घर में स्कूल खोलकर इस महिला ने किया पूरे गांव को शिक्षित

गाँव के बच्चों को 27 सालों से मुफ्त शिक्षा देने वाली सुशीला कोली...

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महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले की सुशीला कोली ने अपने गांव में पिछले 27 सालों से सैकड़ों बच्चों को शिक्षित किया है वो भी बिना किसी फीस के। उन्हें गांव में अब शिक्षा के प्रतीक के रूप में जाना जाता है। 

सुशीला कोली (फोटो साभार- द बेटर इंडिया)
सुशीला कोली (फोटो साभार- द बेटर इंडिया)
देश में शिक्षा का अधिकार कानून भले ही लागू हो गया हो और बच्चे भी स्कूल भले ही चले जाते हों, लेकिन उनकी पढ़ाई की स्थिति कितनी बदहाल है इसका अंदाजा हाल में जारी हुई 'असर' रिपोर्ट से लगाया जा सकता है। 

हाल ही में एक सरकारी संगठन 'प्रथम' ने की शिक्षा के स्तर संबंधी सालाना रिपोर्ट (असर) के आंकडे़ पेश किए हैं। जो कि काफी निराशाजनक स्थिति बयां कर रहे हैं।  ग्रामीण इलाकों में 14 से 18 वर्ष की उम्र के बच्चों के जो भी नमूने एकत्रित किए गए उनमें से 36 फीसद छात्रों को देश की राजधानी का नाम नहीं पता था। वहीं 57 फीसद छात्रों को सामान्य गणित की जानकारी नहीं थी। देश में शिक्षा का अधिकार कानून भले ही लागू हो गया हो और बच्चे भी स्कूल भले ही चले जाते हों, लेकिन उनकी पढ़ाई की स्थिति कितनी बदहाल है इसका अंदाजा इस रिपोर्ट से लगाया जा सकता है। इसके पीछे की वजहों को अगर आप जानने की कोशिश करेंगे तो पता चलेगा कि निचले स्तर पर शिक्षा व्यवस्था की स्थिति ऐसी क्यों है।

भारत में शिक्षा व्यवस्था की दुर्गति के लिए सबसे ज्यादा प्राथमिक स्तर की शिक्षा व्यवस्था जिम्मेदार है। ग्रामीण इलाकों की स्थिति सबसे बुरी हालत में है। लेकिन कई सारे समाज के शुभचिंतक हैं जो इसे बदलने का प्रयत्न कर रहे हैं। बेटर इंडिया के मुताबिक महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले की सुशीला कोली ने अपने गांव में पिछले 27 सालों से सैकड़ों बच्चों को शिक्षित किया है वो भी बिना किसी फीस के। उन्हें गांव में अब शिक्षा के प्रतीक के रूप में जाना जाता है। उनके प्रयासों से गांव में शिक्षा की दिशा ही बदल चुकी है। सुशीला ने आज से लगभग 27 साल पहले देखा था कि उनके लक्ष्मीनगर गांव में छोटे बच्चों को पढ़ाने के लिए कोई स्कूल ही नहीं है।

इस वजह से छोटे बच्चे प्री-स्कूलिंग से वंचित हो जा रहे थे। स्कूल जाने के बजाय काफी कम उम्र के बच्चे अपने माता-पिता के साथ खेतों की ओर चल देते थे। सुशीला को यह देखकर अच्छा नहीं लगा और उन्होंने गांव में आंगनबाड़ी खोलने के बारे में सोचा। लेकिन कोई भी व्यक्ति उनकी मदद नहीं कर रहा था। सरकार की तरफ से भी बहुत थोड़ी मदद मिली थी जो कि नाकाफी थी। लेकिन सुशीला ने सीमित संसाधनों में ही अपने घर पर आंगनबाड़ी खोला और दो सालों तक बच्चों को पढ़ाया। बाद में यह एक मंदिर में स्थानांतरित हो गया।

सुशीला ने बताया, 'शुरू-शुरू में तो बच्चे आंगनबाड़ी आते ही नहीं थे, क्योंकि माता-पिता उन्हें अपने साथ खेत बुला ले जाते थे और वहां काम करवाते थे। लेकिन मुझे यह स्थिति सही नहीं लगी। मैं सबके घर जा जाकर उन्हें समझाती थी और बच्चों को आंगनबाड़ी भेजने को कहती थी।' सुशीला की मेहनत रंग लाई और धीरे-धीरे गांव वाले भी शिक्षा के महत्व को समझने लगे। आंगनबाड़ी में बच्चों की संख्या बढ़ने लगी। सुशीला ने 1991 में आंगनबाड़ी की स्थापना की थी और यह 2002 तक चला। बाद में सरकार ने इसे सरकारी स्कूल में बदल दिया। सुशीला ने कहा कि जितने भी बच्चे यहां पढ़ने आते थे वो गरीब परिवार के होते थे इसलिए उनसे फीस लेने का सवाल ही नहीं उठता। कई बार बच्चों के घरवाले खाने पीने की चीजें सुशीला को दे आते थे, लेकिन उन्होंने कभी पैसे की मांग नहीं की।

सुशीला का जन्म भले ही एक पिछड़े परिवार में हुआ था, लेकिन उनकी सोच एकदम आधुनिक है। उन्होंने बाबूराव कोली से शादी की है जो कि एक खेतिहर मजदूर हैं। यह बाबूराव की दूसरी शादी थी और उनकी पत्नी गुजर गई थीं और उनके दो बच्चे भी थे। जब बाबूराव का रिश्ता सुशीला के घर गया तो घरवालों ने प्रस्तवा ठुकरा दिया, लेकिन सुशीला ने जिद करते हुए कहा कि वो बाबूराव से ही शादी करेंगी और उनके बच्चों का भी ख्याल रखेंगी। बाबूराव भी कहते हैं कि सुशीला से शादी करके उनकी जिंदगी बदल गई। बाबूराव ने अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दी जिसकी बदौलत उनका एक बेटा पास के गांव में सरकारी टीचर है तो वहीं दूसरा असिस्टेंट पुलिस इंस्पेक्टर है। बाबूराव और सुशीला का भी एक बेटा है जो कि प्रोफेसर है और अपनी पीएचडी पूरी कर रहा है। सुशीला बड़े गर्व के साथ कहती हैं कि शिक्षा ही समाज में बदलाव ला सकती है।

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