ट्रांसजेंडर्स ने लिखी कामयाबी की नई इबारत

किसी को मिली मल्टीनेशनल में उच्च पद पर नौकरी तो किसी ने चुनी मॉडलिंग की राह...

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जारा शेख, माया मेनन, गोवरी सावित्री, डॉली, अमरजीत आदि ऐसे कई ट्रांसजेंडर्स नाम हैं, जिन्होंने भारतीय समाज की मुख्यधारा में कामयाबी की नई तरह की पहल की है। जिंदगी की वह नई इबारत लिख रही हैं। वह न तो अपनी पहचान छिपाकर कोई काम करने के पक्ष में हैं, न ही अपने समुदाय के बाकी लोगों की तरह भीख मांगकर जीवन बसर करना चाहती हैं। पूरे स्वाभिमान के साथ उन्हें इस हस्तक्षेप में कामयाबियां भी मिल रही हैं। किसी को मल्टीनेशनल कंपनी में उच्च पद पर नौकरी मिली तो किसी ने मॉडल की राह चुनी और किसी ने रोजगार की।

वर्ष 2014 में हमारे देश के सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया था कि ट्रांसजेंडरों को भी बराबर के अधिकार प्राप्त हैं। उसके बाद से कई एक ऐसी सुखद घटनाएं सामने आई हैं, जो इस पूरे समुदाय के बेहतर और सम्मानजनक भविष्य का संकेत देती हैं।

भारत में वर्तमान में करीब 20 लाख से ज्‍यादा ट्रांसजेंडर हैं। जेंडर का प्रश्न अस्मिता मनुष्य की सामाजिक अस्मिता के प्रश्न से जुड़ा है। यह सवाल स्त्री को स्त्री के नजरिए से देखने की बात करता है । जेंडर का संबंध एक ओर पहचान से है तो दूसरी ओर सामाजिक विकास की प्रक्रिया के तहत स्त्री-पुरुष की भूमिका से । वर्ष 2014 में हमारे देश के सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया था कि ट्रांसजेंडर्स को भी बराबर के अधिकार प्राप्त हैं। उसके बाद से कई एक ऐसी सुखद घटनाएं सामने आई हैं, जो इस पूरे समुदाय के बेहतर और सम्मानजनक भविष्य का संकेत देती हैं। 

ट्रांसजेंडर समुदाय की ओर से देश-प्रदेशों की राजनीति में तो हस्तक्षेप बढ़ा ही है और कामयाबी भी, साथ ही तरह-तरह के स्टार्टअप में भी। कोच्ची मेट्रो में दर्जनों ट्रांसजेंडर कर्मचारियों की नियुक्ति भी इसी दिशा में एक सुखद पहलकदमी है। इधर की कुछ ऐसी उपलब्धियों में एक नाम तिरुवनंतपुरम (केरल) का प्रकाश में आया है, जहां की ज़ारा शेख टैक्नोपार्क में यूएसटी ग्लोबल कंपनी के ह्यूमन रिसोर्स डिपार्टमेंट में बतौर सीनियर एसोसिएट बन गई हैं। भारत में किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में शीर्ष पद पर सेवारत होने वाली वह देश की पहली ट्रांसजेंडर मानी जा रही हैं।

ज़ारा ऐसी ट्रांसजेंडर हैं, जो अपनी पहचान छिपाना नहीं चाहतीं। वह अपने समुदाय की अस्मिता के प्रश्न को गंभीरता से लेती हुई जिंदगी और समाज, दोनो की चुनौतियों का खुलेआम सामना करना चाहती हैं।

ज़ारा शेख ऐसे दुखद अतीत से गुजर चुकी हैं, जिसने उन्हें बेमिसाल मानसिक मजबूती दी है। जिन दिनों वह अबू धाबी में थीं, उन्हें ट्रांसजेंडर होने के नाते तरह-तरह की सामाजिक दुश्वारियों का सामना करना पड़ रहा था। एक वक्त तो ऐसा भी आया, जब उनके मन में खुदकुशी की भावना सिर उठाने लगी लेकिन उन्होंने उस मानसिक हालात पर अपनी इच्छाशक्ति से काबू पा लिया था। उसके बाद उन्होंने फिर से अपने देश भारत का रुख किया। जगह-जगह नौकरी की तलाश की लेकिन सिर्फ और सिर्फ ट्रांसजेंडर होने के नाते उन्हें हर जगह कामयाबी की जगह ठोकरें मिलीं। फिर भी उन्होंने जीवन के संघर्ष की राह पर कत्तई हार नहीं मानी। उनकी यह जिद भी आड़े आ रही थी कि वह अपनी पहचान नहीं छिपाएंगी। आखिरकार उन्हें रोशनी की किरण उस वक्त दिखी, जब यूएसटी ग्लोबल कंपनी के ह्यूमन रिसोर्स डिपार्टमेंट में सीनियर एसोसिएट के रूप में उनकी शर्तों के अनुसार अवसर मिला।

ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए इसी तरह की एक और कामयाबी की सूचना वर्ष 2017 के शुरुआती महीनो में सार्वजनिक हुई। केरल की ही एक डिजाइनर शर्मिला ने साड़ियों के अपने नए कलेक्शन के लिए दो ट्रांसजेंडर्स माया मेनन और गोवरी सावित्री को मॉडल सेलेक्ट किया। उन्होंने अपना वह कलेक्शन ही ट्रांसजेंडर समुदाय के नाम समर्पित कर दिया। शर्मिला को 'करीला' संस्था के माध्यम से माया और सावित्री मिलीं। दोनो की मुलाकात मर्दाना पोशाक में हुई, जब कि साड़ियों के कलेक्शन के लिए उन्हें मॉडल चुना जाना था। इस चुनौती पर दोनों पक्षों की खुशी-शुशी सहमति बनी और उन्हें मॉडल चुन लिया गया।

ऐसी ही कामयाबी की दिशा में हाल ही में एक बड़ी पहलकदमी जमशेदपुर (झारखंड) की ट्रांसजेंडर डॉली ने भी की है। वह अपने शहर में फूड कोर्ट लगा रही हैं। यहां रोटरी क्लब वेस्ट की ओर से तीन ट्रांसजेंडर्स लाल, अमरजीत और डॉली को फूड कोर्ट वितरित किए गए ताकि वे समाज की मुख्यधारा में शामिल हो सकें। उनका कहना है कि हमे ट्रेन में भीख मांगना पसंद नहीं है। मेहनत और अपने हुनर की कमाई से खुशी मिलती है। अमरजीत ने इस दिशा में अपने समुदाय के विकास के लिए ही 'उत्थान' संस्था का गठन किया है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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