आखिर, कैसे चले कवि-लेखकों की रोजी-रोटी! 

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जो कवि-लेखक किसी न किसी पेशे से जुड़े होते हैं, उनकी घर-गृहस्थी तो चल जाती है लेकिन नौकरी या व्यवसाय उनकी लेखनी की स्वाधीनता को पंगु बना देता है। कवि-लेखक आजादी चाहता है। जब वह आजादी के साथ लिखना चाहता है, घर-गृहस्थी की गाड़ी डगमगाने लगती है। ऐसे में ख्यात लेखक मोहन राकेश कहते हैं, इस दोहरी स्थिति के लिए लेखक खुद जिम्मेदार हैं।

मोहन राकेश
मोहन राकेश
विदेशों में लेखन को कॅरियर बनाने की परिपाटी रही है, परन्तु वहाँ पर लोग टीम-वर्क के साथ काम करते हैं इसिलिए रचनाओं में रचनात्मकता के साथ दिशा भी मौजूद होती है, जो रचनाओं के स्तर को नीचे नहीं गिरने देती है।

बहुत पहले प्रसिद्ध उपन्यासकार मोहन राकेश ने आज तक अप्रकाशित रहे अपने एक विदेशी साक्षात्कार में कहा था कि भारतीय लेखक अपनी आर्थिक तंगी के लिए खुद जिम्मेदार हैं। पारिश्रमिक अथवा रॉयल्टी को लेकर कोई कदम उठाने में उन्हें खुद सांप सूंघ जाता है। एक के समय में एक तरफ समाज में, व्यवस्था में शब्दों को यथोचित सम्मान नहीं मिल पा रहा है, साथ ही सिर्फ रचना-कर्म के भरोसे लेखक का जीवन यापन भी कत्तई असहज होता जा रहा है। ऐसे में कवि-आलोचक सुशील कुमार तो कहते हैं कि चाहे जिसने भी लेखन को अपना करियर बना लिया हो, वह अच्छा नहीं लिख सकता, उसका लेखन 'प्रायोजित' होकर रह जाता है। इस पर अलग-अलग सहमति-असहमतियां हैं? प्रकाशकों से समय पर रॉयल्टी न मिलने का एक अलग दंश।

गीत-कवि माहेश्वर तिवारी कहते हैं, सुशील कुमार के इस कथन से सहमत नहीं हुआ जा सकता। सवाल निष्ठा और ईमानदारी से लेखकीय दायित्व के चयन का है। गीत-कवि राम सेंगर का कहना है, यह सुशील कुमार के नज़रिये का विश्वास हो सकता है, लेकिन, ऐसा ही होता है- यह कहना सही नहीं है। अब स्थितियां बहुत बदल गयी हैं, जबकि, देखा जाये तो पुराने समय में फ्रीलांसर्स ने ही तुलनात्मक दृष्टि से अपने समय का श्रेष्ठतम रचा है और कालजयी कृतियाँ दी हैं। इस सच्चाई की प्रामाणिकता स्वयंसिद्ध है।

युवा कवि संजीव जैन का कहना है कि अच्छा लिखने के कई अर्थ हो सकते हैं। अगर अर्थ नैसर्गिक एवं अर्थपूर्ण लेखन से है तो शायद लेखन प्रभावित हो क्योंकि तब demand supply के सिद्धांत से लेखन होने की संभावना बढ़ जाती है। और अगर अच्छे लेखन से तात्पर्य सिर्फ qualitative लेखन से है तो लेखक अपनी विधा से अच्छा लिखना जारी रख सकता है। मुकेश सैनी कहते हैं कि सुशील कुमार ने बिलकुल उचित कहा है क्योंकि फिर लेखक की रचनाओं में उसके अंतःकरण की स्वतंत्रता का पूरी तरह से अभाव झलकता है और उसकी जगह दूसरों की पसंद-नापसंद का भाव प्रभावी हो जाता है।

अमित सिंह का अभिमत है कि विदेशों में लेखन को कॅरियर बनाने की परिपाटी रही है। वहाँ कई लेखक मिलकर एक रचना को एक प्रोजेक्ट की तरह तैयार करते हैं। निःसंदेह इस प्रकार से कई बेहतरीन रचनाएं आई हैं। इस भाँति लेखन को करियर के रूप में अपनाना कुछ गलत नहीं है तथा यह लेखक के रचनात्मक कौशल पर निर्भर करता है कि वह किस स्तर की रचना पेश कर पाता है। विनोद सिंह कहते हैं, विदेशों में लेखन को कॅरियर बनाने की परिपाटी रही है, परन्तु वहाँ पर लोग टीम-वर्क के साथ काम करते हैं इसिलिए रचनाओं में रचनात्मकता के साथ दिशा भी मौजूद होती है, जो रचनाओं के स्तर को नीचे नहीं गिरने देती है।

