इन फिल्मों को देखकर आपके मन में भी जासूस बनने का ख्याल एक बार जरूर आया होगा

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दुनिया भर के सिनेमा में जासूसी पर बनीं फिल्मों की भरमार हैं। भारत में भी कभी लोगों की जिज्ञासाओं को शातं करते हुए, कभी कल्पनाओं को उड़ान देती हुई बहुतेरी जासूसी फिल्में बनाई गई हैं। इन पर बनी फिल्में भी इसी कहानी का बखूबी चित्रण करती हैं। 

फिल्म विश्वरूपम का एक दृश्य
फिल्म विश्वरूपम का एक दृश्य
जासूसों और जासूसी के प्रति आम जनमानस में हमेशा से एक कौतूहल का भाव रहा है। जासूसों के तेज दिमाग, चपल व्यक्तित्व और फुर्ती के किस्से पढकर, सुनकर हम सब बड़े हुए हैं। एक सच्चे जासूस की जिन्दगी पूरी तरह दुनिया को धोखे में रखने की कला और गढ़े गए झूठों से भरी रही है, जिसका स्वभाव बेहद शांत होता है।

विश्वरूपम को अब तक की सबसे बेहतरीन जासूस फिल्मों में शुमार किया जाता है।

जासूसों और जासूसी के प्रति आम जनमानस में हमेशा से एक कौतूहल का भाव रहा है। जासूसों के तेज दिमाग, चपल व्यक्तित्व और फुर्ती के किस्से पढकर, सुनकर हम सब बड़े हुए हैं। एक सच्चे जासूस की जिन्दगी पूरी तरह दुनिया को धोखे में रखने की कला और गढ़े गए झूठों से भरी रही है, जिसका स्वभाव बेहद शांत होता है। दुनिया भर के सिनेमा में जासूसी पर बनीं फिल्मों की भरमार हैं। भारत में भी कभी लोगों की जिज्ञासाओं को शातं करते हुए, कभी कल्पनाओं को उड़ान देती हुई बहुतेरी जासूसी फिल्में बनाई गई हैं। इन पर बनी फिल्में भी इसी कहानी का बखूबी चित्रण करती हैं। आज हम जासूसी के पात्र को लेकर भारत में बनी उन बेहतरीन फिल्मों के बारे में बताएंगे जिनके बारे में पढ़कर आपके अंदर का भी जासूसी कीड़ा कुलबुलाने लगेगा।

विश्वरूपम (2013)

इस फिल्म में वैश्विक आतंकवाद को दिखाया गया है। समुद्र के किनारे से होकर अफगानिस्तान के टोरा-बोरा मैनहैट्टन तक फैला है। तकनीकी तौर पर भी ये फिल्म बेहद मनोरंजक और अन्धाधुंध रफ्तार से आगे बढ़ने वाली है। कमल हासन के विश्वरूपम की यही खास बात है। एक महिला अपने पति पर जासूस होने का शक होता है। और यहीं से विश्वरूपम की कहानी शुरू हो जाती है। वैसे भी कमल हासन को किसी कहानी में उतर जाने की महारत हासिल है। हालांकि इसके रिलीज होने के साथ ही यह फिल्म विवादों में आ गई। विश्वरूपम को अब तक की सबसे बेहतरीन जासूस फिल्मों में शुमार किया जाता है।

मद्रास कैफे (2013)

श्रीलंका में उपजे आतंरिक हालातों ने दक्षिण पूर्वी एशिया के राजनीतिक परिस्थितियों को बदल कर रख दिया था। एक देश की सशस्त्र क्रांति भारत के पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या पर खत्म हुई। इसकी कहानी भले ही एक डॉक्यूमेंट्री हो लेकिन कभी कमजोर नहीं पड़ती। इस फिल्म में जासूसी के जटिल हालातों और अधिकारियों के राजद्रोह को देखने को मिलती है। सुजीत सरकार के द्वारा निर्देशित इस फिल्म में भेदभाव और मानसिक दुविधाओं को समेटे होने के बाद भी इसे बेहतरीन तरीके से दिखाया गया है।

कहानी (2012)

लंदन की रहने वाली इंजीनियर कोलकाता पहुंचकर एक नजदीकी पुलिस स्टेशन पहुंचती है। उसका पति खो चुका होता है और वो उसे ढूंढ रही होती है। वो तीन महीने की गर्भवती होती है और पति के मिल जाने तक वो वापस लंदन लौटना नहीं चाहती। वो अपने पति को ढूंढने कोलकाता के हर नुक्कड़ पर जाती है। इस फिल्म की सबसे खास और आकर्षक चीज इसकी कहानी है जो दर्शकों को बांधे रखती है। इस फिल्म के लिए बॉब विश्वास को कभी नहीं भूला जा सकता।

मुखबिर (2008)

