'यूथ अलाइंस ऑफ इंडिया', युवा अपनी सामाजिक जिम्मेदारी समझें...

- 'यूथ अलाइंस ऑफ इंडिया ' प्रेरित कर रहा है युवाओं को ताकि वे अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को समझें...- शहरी व ग्रामीण युवाओं के लिए हैं कार्यक्रम...- 200 से ज्यादा युवा कर चुके हैं फेलोशिप कार्यक्रम...

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आज ज्यादातर युवा पढ़ाई पूरी करने के बाद एक ऐसी जॉब चाहते हैं जिसमें खूब पैसा हो। आज लोगों में पैसा कमाने की होड़ है। हर कोई अमीर बनना चाहता है। ऐसे युवाओं की संख्या बहुत ही कम रह गई है जो पढ़ाई पूरी करने के बाद समाज के पिछड़े व गरीब लोगों के लिए कुछ करने का जज्बा रखते हों। ऐसे युवाओं की संख्या भी धीरे-धीरे कम होती जा रही है जो दूसरे युवाओं की मदद करने में रुचि लेते हैं। जो युवा ऐसा सोचते और करते हैं वे युवा गेम चेंजर कहलाते हैं। अर्थात अपने काम से वो न सिर्फ समाज का बल्कि देश का भी फायदा करते हैं। एक ऐसे ही युवा हैं प्रखर भारतीय। जो 'यूथ अलाइंस ऑफ इंडिया' के संस्थापक हैं।

प्रखर यूथ अलाइंस के माध्यम से युवाओं को सामाजिक कार्य और सामाजिक दायित्वों के बारे में बताते हैं। इस कार्य के दौरान प्रखर युवाओं को विभिन्न सामाजिक कार्यों में लगे लोगों और एनजीओ से जुड़े लोगों से मिलवाते हैं और उनका मार्गदर्शन करते हैं।

जब प्रखर स्कूल में पढ़ते थे तो उनके स्कूल के पास ही एक झोपड़पट्टी थी। प्रखर जब भी उस झोपड़पट्टी के आगे से आते-जाते तो कभी भी गर्मियों के दिनों में आइसक्रीम नहीं खरीदते थे। इसका कारण यह नहीं था कि उन्हें आइसक्रीम पसंद नहीं थी बल्कि उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि वे वहां आसपास बैठे गरीब बच्चों को भी आइसक्रीम खिला सकें। लेकिन उन्होंने तय कर दिया था कि वे कभी अपने सामाजिक दायित्वों से मुह नहीं मोड़ेंगे। कुछ ऐसा काम जरूर करेंगे जिससे समाज की मदद हो सके।

कॉलेज के तृतीय वर्ष में उन्होंने यूथ अलाइंस की शुरुआत की। शुरुआत में यह कार्यक्रम बहुत धीरे चला लेकिन सन 2009 में इस कार्यक्रम को जबरदस्त सफलता मिली। जब प्रखर 'जागो रे' कैंपेन से जुड़े। उन्होंने नोएडा और गाजियाबाद में वोटर रजिस्ट्रेशन की मुहिम चलाई और यह मुहिम काफी सफल रही। उसके बाद वे 'टीच फॉर इंडिया फैलोशिप' का हिस्सा बने तब उन्होंने सोचा कि उन्हें अपने प्रयासों को जमीनी स्तर पर बहुत गरीब लोगों के बीच भी करना चाहिए।

फेलोशिप के बाद प्रखर ने अपने एक दोस्त को यूथ अलाइंस से जोड़ा और धीरे-धीरे उनकी टीम पांच लोगों की हो गई। आज यूथ अलाइंस ग्रामीण और शहरी इलाकों में लीडरशिप कार्यक्रम चला रहा है। जिसका मक्सद समाज के निर्माण में यूथ की भागीदारी को बढ़ाना है।

शहरी इलाकों में उनके फैलोशिप कार्यक्रम का नाम 'लीड द चेंज' है। यह आठ सप्ताह का कार्यक्रम है। जिसमें 25 से 30 युवा भाग लेते हैं। यह कार्यक्रम दिल्ली से चलाया जाता है जिसमें युवाओं को उन विशेषज्ञों द्वारा सलाह मशविरा दिया जाता है जो सोशल इंटरप्रन्योरशिप में अच्छा कर रहे हैं। जैसे अंशु गुप्ता जोकि 'गूंज' की संस्थापक हैं। शाहीन मिस्त्री यह 'टीच फॉर इंडिया' की सीईओ हैं। रवि गुलाटी जोकि 'मंजिल' एनजीओ के संस्थापक हैं। इनके अलावा कई ऐसे सफल सोशल उद्यमी हैं जो इन बच्चों को गाइड करते हैं।

इसके अलावा ग्रामीण इलाकों के लिए यह लोग 'ग्राम्य मंथन' नाम का एक कार्यक्रम चला रहे हैं। इसमें 50 बच्चों को भारत के विभिन्न गांवों में ले जाया जाता है और वहां की छोटी-छोटी दिक्कतों से अवगत कराया जाता है ताकि इनके हृदय में गांवों के प्रति प्रेम व लगाव पैदा हो और वे इन इलाकों के बारे में, यहां कुछ करने के बारे में सोचें।

इन कार्यक्रम का युवाओं पर बहुत गहरा असर हुआ है। अभी तक लगभग दो सौ युवाओं ने 'लीड द चेंज फैलोशिप' कार्यक्रमों में भाग लिया है और उनमें से अधिकांश बच्चे सामाजिक कार्यों से जुड़ चुके हैं। कुछ ने एनजीओ की ओर रुख किया है तो कुछ सामाजिक इंटरप्रन्योरशिप में काम कर रहे हैं।

भविष्य में प्रखर ज्यादा से ज्यादा कॉलेजों में जाकर युवाओं से मिलना चाहते हैं और उन्हें प्रेरित करना चाहते हैं ताकि वे समाज से जुड़े कार्यों में अपनी भागीदारी दें। वे एक वर्ष का कार्यक्रम 'ओनस-सोशल चेंज लैब ' शुरु करना चाहते हैं। जिसमें वे विभिन्न स्तरों पर छात्रों के विकास से जुड़े मुद्दों को छूना चाहते हैं। अपने अब तक के सफर से उन्होंने यही सीखा कि अपने लक्ष्य पर फोकस बनाए रखें। इस सफर में कई छोटी-बड़ी दिक्कतें भी आएंगी लेकिन आपको उन्हें सहजता से दूर करना है, विचलित नहीं होना।

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