अंधी अर्थव्यवस्था ने साहित्य का भी इतिहास-भूगोल विद्रूप कर रखा है। सब उल्टा-पुल्टा सा। अंदर ही अंदर कवि-साहित्यकारों, रचनाकारों में पुरस्कारों, प्रकाशन संस्थानों को लेकर अपना आक्रोश और बेचैनी है तो ऐसे अकादमियों, प्रतिष्ठानों की राजनीतिक घेरेबंदियां और बाजार-व्यवसाय से घिरे प्रकाशक समुदाय की अपनी अलग तरह की चुनौतियां हैं। कुल मिलाकर भ्रष्टाचार भी इन समस्त प्रकार की चुनौतियों के बीच पूरी मुखरता से अपना दुखद रोल अदा कर रहा है। पहले खादी का कुर्ता, आंखों पर चश्मा और जेब में कम पैसे जैसी तस्वीर उभरती रही थी किसी लेखक की। पर अब ट्रेंड बदल रहा है।

अब बड़े इंस्टिट्यूट से डिग्रियां लेने वाले बेस्टसेलर लेखकों की लिस्ट में शुमार हो रहे हैं। वे उद्यमी भी हैं और मोटिवेशनल स्पीकर भी। इनमें से कई लोगों को तो फिल्म और सीरियल लिखने के ऑफर मिल जा रहे हैं। वे प्रकाशकों के साथ किताबी हिसाब-किताब में नहीं फंसना चाहते हैं। एक वर्ग ऐसा भी जो लुगदी-लेखन, फेसबुकिया आह-वाह पर बुलबुले ताड़ते हुए ऊंची छलांग में खुद-ब-खुद शुमार हो ले रहा है, प्रकाशन संस्थानों को मुंह मांगी कीमत देकर धंधा थामे हुए है, ऐसे में गंभीर संकट उस वर्ग के कवि-लेखकों के सामने है, जिनकी किताबों की पाठकों को बेसब्री से प्रतीक्षा रहती है। उनके लिए तो ईमानदारी से रॉयल्टी का सवाल गंभीर होते जाना एकदम जायज माना जा रहा है।

चुनौती केवल रॉयल्टी ही नहीं, राइटिंग का बेहतर मुकाम साधना भी है। इसका मतलब लिखते समय इस बात का ध्यान रखा जाए कि किताब छपने के लिए लिखी जा रही है, न कि राइटिंग का सुख लेने के लिए। एक कहानी ये भी है कि आमतौर पर पब्लिशिंग हाउस लेखक से पहले सिनॉप्सिस और सैंपल चैप्टर की मांग करते हैं और उन्हें अपने पैनल से रिव्यू के लिए भेजते हैं। इसके बाद चुनी गई किताबों को बिना नाम के ब्लाइंड रिव्यू के लिए भेजा जाता है। इसके लिए पब्लिशिंग हाउस कई नामी लेखकों को हायर करते हैं और उन्हें पैसे भी देते हैं। इसके बाद ही किताब को छापने और उसके रेट तय करने का सिलसिला शुरू होता है। नए लोगों के लिए यही लेखक का पहला इंप्रेशन है और यही बताता है कि वह कितना ऑर्गेनाइज्ड है।

लेखक की आय की स्थितियों से एक और प्रश्न जुड़ा हुआ है, वैचारिक प्रतिबद्धता का। यह प्रश्न उठते ही व्यवस्था के कान खड़े हो जाते हैं। इस पर ख्यात लेखक मोहन राकेश सविस्तार प्रकाश डालते हैं। दशकों पहले अपने एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि वैचारिक प्रतिबद्धता, पक्ष-विपक्ष के विदेशी कुप्रभाव से क्यों हमारे बुद्धिजीवियों के मन में लालच आया? स्पष्ट बात तो यह है कि इसके लिए हमारे बुद्धिजीवियों और लेखकों की आर्थिक स्थिति ही ज़िम्मेदार रही है। आर्थिक अभाव ही इसकी जड़ में थे। यदि एक बुद्धिजीवी या लेखक की हिदुस्तान में आर्थिक स्थिति अच्छी होती और वह आत्म-निर्भर हो सकता और यदि उसका काम उसे काफी आर्थिक लाभ दे सकता, तो मेरे विचार से निश्चित ही बहुत से इस काम में सहयोग देने को तैयार न होते और स्वयं अपने पैरों पर खड़े होकर उनमें ऐसे प्रस्तावों को ठुकरा देने का साहस पैदा कर सकते थे। बहुत से लेखक जो ऐसा कर भी सकते थे, वास्तव में कर नहीं सके।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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