मुखबिर का मतलब होता है सूचना देने वाला। ये फिल्म पुलिस स्टेशन के जीवन के बारे में बताती है। जिसमें सूचना देने वाला एक ऐसा शख्स होता है जो दोहरी जिन्दगी जी रहा होता है। एक नौजवान लड़का जिसने 18 साल की दहलीज पार नहीं की है, वो एक बड़े पुलिस अधिकारी के आदेश पर जेल से छूटते ही पुलिस का मुखबिर बन जाता है। वह सफलापूर्वक आतंकवादी संगठनों, ड्रग डीलरों और अंग तस्करी करने वाले गिरोहों में घुसपैठ कर लेता है। लेकिन उस पर उसकी दोहरी जिन्दगी बहुत भारी होती है। मणिशंकर के निर्देशन में बनी ये फिल्म 'द डिपार्टेड' की झलक दिखाती है।

डी डे (2013)

कुछ लोगों ने इसे बेकार कहा तो कुछ लोगों ने महज कल्पना। लेकिन भारत के मोस्टवांटेड अपराधी को मारने पर आधारित है। इसे निखिल आडवाणी ने निर्देशित किया। डी डे भारतीय जासूसों की एक कहानी है, जिसमें एक आदमी को मारना होता है, जिसका कोड होता है गोल्डमैन। जब एक अंडरकवर रॉ एजेंट को पाकिस्तान में गोल्डमैन को जिंदा खोजना होता है जबकि इसकी खातिर तीन भारतीय एजेंट पाकिस्तान जाते हैं। लेकिन यह योजना गलत हो जाती है। कहानी यहीं से आगे बढ़ती है। इस फिल्म को आलोचकों ने खूब सराहा

अंधा नाल (1954)

1943 में एक शख्स को गोली मार दी जाती है जब वो शहर में बमबाजी कर रहा है। पुलिस ने जांच शुरू की और कई संदिग्धों को पकड़ा गया। सबका बस एक ही इरादा था कत्लेआम। इस फिल्म पर सबने अपनी राय दी। अकीरा कुरूसोवा की बेहतरीन कृति रैशोमोन को देखकर डायरेक्टर बालचंद्र ने उसी स्क्रिप्ट पर फिल्म बनाने की सोची और बिना किसी गाने के फिल्म बना डाली। साल 1954 में ऐसी फिल्म का निर्माण करना एक बड़ी चीज थी। जब गाने और डांस दर्शकों के दिलों दिमाग को आकर्षित करते थे। अंधा नाल एक तामिल नाम है जिसका मतलब है 'उसी दिन'। भारत की पारंपरिक फिल्मों की बाढ़ में इस फिल्म ने एक अलग मुकाम बनाया।

डॉन (1978)

डॉन फिल्म का हर अनुभव बताता है कि यह एक जासूस फिल्म है। जहां एक अपराधी को पकड़ने के लिए एक किरदार को गिरोह के अंदर भेजा जाता है जिससे वो पुलिस की मदद कर सके। लेकिन जैसे ही किरदार के मरने की सच्चाई सामने आती है वैसे ही वो पुलिस और अपराधियों के निशाने पर आ जाता है। वो सभी गवाहों को इकट्ठा करता है और दोषी को सलाखों के पीछे पहुंचा देता है। अमिताभ बच्चन का स्टारडम इस फिल्म से और बढ़ गया था। अमिताभ बच्चन ने इसमें डॉन का किरदार निभाया है। विजय एक अनाड़ी होता है जो बाद में डॉन बन जाता है। इस फिल्म ने सिनेमाघरों में खूब धमाल मचाया। जिसे देखने के लिए दर्शकों की भारी भीड़ पहुंची। इस फिल्म के डायरेक्टर चन्द्र बड़ौत भी ऐसी सफल फिल्मों दोबारा नहीं बना सकें।

द्रोह काल (1994)

जब आतंकवाद चरम पर पहुंच जाता है, तब दो पुलिस वाले मिलकर इसे खत्म करने की ठान लेते हैं। दो सूत्रों को आतंकवादी संगठनों में घुसपैठ कराई जाती है। उनमें से एक सूत्र आतंकियों के हाथों मारा जाता है लेकिन पुलिस के लिए जिन्दा गुप्तचर को आतंकियों से बचाना बहुत जरूरी हो जाता है। जबकि आतंकवादी पुलिस गुप्तचर का पता लगाने की कोशिश करने लगते है। 'इंटरनल अफेयर्स' और 'द डिपार्टेड' के बाद द्रोह काल जिसमें दिखाया गया था कि कैसे आतंकवादी सामाजिक और लोकतांत्रिक उथल-पुथल के बीच खुद को खड़ा कर लेते हैं।

ज्वेल थीफ (1967)

एक साधारण आदमी जेवरातों की चोरी करने वाले गिरोह का सरगना मान लिया जाता है। लोग उसे ज्वेल थीफ के नाम से जानने लगते हैं। जब सारे सबूत उसके खिलाफ हो जाते हैं तब वो एक मिशन पर निकलता है। अंडरकवर एजेंट के रूप में वो महंगी जेवरातों की चोरी करने वाले गैंग का पर्दाफाश करना चाहता है। और जब राज खुलता है तो दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। इस शानदार फिल्म को विजय आनंद ने डायरेक्ट किया था।

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