाओं और सौर पवन से धरती के संचार नेटवर्क और इलेक्‍ट्रानिक्‍स प्रणालियों में व्‍यवधान क्‍यों आता है।

इसके बाद इसरो संभवत: 2021-22 में एक बार फिर से मंगल का भी रुख करेगा और मंगलयान-2 नाम का दूसरा मंगल आर्बिटर मिशन (एमओएम) अंतरिक्ष में भेजेगा। इसके बाद सितंबर 2024 के आते-आते किसी दूसरे ग्रह की पड़ताल पर निकले भारत के रोबोटयुक्‍त अंतरिक्ष यान मंगलयान-1 का अभियान पूरे जोरों पर होगा और यह रक्तिम आभा वाले मंगल ग्रह पर अपने उतरने की तीसरी जयंती मनाएगा। भारत दुनिया का पहला राष्‍ट्र है जिसने किसी ग्रह के लिए अपने पहले ही मिशन में मंगल की कक्षा में पहुंच कर इतिहास रचा है। इतना ही नहीं हमारा यह मिशन खर्च के लिहाज से अब तक का सबसे सस्‍ता मिशन साबित हुआ है। 2020 के बाद भारत पहली बार शुक्र का अभिसार करेगा। शुक्र का आर्बिटर मिशन इस ग्रह के वातावरण का अध्‍ययन करेगा।

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